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आध्यात्मिक

तात्त्विक

मृत्‍यु के समय साक्षात्‍कार कैसे हो सकता है ?

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मृत्‍यु के समय साक्षात्‍कार हो सकता है लेकिन जब आत्‍मा शरीर से अलग होने लगती है तो मूर्छा आ जाती है फिर साक्षात्‍कार कैसे होगा

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

How to obtain Saraswatya mantra diksha?

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Guruji I wanted a saraswati mantra diksha from you. I want to excel in my studies. Im surprised to see so much miracles and blessings you are showering upon your followers

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ध्यान विषयक

निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

Admin 0 4598 Article rating: 4.3
श्री हरि प्रभु ! चालू सत्संग में जब मन निःसंकल्प अवस्था में विषय से उपराम होकर आने लगता है ,तो प्रायः निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

ध्यान की अवस्था में कैसे पहुंचे ? अगर घर की परिस्थिति उसके अनुकूल न हो तो क्या करे ?

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ध्यान  की  अवस्था  में  कैसे  पहुंचे ? अगर  घर  की  परिस्थिति  उसके  अनुकूल  न  हो  तो  क्या  करे ?

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भोजन पात्र

भोजन पात्र

भोजन शुद्ध, पौष्टिक, हितकर व सात्त्विक बनाने के लिए हम आहार व्यंजनों पर जितना ध्यान देते हैं उतना ही ध्यान हमें भोजन बनाने व करने के बर्तनों पर भी देना आवश्यक है। अग्निसंस्कार करते समय भोजन जिस बर्तन में पकाया जा रहा है उस बर्तन के गुण अथवा दोष भी उस आहार द्रव्य में समाविष्ट हो जाते हैं।

भोजन के पात्र स्वच्छ, पवित्र व अखंड होने चाहिए। सोना, चाँदी, काँसा, पीतल, लोहा, काँच, पत्थर अथवा मिट्टी के बर्तनों एवं पत्तलों में भोजन करने की पद्धति प्रचलित है। इसमें सुवर्णपात्र सर्वोत्तम तथा मिट्टी के पात्र हीनतम माने गये हैं। सोने के बाद चाँदी, काँसा, पीतल, लोहा, (स्टील) और काँच के बर्तन क्रमशः गीन गुणवाले होते हैं।

काँसे के पात्र बुद्धिवर्धक, स्वाद अर्थात् रूचि उत्पन्न करने वाले होते हैं। इससे पित्त का शमन व रक्त की शुद्धि होती है।

लोहे की कढ़ाई में सब्जी बनाना तथा लोहे के तवे पर रोटी सेकना हितकारी है परन्तु लोहे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए इससे बुद्धि का नाश होता है। स्टील के बर्तन में बुद्धिनाश का दोष नहीं माना जाता। कलई किया हुआ पीतल का बर्तन भी हितकारी है। पेय पदार्थ चाँदी के बर्तन में लेना हितकारी है लेकिन लस्सी आदि खट्टे पदार्थ न लें। एल्यूमिनियम के बर्तनों का उपयोग कदापि न करें।

केला, पलाश अथवा बड़ के पत्र रूचि उत्पन्न करने वाले, विषदोष का नाश करने वाले तथा अग्नि को प्रदीप्त करने वाले होते हैं। अतः इनका उपयोग भी हितावह है।

पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। ताँबा तथा मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

पूज्य श्री - सुरेशानंदजी प्रश्नोत्तरी

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