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आध्यात्मिक

How to obtain Saraswatya mantra diksha?

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Guruji I wanted a saraswati mantra diksha from you. I want to excel in my studies. Im surprised to see so much miracles and blessings you are showering upon your followers

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तात्त्विक

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

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 पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । 
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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

How to obtain Saraswatya mantra diksha?

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ध्यान विषयक

निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

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श्री हरि प्रभु ! चालू सत्संग में जब मन निःसंकल्प अवस्था में विषय से उपराम होकर आने लगता है ,तो प्रायः निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

ध्यान की अवस्था में कैसे पहुंचे ? अगर घर की परिस्थिति उसके अनुकूल न हो तो क्या करे ?

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ध्यान  की  अवस्था  में  कैसे  पहुंचे ? अगर  घर  की  परिस्थिति  उसके  अनुकूल  न  हो  तो  क्या  करे ?

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विवेक जागृति

विवेक जागृति

P.P.Sant Shri Asharamji Bapuji Satsang - Ahmedabad, 13 Apr' 2013 Part-2 

अब असली बात यह है कि अपने जीवन में विवेक बढ़े । सत्य क्या है ? असत्य क्या है ? नित्य क्या है ? अनित्य क्या है ? शादी करने से समस्याओं का समाधान नहीं होता, छुट्टा-छेड़ा लेने से भी समस्याओं का समाधान नहीं होता । पैसा कमाने से भी समस्याओं का समाधान नहीं होता, बच्चा पैदा करने से भी समस्याओं का समाधान नहीं होता । सोने की लंका बनाने से भी दुखों का अंत नहीं होता और कंगाल बनने से भी दुखों का अंत नहीं होता । जहाँ दुःख की पहुँच नहीं है, उस आत्मदेव का ज्ञान पाए बिना,  जहाँ दुःख की दाल नहीं गलती, उस आत्मा में स्थिति के बिना दुःख नहीं मिटता । तो आत्मा में स्थिति कैसे हो ? जिनकी स्थिति हुई हो, उन महापुरुषों का सानिध्य चाहिए ।
राजा भर्तृहरि की गुरुभक्ति 
 राजा भर्तृहरि के पास तीन सौ साठ बावर्ची थे । साल में एक बार रसोइये ग्रुप का भाग्य खुलता था कि राजा साहब सेवा स्वीकार करेंगे । तो जिनको साल में एक बार भोजन बना के खिलाने में रसोइये अपना भाग्य मानते थे और जिनके पास सोने के बर्तन खाने के लिए थे । और हर पाँच साल में नेता लोग तो भीख माँगते हैं, मतदान, दान माँगते हैं, दान माँग के फिर मालिक बन जाते हैं । उसको नहीं माँगना पड़ता था, राज पाठ छोड़ के गोरखनाथ जी के चरणों में चले गए राजा भर्तृहरि और तत्परता से परमात्म-चिंतन आत्मा की खोज करते थे । आत्मा के पास जाना नहीं है, आत्मा को बनाना नहीं है, जगत को बदलना नहीं है,  खाली अपनी बुद्धि में जो दो परदे हैं, अस्तवापादक आवरण, अभानापादक आवरण उनको मिटाना है,  तो राजा उसमें लगे थे । तो राजा भर्तृहरि इतनी तत्परता से सेवा करते थे कि गोरखनाथजी को बड़ी प्रसन्नता हुई । गोरखनाथ बोले कि देखो अभी आये हैं, कितने सत्पात्र हैं साधक । खुश हो गए गुरूजी कि कितनी मर्यादा रखता है, कितना तत्पर है । शिष्य बोले कि गुरूजी ये तो राजा हैं अभी नए-नए आये हैं, इनकी परीक्षा हो तब पता चले, इनकी गुरूजी कोई परीक्षा होनी चाहिए । बोले अच्छा करते हैं, भरत हमारे आश्रम में ये नीयम है कि नया साधक आये तो सब सेवा से गुज़रे, रसोड़े में लकड़ियाँ चाहिए बबूल के जंगल में से लकड़ियाँ ले आओ । राजा ने पानी का गिलास भी नहीं माँझा होगा, कुल्हाड़ा उठाया और चले गए । गुरूजी ने शिष्यों से कहा कि ‘बबूल के जंगल की लकड़ियाँ, काँटों में से, भारी भर के ले आयें उस समय तुम वो जो पगदंडी है, उस पर राजा हो तो उनको जाके धक्का मार देना’ । पुराने चेले खुश हो गए कि हम धक्का मार देंगे, गुरु की आज्ञा है, जोर से धक्का मारेंगे, भर्तृहरि भाग जायेंगे, इनके आने से हमारा प्रभाव कम हो गया । मारा धक्का भार गिर गया, राजा बोला भी नहीं और आँखों से  भी अंगारे नहीं उछले । राजा था, मजबूत था,  भारा उठाया मानो  कुछ हुआ ही नहीं  क्योकि सुना था सत्संग कि हो हो के जो बदल जाता है उसको सच्चा मानना मूर्खता है । ये तो होके बदल गया गिरा बस,  क्यों सच्चा मानें ? अपनी समता, संतुलन बना रहे,  यही आत्मा की स्थिति है । राजा ने पकड़ ली थी ये बात । भारा डाल दिया, गुरु को फ़रियाद-वरियाद नहीं किया । चेलों ने कहा हमने ज़ोर से धक्का मारा है । गुरूजी बोले कि फ़रियाद भी नहीं करता है  और तुम्हारे को आँख दिखाई क्या ?  चेलों ने कहा कि नहीं । गुरूजी बोले देखो ये हैं आत्मा का अनुभव करने का अधिकारी । जरा-जरा बात में गुरूजी का खून पीने वाला क्या आत्मा का अनुभव करेगा,  वो तो घर जाए तो ही ठीक रहेगा । राजा भरत के लिए गुरु के ह्रदय में बड़ा सदभाव हुआ । पुराना शिष्य बोला ये तो ठीक है,  मज़बूत परीक्षा हो न तब मज़ा आवे । गुरूजी ने कहा कि अच्छा मज़बूत परीक्षा लेते हैं । राजा भरत,  ऐसा नहीं बोलते गुरु,  ऐ  भर्तृहरि,  इधर आ । जेठ और वैशाख का महीना चल रहा है, जेठ पूरा हो रहा है । ये जो नदी है न,  सूखी नदी उसमें नंगे पैर चलना है,  छाया में नहीं खड़ा रहना । छाया पे पैर नहीं आवे नहीं तो विफल माने जाओगे । एक महीने की तुम्हारी नंगे पैर पद-यात्रा की परीक्षा है । अगर पास होओगे तो आश्रम में रखेंगे,  नहीं तो भेज देंगे घर ।  भर्तृहरि बोले कि महाराजजी आपकी कृपा है,  वो पास कर देगी मेरेको । अच्छा जाओ,  छाया पे पैर नहीं पड़ना चाहिए । अब वो भर्तृहरि चलते जायें,  भिक्षा पात्र मिला है,  भूख लगे तो भिक्षा माँग के खा लें । महाराज नदी के ऊपर-ऊपर से शिष्यों को दिखाएँ कि जा रहा है,  अब मैं योग बल से पेड़ पैदा कर दूँगा,  इसको मैंने बोला है,  छाया पे पैर नहीं पड़े  अगर वो छाया के नीचे बैठता है तो विफल है । हाँ गुरूजी विफल ही है फिर तो,  लेकिन विफल होता है कि सफल होता है देखो । गुरूजी ने योग शक्ति से छायादार वृक्ष पैदा कर दिया । ऐसा भागा जैसे अंगारे पे पाँव पड़े , छाया नहीं है  अंगारे हैं उसके लिए, तो धूप में चला गया । फिर दूसरी कुछ सेविकाएँ,  योगिनियाँ भेजीं,  पैर चंपी करें,  थक गए हो,  नहीं  । ऐसी कई यौगिक लीलायें की गुरूदेव ने,  आखिर गुरु उछल गए,  ह्रदय खिल गया गुरु का,  शिष्यों के साथ उन के सामने आ गए । भरत पास हो गए,  पास,  कुछ माँग लो । गुरूजी कुछ नहीं चाहिए,  खबरदार !  गुरु का अपमान है,  गुरु बोलते हैं,  कुछ माँग लो,  तू बोलता है,  कुछ नहीं चाहिए,  ये क्या मतलब हुआ,  अभी घमंड है,  राजा होने का  । अन्दर से जानते थे कि घमंड नहीं है बिचारे को । नहीं,  नहीं,  नहीं गुरूजी चाहिए,  चाहिए क्या चाहिए ? गुरूजी ये जो कंथान है न,  फट गया है,  सुई भी है,  धागा भी है,  जरा सिल दीजिये आप,  मेरा कटिवस्त्र है न उसको आप सिल दीजिये बस । बोले बड़ा चतुर सयाना है,  अब इसको सी देता हूँ और तेरे को भी सी देता हूँ । ये फटा है इसको भी जोड़ देता हूँ और तेरे को भी जोड़ देता हूँ । ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष । आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः।  ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः।।  करोड़ों जन्मों के यज्ञ,  तप आदि सब सफल हो गए गुरु संतुष्ट हो जाए बस तो गुरु को ये चीज-वस्तु से संतोष नहीं होता,  आपकी उन्नति से गुरु को संतोष होता है । गुरूजी ये खा लो,  ये ले लो,  ये मेरे को खा के दिखाओ,  ऐसे मूर्ख लोग आते है,  गुरूजी जरा खा के दिखाओ,  अब मैं कोई नट्टू हूँ क्या ? ये कर के दिखाऊँ वो कर के दिखाऊँ । उनकी भावना होती है लेकिन खोपड़ी खाली होती है । गुरूजी पहन के दिखाओ,  गुरूजी खा के दिखाओ,  गुरूजी ये कर के दिखाओ,  अब चलाते हैं बच्चे हैं,  बालमंदिर के  हैं,  अक्ल कम है,  चलो देर सबेर आते-आते भी होशियार हो जायेंगे ।
कितना भी कमा कमा के सोने की लंका तो नहीं बना सकते  सोने की लंका वाला भी दुखी हो के गया ।  हिरण्यपुर वाला भी दुखी हो के गया । ईश्वरप्राप्ति के लिए लग जाओ,  जो छोड़ जाना है उसके लिए मेहनत करना मूर्खों का काम है । जो सदा रहता है उसको छोड़ दिया और जो छोड़ना है उसके लिए मर रहे हैं । ये ही अज्ञान है । पीत्वा मोह्मई मदिरा संसार भूत्वो उन्मता: । मोह रुपी मदिरा पीकर संसार उन्मत हो गया है । एक गया, दूजा गया,  जाने को तैयार खड़े हैं फिर भी अभी चाहिए,  ये चाहिए,  ये चाहिए,  वो चाहिए । क्या चाहिए ? वो ही संकल्प चाह-चाह-चाह ईश्वर के सिवा कोई भी चाह होती है मार देती है,  मुसीबत में डाल देती है । ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में रोना ही पड़ेगा और ईश्वर दूर नहीं हैं,  दुर्लभ नहीं हैं, परे नहीं हैं,  पराये नहीं हैं और आज तक मिले नहीं कितना दुर्भाग्य है । क्योंकि तड़प नहीं है,  महत्व नहीं है  और अपने को ईश्वर के लिए तड़प हो तो ईश्वर भी हमें सहयोग करते हैं । बच्चा माँ के लिए तड़पे और माँ बच्चे के लिए नहीं तड़पे तो उस माँ को मर जाना चाहिए,  ऐसे ही हम ईश्वर के लिए तड़पें और ईश्वर हमारे लिए नहीं तड़पें तो ऐसे ईश्वर को भी मर जाना चाहिए । संत  लोग बोलने की ताकत रखते हैं । अरे !  हमको तड़प तो जरा सी होती है और भगवान को ज्यादा होती है । मैं डीसा के आश्रम में  एकांत में रहता था,  लोगों ने गुरूजी को चिट्ठियाँ लिखीं,  दर्शन देवे और सत्संग करे,  गुरुजी की आज्ञा मिली,  करते थे । सत्संग करते करते मैंने कहा तुमने देखा है त्यागी कैसा होता है ?  कभी त्यागी फक्कड़ देखा है  ?  नहीं,  मैंने कहा देखना है,  बोले हाँ,  तो मैंने सारे कपड़े उतार दिए केवल जांघिया रखा,  मैं चल पड़ा नर्मदा  किनारे आ गया,  वो रोते-धोते रहे,  हाथ जोड़ते रहे,  भूल हो गई,  मैंने कहा नहीं-नहीं देख लो । फिर कभी एक दिन क्या,  एक रात भी मैं वो आश्रम में नहीं रहा,  छोड़ दिया तो छोड़ दिया बस । ऐसे ही सिद्धिपुर का आश्रम छोड़ दिया तो छोड़ दिया,  त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए । अब नर्मदा किनारे गया तो नर्मदा किनारे आश्रम में रहूँगा तो सब खिलायेंगे- पिलायेंगे,  त्यागी का पार्ट अदा करना है । जंगल में कोई पहचाने नहीं ऐसी जगह जाके बैठ गया,  रात को थोड़ी  नींद आवे थोड़ा सोये थोड़ा जागे,  सुबह नहाके आये,  भूख लगी,  सूर्योदय हुआ । मैंने कहा अब कहीं जायेंगे नहीं भीक्षा माँगने,  जिसको गरज होगी आयेगा,  सृष्टिकर्ता खुद लायेगा । थोड़े समय में दो किसान आये फल लेके लो महाराज,  मैंने कहा आपका हमारा परिचय नहीं है,  कोई दूसरे संत के लिए आप जाते होंगे,  मेरेको संत मान के आप दे रहे हैं,  मै तो कल रात को ही इधर आया । बोले कल रात को ही हमको स्वप्ना हुआ और ये मार्ग हमने रात को तीन बजे देखा और आपके जैसी आकृति भी देखी । हमारा कोई दूसरा संत नहीं है । मेरेको तो सुबह आया विचार लेकिन मेरा अंतरात्मा समझता है कि सुबह इसको विचार आएगा,  ये पट्ठा सुबह अड़ जाएगा तो सुबह कैसे स्वप्ना दिखाऊँगा,  रात को तीन बजे स्वप्ना दिखा दिया । उसको तड़प है कि नहीं है,  ध्यान रखने की तत्परता है कि नहीं है । उसको गरज कितनी है बोलो,  कितना दयालू है,  कितना उदार,  मेरेको पता नहीं कि मेरेको ये विचार आएगा,  लेकिन वो जानता है कि ये पक्के हैं । मेरेको तो आया सूरज उगने के बाद विचार लेकिन मेरे विचारों की गहराई में जानने वाले ने उसको रात को तीन बजे स्वप्ना दे दिया,  कैसी व्यवस्था रखते हैं भगवान,  कैसा ध्यान रखते है ।
 तुम्हारा हमारा जन्म हुआ उसके पहले ही शरीर में दूध बनाने वाली प्रक्रिया चालू हो गयी,  कैसे भगवान हैं । माँ तो रोज़ खाती है और माँ को दूध बनाने की प्रक्रिया नहीं आती,  बाप को भी नहीं आती,  बेटे को भी नहीं आती लेकिन जो बाप बना है,  बेटा बना है,  माँ बना है सबके रूपों में वो सब जानते हैं । रोटी में से दूध बना देते हैं,  कैसे प्रभु हैं,  उनकी लीला स्मृति  देख देख के उनसे बातें कर कर के भी तर जाए,  आनंद ही आनंद हो  जाए । क्योंकि आपका ईश्वर के साथ एकदम सीधा सम्बन्ध है,  आपका शरीर के साथ पक्का सम्बन्ध नहीं है,  शरीर मर जाता है आप रहते है लेकिन भगवान आप को छोड़कर नहीं रह सकते और आप भगवान को छोड़ के नहीं रह सकते । घड़े का आकाश महा आकाश को छोड़ के नहीं रह सकता है और महा आकाश घट आकाश को छोड़ के नहीं रह सकता है । तरंग पानी को छोड़ के नहीं रह सकती,  पानी तरंग को छोड़ के नहीं रह सकता है । सोना गहने को छोड़ कर नहीं रह सकता,  गहना सोने को छोड़ के नहीं रह सकता । स्वर्ण स्वर्णभाव को छोड़ के नहीं रह सकता,  गहने को तोड फोड़ मरोड़के एकदम सलाखा बना दो तो भी सोना है । ऐसे ही आत्मा चैतन्य है,  शरीर मर जाए कुछ भी हो जाए,  आत्मा तो ज्यों का त्यों है । अकाट्य संबंध है,  अभेद्य संबंध है,  शाश्वत संबंध  है और संबंध है ऐसा तो सुना है उसको जान लो तो पता चलेगा वो सत संबंध है,  चित संबंध है,  आनंद संबंध है और शरीर मरने के बाद भी मेरा आत्मा अमर है । भगवान चेतन है,  शरीर मरने के बाद भी ज्ञान रहता है कि ये मेरा मुर्दा है,  लोग रो रहे हैं,  ये मेरी पत्नी रो रही है,  ये मेरा पति रो रहा है,  फलाना रो रहा है । सत भी है,  चेतन भी है,  मरने के बाद भी रहता है तो सत है,  जानता है तो चेतन है और कुछ अच्छा होता है तो ख़ुशी होती है तो आनंद भी है । ये सच्चिदानंद सब जगह भरपूर है,  जैसे आकाश सब घरों में,  सब जगह है,  उससे भी सूक्ष्म चिदानंद परमात्मा है । अच्छे काम करते हैं और उसको चाहते हैं तो बुद्धि को ऐसा प्रेरित करता है और बुरे काम करते है तो बुद्धि को ऐसे प्रेरित करते है कि ठोकर खाओ और देर-सबेर मेरे पास आओ । कही न कहीं गड़बड़ करे है ताकि संसार फीको लागेगा । संसार में कोई सार नहीं है ममता से ही अच्छा लगता है । कुत्ता हड्डी चबाता है तो बेफकूफी से हड्डी में उसको रस आता है । ऐसे ही अपनी शक्ति का ह्रास होकर संसार में सुख लगता है,  सुख जैसी कोई चीज ही नहीं है ।
वासनावान को संसार में सुख दिखता है लेकिन परिश्रम बहुत करता है और जरा-सा सुख आभास होता है । इससे भावना वाले को परिश्रम कम है और ह्रदय में सुख बहुत है । भावना वाले से भी बढकर सत्संग वाले को ज्यादा सुख होता है और परिश्रम कम होता है । संतों ने जो परिश्रम किया वो बोल रहे है और तुमको तो मुफ्त में सुख, पुण्य, ज्ञान हो रहा है । लेकिन तुमको जब आत्मा का ज्ञान होगा,  जो संतों को हो गया तब तो ऐ.. हे…  । आत्मसुखात परम सुखं न विद्यते । आत्मा के सुख से बड़ा कोई सुख नहीं है । आत्मज्ञानात परम ज्ञानं न विद्यते । आत्म ज्ञान से बढकर कोई ज्ञान नहीं है । आत्मलाभात परम लाभं न विद्यते । आत्म लाभ से बढकर कोई लाभ नहीं है । आत्मलाभ,  आत्मज्ञान,  आत्मसुख पाने के लिए ही मनुष्य जीवन की बुद्धि है नहीं तो इतनी बुद्धि की जरूरत  ही नहीं,  इतना पढने-लिखने की जरूरत नहीं । घोडा,  गधा,  दूसरे जीव प्राणी,  अनपढ़ भी तो जी रहे हैं,  खा रहे हैं,  बच्चे पैदा कर रहे हैं । मनुष्य शब्द का अर्थ ही ये है कि जैसे सुई दो कपड़ों को जोड़ देती है ऐसे ही जीवात्मा परमात्मा को जोड़ने वाली मनीषा जिसके पास है उसको मनुष्य बोलते है । मनसा सीव्यति इति मनुष्या: । मन से जो ईश्वर के साथ जुड़ सकता है उसका नाम है मनुष्य । आहार निद्रा भय मैथुन च, चतुर्थी एतद् पशु भी नराणाम । खाना,  नींद करना,  मैथुन करना,  मुसीबत आये तो डर जाना ये तो पशु को भी होता है, मनुष्य को भी होता है । आहार निद्रा भय मैथुन च,  चतुर्थी एतद् पशु भी नराणाम । धर्मो अधिकः,  खाली धर्म का गुण ही मनुष्य में मनुष्यता दिखाता है,  और धर्म कौन है ? जिसने सारे ब्रह्मांडों को धारण किया है,  अपने शरीर को भी धारण करने की सत्ता देता है,  भगवान को पायें । भगवान क्या ? भ ग वा न,  भरण पोषण की सत्ता,  गमनागमन की चेतना,  वाणी की स्फुरण शक्ति और ये सब मिट जाए फिर भी जिनसे हमारा सम्बन्ध नहीं मिटता वो ही तो भगवान हैं । भगवान भी आपके साथ सम्बन्ध तोड़ नहीं सकते अगर आपके साथ सम्बन्ध तोड़ें तो सर्वव्यापक कैसे रहेंगे ? अपने को अपने से अलग करके कहाँ रखेंगे  तुमको ? तुम भगवान से सम्बन्ध तोड़ना चाहो तो नहीं तोड़ सकते । घड़े का आकाश महाआकाश को छोड़ कर कहाँ जाएगा ?  और महा आकाश घड़े के आकाश को अपने से कहाँ अलग निकलेगा ? तरंग पानी को छोड़कर सड़क पे दौड़ेगी क्या ? तरंग को दौड़ना है तो पानी पे ही दौड़ेगी और पानी को तरंग बनना है तो पानी से ही बनेगा,  पानी के बिना तरंग नहीं और तरंग के बिना पानी नहीं । पानी तो पानी रहेगा लेकिन तरंग और पानी अभिन्न हैं आपस में । ऐसे आत्मा परमात्मा अभिन्न है, खाली जीने की इच्छा और संसार के विकारों में सुख भोग की इच्छा, भोग और संग्रह से स्वभाव बिगड़ गया । भोग पाँच प्रकार के होते हैं - शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध | पति-पत्नी का मूत्र इन्द्रिय का सुख, मैथुन, उसमें से सुख ढूंढ रहे हैं, सुख तो क्या ज़िन्दगी तबाह हो गयी । चीज़- वास्तु मिले उसमें से सुख ढूँढ रहे हैं, देखने को मिला तो, पतंगिया देख के सुखी होता है, मछली चख के सुखी होती है, भवरा सुगंध से सुखी होता है, हिरण शब्द से लेकिन मनुष्य तो पाँचों विकारों में फँसा है । उनको तो एक-एक विकार है फिर भी जान चली जाती है और इसको तो पाँचों विकार हैं । फिर भी श्रेष्ठ माना जाता है क्योकि सत्संग मिले तो इन विकारों में फँसेगा नहीं, विकारों का उपभोग नहीं करेगा, उपयोग करेगा बाकी निर्विकारी का ज्ञान पा लेगा इसलिए मनुष्य श्रेष्ठ है । गाय कभी गाली नहीं देती, पेड़ कभी झूठा केस नहीं करता और दीवार किसी की चोरी नहीं करती । मनुष्य चोरी भी करता है, झूठे केस भी करता है, झूठ भी बोलता है फिर भी दीवार से, गाय से, घोड़े से, सबसे अच्छा है क्योकि सत्संग मिल जाए तो आत्मा का साक्षात्कार कर सकता है । इसीलिए महत्व है और जो आत्मा का साक्षात्कार के लिए रूचि नहीं है वो तो मनुष्य क्या है ? 
 गर्मी के दिन थे, डिप्टी कलेक्टर ऊँट पर रणभूमि की निघरानी करने, माप-तौल ज़माने जा रहे थे । ऊँट चालक था और डिप्टी कलेक्टर थे । गरम हवा का झोंका लगा, उसको बोलते हैं काली हवा ऊँट चीखा, जैसे हार्ट अटैक होता है न, हाय बाप रे ! ऊँट को जल्दी बैठा दिया कूद के उतर गया ऊँट वाला, बोला साहब अब ये मर गया । ऊँट ने पैर आड़े कर दिए, अब सामान तो उतारा लेकिन ऊँट के भार से दबी हुई रस्सी वो खीचें तो निकले नहीं । कलेक्टर ने भी फें-फूं की । ऊँट का वजन और ये दो आदमी, ऊँट के वजन से छोटे थे । कलेक्टर ने देखा कि ये ऊँट तो ज्यों का त्यों है, ये अपने शरीर को और हमको लेकर दौड़ रहा था, ऐसी कौन सी चीज़ इसमें से निकल गयी कि अब रस्सी निकालने में हम विफल हो रहे हैं । ऊँट वाला बोला सहाब, ये मर गया है । डिप्टी कलेक्टर बोले ‘है तो सब ज्यों का त्यों’ । लेकिन इसमें वो जीव नहीं है, जीवन नहीं है । शरीर को जीवन नहीं मानते, जिससे शरीर जीता है वो जीवन दाता परमात्मा है । उसको साहब मैं तो नहीं जनता हूँ, बोले तू नहीं जनता है, मैं रिजाइन पेपर लिख के देता हूँ, मेरे कलेक्टर साहब को बोलना मेरी नौकरी मैंने छोड़ दी । जो जानते हैं उन संतों के चरणों में जाऊँगा । ऊँट की मृत्यु देखकर कलेक्टर संत बन गए । यहाँ तो माँ मर गयी, बाप मर गए, साले मर गए, ससुर मर गए, वैराग्य ही नहीं होता, रोज़ लोग मरते हैं । कल जो इस समय घूमते थे उसमें से हजारों लोग अभी शमशान में चले गए और अभी जो घूम रहे हैं कल इस समय उसमें से हजारों लोग मर जायेंगे । ऐसे दिनों में अपना भी नंबर आ जायेगा, बिल्कुल पक्की बात है । एक भूला दूजा भूला भूला सब संसार, बिन भूला एक गोरखा जिसको गुरु का अधार । सुनकर युवक उठा, महाराज को प्रणाम किया, जंगल में चला गया, गुरु को खोज के एकांत में, घर में तो भजन होगा नहीं, राग, द्वेष, काम, क्रोध । भजन, ध्यान और गुरु का सत्संग छह महीने में साक्षात्कार हो गया । जो लोग सत्संग सुन रहे थे, उनके पीठ के पीछे थोड़ा धक्का मार के हिला दिया, बड़ा तेजस्वी हो गया था । बोले क्या करते हो ? बोले मैं चेक करता हूँ तुम मनुष्य हो ? मैंने तो एक बार बाबा का सत्संग सुना और मैं तो चला गया तो मैं तो पा के आ गया तुम रोज़-रोज़ सुनते हो । तुम जिंदे मनुष्य हो कि पुतले हो असर ही नहीं होती, मेरेको तो एक सत्संग से असर हो गयी, मैं तो चला गया और अपना काम बनाके आ गया । चाहें सौ-सौ जूते खायें तमाशा घुसके देखेंगे । संसारी तो पच रहे हैं, अपन भी पचके देखेंगे । ईश्वर बाद में पहले बेटा कर लूँ, करो । कृष्ण के बेटे ही कृष्ण के खिलाफ थे, एकनाथ महाराज का बेटा एकनाथ के खिलाफ था, नानक के बेटे खिलाफ तो नहीं थे लेकिन हम भी कुछ बन के दिखायेंगे, मारो झक । गुरु की आज्ञा के बिना क्या बनके दिखाओ ? क्या दिखायेंगे ? गुरु की आज्ञा में रहेंगे तब गुरु का प्रसाद पचेगा, अपने तरफ से बनके दिखाओ, करो । ये अहं होता है अहं, अहं और ईश्वर के बीच में बड़ी खाई है । बापू तकोड़ करते हैं तो आत्मा को तो नहीं करते और शरीर तो जड़ है, तुम्हारे अहं को तकोड़ करते है । तुम अहं करके महान बनना चाहते हो, बन ही नहीं सकते । फिर तुमको उल्लू बनाने वाले उल्लू बना देंगे | झूठ कपट करें तो भगवान बोलें जाओ मरो, अयोग्य है तो हम भी बोलते हैं न कि जाओ इसको घर भेज दो आश्रम से रवाना कर दो । मैं क्यों अयोग्य बनूँ ? कबीरा मन निर्मल भयो, जैसे गंगा नीर, पीछे-पीछे हरि फिरे कहत कबीर कबीर । सोचा मैं न कहीं जाऊँगा, यहीं बैठ के खाऊँगा तो कैसे खिलाने वाले ने खिला दिया । मैं तो सच्चे ह्रदय से बैठा था, मेरे पास तो मोबाइल भी नहीं था, पैसा भी नहीं था, ऐसे थोड़ी कि ईश्वर नहीं खिलाएँगे तो होटल का मँगा के खाऊँगा, ईश्वर ऐसे लोगों के चेलेंज से नहीं आते । झूठ-मूठ में बच्चा बैठ जाए तो माँ बोले जा मुआ । माँ इतना नहीं जानती जितना भगवान जानते हैं । भगवान तो माँ को, माँ की माँ को, भी जानते हैं और तुमको भी जानते हैं । भगवान तो भगवान हैं । 
सत्य को आँच नहीं और झूठ को पैर नहीं और भगवान के लिए जीना, वास्तविक जीवन है । भगवान को पाने का इरादा बनाना सतबुद्धि है नहीं तो दुर्बुद्धि है, दूर की यात्रा करता है, जन्म-मरण की । बोले ये आदमी, ये वकील साहब बहुत होशियार हैं, बहुत-चलता पुर्जा है, जजों को ले देके सेटिंग करता है बहुत-चलता पुर्जा है । महाराज ने कहा बिलकुल सच्ची बात है, ये पुर्जा चलता ही रहेगा कभी कुत्ती के पेट में, कभी घोड़ी के पेट में, कभी गधेड़ी के पेट में जाएगा गधा बनेगा, ये पुर्जा चलता ही रहेगा । चौरासी-चौरासी कोख में चलता ही रहता है, मुक्ति नहीं पाता है । जो दूसरों को धोखा देके, झूठ-कपट करके, जजों को रिशवत देके चतुर बन जाते हैं, उनकी हालत तो बुरी होती है । खुदीराम को बुलाया, हमारे पक्ष में झूठी गवाही दो, खुदीराम ने बोला मैं नहीं दूँगा । ज़मीदार बोला तुम मेरे को जानते हो न तुम्हारा रहना भारी कर दूँगा, गाँव छोड़ कर भागना पड़ेगा । बोले कुछ भी करो मैं झूठी गवाही नहीं दूँगा । वो ज़मीदार था, गुंडों का डॉन था, कई ऑफिसर, पुलिस वाले, नेता उसके घर खाते पीते थे । वो खुदीराम के पीछे लग गया और ऐसी मुसीबत कर दी कि खुदीराम को अपना खेती, गाय, भैंस ये छोड़ के गाँव से भागना पड़ा । लेकिन देखो कुदरत की कारवाही, ज़मीदार का लड़का लोफर हो गया, लड़की किसी के साथ भाग गयी और मित्र दुश्मन हो गए । लेकिन खुदीराम के घर रामकृष्ण परमहंस का अवतार हो गया । कैसी-कैसी कथाएँ ले आता हूँ ताकि तुम जगो, लेकिन तुम भी हाँ बापू, तुम जगाते रहो और हम सोते रहे । अब देखें कौन थकता है ? तुम सोये रहने का ठान भी लोगे तो भी जगाने की बातें कभी न कभी जगा देंगी । सुना हुआ सत्संग व्यर्थ नहीं जाता । मगज में पड़ा है कभी न कभी, सिंह के घाट में आया हुआ शिकार फेल हो सकता है, गुरु के ह्रदय में आया हुआ साधक देर सबेर पास हो जायेगा ।
तीस मीटर से गाड़ी गिरी मेरे एक भक्त की, गाड़ी पुर्जा-पुर्जा हो गयी और ये ज्यों के त्यों, लेकिन हमारा हेलीकाप्टर तो तीस मीटर से भी ऊपर से गिरा । मशीन में कोई खराबी थी और पायलट को पता ही नहीं था और ऊपर से हेलिकॉप्टर गिरा, हेलिकॉप्टर के परखच्चे उड़ गए, आगे के पुर्जे-पुर्जे उड़ गए और जहाँ गिरा वहाँ लोगों को भी नहीं लगा । नहीं तो एक नट-बोल्ट भी उड़ के लगे तो लोगों के हाथ-पैर तोड़ देवे । किसी को कुछ नहीं लगा । जय हो, महाजयजय कार हो मेरे गुरुदेव की । ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ आनंद दाता ॐ माधुर्यदाता ॐ हरि ॐ हरि ॐ
गुरु मेरे सत रूप हैं, आनंद रूप हैं, व्यापक हैं ॐ आनंद । गुरु के गोद चले गए बस हो गया, ऐसे ही बापजी बन गए । हमने कोई उपवास, व्रत ये कोई तकलीफें नहीं सहीं, गुरूजी मिल गए हो गया काम । चालीस दिन में तो हुआ लेकिन उसको पक्का करने के लिए सात साल रहे थे एकांत में, नहीं तो हजम नहीं होता । जो लोग सोचते हैं, हम दुखी हैं, हम परेशान हैं, उनका दुःख और परेशानी बढ जाती है, दुःख मिटाने का सुन्दर उपाय है, सत्संग को अच्छी तरह से समझे तो इससे दस गुना दुःख आये तुमको दुखी नहीं कर सकता । जगत की परिस्थिति को ठीक करके सुखी रहना चाहते हैं, नहीं जंगल में आग लगती है तो आग से लड़कर नहीं बचा जाता, आग का जहाँ प्रभाव नहीं पड़ता वो तालाब में आकर खड़े हो जायें तो आग कुछ नहीं करेगी । ऐसे ही आत्मज्ञान के सत्संग में आ जाएँ, आत्मविचार में तो दुखों का प्रभाव कुछ नहीं होता । बड़ी बहादुरी का काम है । बाबा बाबा मेरे को बेटा हो गया… ये तो कुतिया भी कर रही है, कुतिया तो सात-सात देती है एक टाइम में, क्या बड़ी बहादुरी की ? बाबा बाबा आप की कृपा हो गयी, ये तो हमारी दासी की कृपा है, तुम्हारी वासना है, हमारी कृपा होती तो साक्षात्कार पहले बाद में ढीकरा । हमने जो ठान लिया भगवान ने हमको ऐसे ही कराया पहले साक्षात्कार बाद में संसार । नहीं तो पहले ढीकरा कर लूँ पछी ईश्वर, जाओ करो, लम्बी यात्रा हो जायेगी । आज आनंद सब को खूब आ रहा है, बोलो ।
सवस्थ जीवन की कुंजियाँ -
 सुबह ३-५ जीवनी शक्ति फेफड़ों में होती है, सुबह ५ के पहले-पहले प्राणायाम कर ले तो प्राणबल बढ़  जाएगा, मनोबल बढ़ जाएगा । ५-७ के बीच बड़ी आंत में जीवनी शक्ति होती है उस समय सूरज उगने के आस-पास पानी पी लेवे, हरड़ ले लेवे, शौच जाए, पेट साफ़ कर दे । सौ-सौ दवाइयों से भी पेट की तकलीफें इतनी नहीं जातीं, पेट इतना स्वस्थ नही रहता जितना ५-७ के बीच शौच का काम निपटाने से स्वस्थ रहता है । ७-९ के बीच आमाशय में जीवनी शक्ति होती है, आंवले के रस में पानी डाल के पी ले, भूख नहीं लगती है तो नारंगी, मौसम्मी, पपीता खा ले । आज मैंने पपीता खाया, नारंगी खाई, जौ का दलिया खाया । भूख नहीं लगती है, तो टमाटर खाने से हेमोग्लोबिन बनता है, खून भी बनता है । खून बनाने के लिए मुनक्का द्राक्ष २० भिगोके रखो रात को, सुबह ७-९ के बीच मुनक्का द्राक्ष खाए और पानी पिये । पहले नारंगी खा लें, खून बनेगा उससे । तो सुबह ७-९ कुछ पेय पी ले, या तो टमाटर और उसके ऊपर संत कृपा चूर्ण डाल के टमाटर खा लेवे । अथवा टमाटर को कुकर में भाप के फिर उसमें हल्का सा नमक-मिर्च मिला के चटनी जैसा, उससे भी खून बनता है और भूख लगती है । ९-११ के बीच भोजन कर ले, अच्छा पचेगा, एकदम स्फूर्ति मिलेगी । ११-१ जीवनी शक्ति ह्रदय में रहती है, उस समय भोजन नहीं करना चाहिए, नहीं तो ह्रदय का विकास रुक जाता है । स्नेह, प्रेम, आनंद, मानवीय संवेदना, जिस समय ये विकसित करना है उस समय तो खाने में लगे, जिस समय खाना है उस समय खाया नहीं तो खाना भी ठीक से नहीं पचा और ह्रदय भी ठीक से विकसित नही हुआ । झगड़े होते रहते हैं घर में, पति-पत्नी में । ११-१ ह्रदय को विकसित करने वाले शास्त्र पढ़े, संध्या, जप करें । १-३ जीवनी शक्ति छोटे आंत में होती है तो जो ११ बजे तक भोजन कर लेते हैं उस भोजन का रस १-३ के बीच अच्छा मिल जाता है तो पूरे शरीर की अच्छी व्यवस्था हो जाती है । लेकिन जो ११ बजे तक भोजन नहीं करता और ११-३ के बीच भोजन करते हैं तो उनके छोटे आंत को गड़बड़ी रहती है । कच्चा रस मिलता है, कब्जियात भी होती है, एसिडिटी भी होती है । १-३ के बीच भोजन नहीं करना चाहिए । लगभग लोग ११-३ के बीच ही करते हैं, नुक्सान करता है । १-३ के बीच छोटी आंत में जीवनी शक्ति रहती है तो पानी पिए लेकिन खाये नहीं, छोटी आंत को काम करने में सुविधा रहती है । गाना भी गाता जाए और कोई बोले चना भी फाँकते जाओ तो या तो चना गिरेगा या तो गाना गड़बड़ हो जायेगा । चने भी चबाते जाओ, गाना भी गाते जाओ, या तो चने बिगड़ेंगे, या तो गाना बिगड़ेगा या तो दोनो बिगड़ेंगे । ३-५ जीवनी शक्ति मूत्राशय में होती है उस समय पानी पी लेना चाहिए और ५ के पहले-पहले निकाल  देना लेनी चाहिए । ५-७ के बीच जीवनी शक्ति आमाशय में होती है । ७-९ जीवनी शक्ति दिमाग में रहती है । दीमाग के काम कर लेने चाहिए । और ९-११ मेरु-रज्जू में जीवनी शक्ति रहती है, ९-११ की नींद थकान मिटने में सर्वोपरि है । और ११-१ नई कोशिकायें बनती हैं, नए सेल बनते है, जो ११-१ टीवी देखते हैं या ११ के बाद जागते हैं वो बूढ़े जल्दी हो जायेंगे, जो पढ़ते हैं या जैसे भी ११ के बाद जो जागते हैं, बुड्डे जल्दी हो जायेंगे । ११-१ जागना खतरनाक है और १-३ जागना तो और भयंकर, १-३ जीवनी शक्ति लीवर में होती है, १-३ जागने से पाचन-तंत्र, लीवर और निद्रा सब बिगड़ जाते हैं । १-३ के बीच जो जागेगा उसकी रोग प्रतिकारक शक्ति नहीं रहेगी, रोग प्रतिकारक शक्ति, अन्याय प्रतिकारक शक्ति, शोषण प्रतिकारक शक्ति नहीं रहेगी । ड्राईवरों को देख लो ट्रक ड्राईवर सबसे ज्यादा मेहनत करते हैं, पाँच कर्म-इन्द्रियाँ भी लगते हैं, पाँच ज्ञान-इन्द्रियाँ भी लगाते हैं, मन भी लगाते हैं, बुद्धि भी लगाते हैं, एक मिनट खाली मन, बुद्धि नहीं लगा, एक मिनट खाली आँखें बंद कर दीं तो ड्राईवर की मौत, ट्रक की मौत । इतनी मेहनत करते हैं फिर भी किसी ट्रक ड्राईवर का बढ़िया फ्लैट नहीं देखा होगा, कार नहीं होगी, बढ़िया बैंक-बैलेंस नहीं होगा । टोल टैक्स भी भरते हैं, आर.टी.ओ. टैक्स भी भरते हैं, लेकिन चार खाकी खड़े हो जाते हैं, सभी ट्रक वालों को रात को लूटते रहते हैं हाईवे पे, खुले आम लूटते रहते है, कोई उनको बचाता भी नहीं है, नहीं तो वो बचना चाहें, खाली अपनी प्रतिक्रिया करें तो हो जाए सब, जीवनी शक्ति मायूस है । १-३ के बीच पति-पत्नी के निमित्त भी नहीं जागना चाहिए, संतान प्राप्ति के लिए भी १-३ के बीच का खतरा मोल नहीं लेना चाहिए । ऐसे ही पर्वों के दिनों में भी पति-पत्नी का व्यवहार करने से संतान विकलांग आती है, अमावस्या, पूर्णिमा, होली, दीवाली, जन्माष्टमी, सत्संग में कितना ज्ञान मिल जाता है, बाप रे बाप । 
जोगी रे हम तो लुट गए तेरे प्यार में । ॐ ॐ ॐ आनंद ॐ प्रभुजी ॐ प्यारेजी ॐ 
 
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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

पूज्य श्री - सुरेशानंदजी प्रश्नोत्तरी

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