प्रश्नोत्तरी

परिप्रश्नेन विडियो

1 2 3 4 5

आध्यात्मिक

तात्त्विक

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

Admin 0 7295 Article rating: 4.0
 पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । 
RSS
1234

आश्रमवासी द्वारा उत्तर

How to obtain Saraswatya mantra diksha?

Admin 0 462 Article rating: No rating

Guruji I wanted a saraswati mantra diksha from you. I want to excel in my studies. Im surprised to see so much miracles and blessings you are showering upon your followers

RSS
12345679Last

ध्यान विषयक

निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

Admin 0 4408 Article rating: 4.3
श्री हरि प्रभु ! चालू सत्संग में जब मन निःसंकल्प अवस्था में विषय से उपराम होकर आने लगता है ,तो प्रायः निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

ध्यान की अवस्था में कैसे पहुंचे ? अगर घर की परिस्थिति उसके अनुकूल न हो तो क्या करे ?

Admin 0 2723 Article rating: No rating

ध्यान  की  अवस्था  में  कैसे  पहुंचे ? अगर  घर  की  परिस्थिति  उसके  अनुकूल  न  हो  तो  क्या  करे ?

RSS

EasyDNNNews

गुरुदेव ! सदा और सर्व अवस्थाओ में अद्वैत की भावना करनी चाहिए पर गुरु के साथ अद्वैत की भावना कदापि नही करनी चाहिए - ऐसा जो कहा गया है उसका रहस्य समझाने की कृपा करें।

Admin 0 6622 Article rating: 4.2
1 दिसंबर 2010
निरंतर अंक - 216

गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन में संशय उत्पन्न हो जाता है

Admin 0 4431 Article rating: 4.3
1 जनवरी 2011
अंक - 217
प्रश्न :- गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन मे संशय उत्पन्न हो जाता है। 
पूज्य बापूजी :- सब कुछ क्या जानते है ?
प्रश्नकर्ता :- जैसे कोई सही चीज हो तो उसके विषय मे मन में द्वंद उत्पन्न होने लगता है कि यह ऐसा है कि ऐसा है ?



RSS
123

Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

Admin
/ Categories: QA with other saints

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

बापूजी : मेरा प्रश्न हैं के जो सुना हुआ मानते है न श्रुति है, ठीक है ! सुना हुआ एक से दुसरे ने सुना
दूसरे से तीसरे ने सुना।
घाट वाले बाबाजी : हाँ, जैसा सुना वो कह दिया।
बापूजी : जैसे सुना तो अपनी-अपनी मति के अनुसार सुना होगा |
घाट वाले बाबाजी : ना-ना मति नहीं | शब्द से मति कंसर्न नहीं होता | शब्द तो वही होगा |
बापूजी : देखो | आपको किसी ने सुनाया | अच्छा आपकी जितनी धारणा है जैसी है, बढ़िया है तो
बढ़िया सोचा |
घाट वाले बाबाजी : जो शब्द सुना वही बोल दिया आपको |
बापूजी : शब्द सुना, बोल दिया, लेकिन जैसी मेरी मति होगी उस अर्थ से ही मैं समझूँगा और वैसे ही
बोलूँगा |
घाट वाले बाबाजी : तो अपना मति ठीक करो फिर | आपका मति हम क्यों
बापूजी : नहीं, नहीं | मेरे प्रश्न को आप समझें | के समझो हजारों व्यक्तियों से सुनते-सुनते आये एक
दूसरों से | तो सबकी अपनी-अपनी मति के अनुसार ही
घाट वाले बाबाजी : नहीं मति के अनुसार नहीं, जो सुनेगा वही कहेगा की अपनी मति से बना के
कहेगा ? एकांत में फिर चर्चा का विषय है ये | घाट पे फिर इसको प्रश्न को हल करेंगें | अच्छा चलो |
श्रुति का शब्द नहीं बदलता, शब्द भी अनादी है उसका |
बापूजी : शुद्ध अंतर कर्ण में प्रकट हुआ है | शुद्ध अंतर कर्ण ने झेला है इसीलिए उसमें अशुद्धि नहीं
आती | ऐसा कह सकते हो |

घाट वाले बाबाजी : शुद्ध अंतर कर्ण में तो प्रकट है ही है पर शब्द उसका अनादी है | शब्द में
परिवर्तन नहीं होता | ऐसे व्याकरण की बहुत सी गलतियाँ उसमें हैं, फिर वो गलती माना नहीं जाता |
बापूजी :  हाँ, व्याकरण की ऐसे तो गलतियाँ तो हैं क्योंकी बहुत लोग आ गये |
घाट वाले बाबाजी : बहुत नहीं, श्रुति के शब्द भी अनादी है |
बापूजी : उपनिषदों को ही तो श्रुति कहेंगें ना |
घाट वाले बाबाजी : हाँ, पहले सुनते थे लिखे पड़े तो पन्ना था नहीं उस वक्त | लिखने लगे तो पत्ते-वत्ते
पर लिखने लगे |
बापूजी : देखो पहले ऐसे ही बोलते थे | बराबर है ? फिर पत्ते पर लिखने लगे | फिर किताबों में आई |
अब केसिड में आ रही है बड़ी सुविधा है | इसमें गलतियों की संभावना कम है |
घाट वाले बाबाजी : पहले सुन लेते थे तो याद हो जाता था | अब तो हजार बार सुनो नहीं याद होता |
प्लेग के बाद | पहले दिमाग ठीक रहता था | एक बार सुन लें, सुन लिया | दुबारा पूछो तो लापरवाही
से सुना है | हम भी भूल गये जाओ | अर्जुन को कहा ना के जाओ हम भी भूल गये हैं | महाभारत के
बाद अर्जुन ने कहा के फिर से गीता सुनाइये | अब तो हम भूल गये हैं | हम भी भूल गये हैं जाओ |
लापरवाही से सुनने का है ?
बापूजी : तत्वज्ञान लापरवाही से नहीं सुनने का है | जो लापरवाही से सुनते हैं, उनको बार-बार सुनने के
बाद भी उतना फल नहीं होता है | और जो द्तचित हो के सुनते हैं ना वो ज्ञातगे होने लग जाते हैं |
बात तो ठीक है |
ये महाकथा चल रहा है | “देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब
बताइए आप |
घाट वाले बाबाजी : जो देखने में आता है, जो सुनने में आता है, जो जानने में आता है सब वो मूल
है, परमार्थ नहीं है |
बापूजी : परमार्थ क्या है ?
घाट वाले बाबाजी : परमार्थ क्या है ? परमार्थ है नानिरोधो, ना उत्पति, ना बधो, साध कर | ना मुमुक्षो,
ना मुक्तः इतिहास परमार्थ कर |
बापूजी : ये परमार्थ है | उसमें परमार्थ में सब अधिकारीयों की स्थिति कैसी होती है | परमार्थ में
स्तिथि कैसे हो ?
घाट वाले बाबाजी : परमार्थ में सभी स्तिथियाँ बाँधता नहीं | परमार्थ से कहीं बाहर जा नहीं सकता वो
|
बापूजी : परमार्थ तो आनंद स्वरूप है, सुख स्वरूप है तो लोग दुखी क्यों हैं फिर ?
घाट वाले बाबाजी : सब सुख के लिए जतन करते हैं |
बापूजी : देखोजी, परमार्थ से यदि कोई बाहर जा नहीं सकता है तो परमार्थ तो आनंद स्वरूप है |
घाट वाले बाबाजी : सभी आनंद के लिए जतन करते हैं |
बापूजी : तो फिर जतन क्यों करते हैं जब आनंद स्वरूप हैं |
घाट वाले बाबाजी : आनंद के लिए जतन करते हैं ना | आनंद जतन से पाना चाहते हैं | फिर भी जतन
आनंद के लिए करते हैं | ना करें तो आनंद तो है ही है |
बापूजी : हैं परमार्थ स्वरूप फिर दुखी क्यों हैं ?
घाट वाले बाबाजी : दुखी हैं के सुख चाहते हैं इसीलिए दुखी हैं |
बापूजी : हैं सुख रूप फिर सुख क्यों चाहते हैं ?

घाट वाले बाबाजी : सुख चाहते हैं दुःख भोगने के लिए और काहे के लिए |
बापूजी : सुख रूप हैं और दुःख भोगने के लिए !
घाट वाले बाबाजी : हाँ |
बापूजी : ऐसा तो कोई नहीं चाहता के मुझे दुःख मिले |
घाट वाले बाबाजी : सुख चाहता है ना, तो सुख चाहना ही दुःख है |
बापूजी : सुख की चाह छोड़ देवे | सुख की चाह ना करे |
घाट वाले बाबाजी : सुख की चाह ना करे तो सुख स्वरूप आत्मा तो है ही है |
बापूजी : अच्छा तो ये जो भाग-दौड़ है सुबह से शाम तक जिव मात्र की वो तो सुख के लिए ही है |
घाट वाले बाबाजी : सुख के लिए ही है और दुःख भोगते हैं |
बापूजी : इसीलिए दुखी हैं | सुख की चाह छोड़ दें तो -
घाट वाले बाबाजी : सुखी हो जाएगा सदा के लिए |
बापूजी : चाह कैसे छुटे ?
घाट वाले बाबाजी : सभी ??? छोड़ दो शरीर के लिए ????   शरीर अपना नहीं है | जो अपना नहीं है
अपना मान लिया यही दुःख है | जो अपना नहीं है उसको अपना मान लिया और जो अपना है उसको
अपना नहीं माना |
बापूजी : हाँ तो बचपन में ही माँ-बाप, कुटुंब, परिवार ये ही संस्कार डालते हैं के तू फलाना, तू फलाना,
तू फलाना | शरीर को तो पुष्ट करते हैं सब |
घाट वाले बाबाजी : उन्होंने पुष्ट कर दिया अब तुझे सुखी होना है तो छोड़ दो | उन्होंने जो बताया तो
सुखी है तो रहो, नहीं तो छोड़ दो |
बापूजी : अच्छा तो जिन्होंने बताया, देह में अहम बुद्धि करवाई और अहम बुद्धि से यदि सुखी रहे
तो करता रहो | और उससे कोई सार ना दिखा हो तो वेदों की बात मानकर संतों के और आत्मा में
अहम प्रत्ये करो | यही कहना है | अच्छा | फिर बोलते हैं भजन करो | भजन किसका किया जाए |
घाट वाले बाबाजी : भजन भगवान का करोगे तो भगवान ….
बापूजी : भगवान कौन सा बड़ा |
घाट वाले बाबाजी : जो सबसे बड़ा मानो उसी को भगवान |
बापूजी : नहीं सबसे बड़ा भगवान कौन है ?
घाट वाले बाबाजी : भगवान क्या १०-२० है ?
बापूजी : भई कोई बोलता है कृष्ण बड़ा, कोई बोलता है राम बड़ा, कोई बोलता है शिव बड़ा ……
घाट वाले बाबाजी : जो सबसे बड़ा है वो ही भगवान है | उससे बड़ा कोई नहीं है |
बापूजी : सबसे बड़ा कौन है ?
घाट वाले बाबाजी : सबसे बड़ा ब्रह्म है | उससे बड़ा कोई नहीं | ब्रह्म माने नारायण होता है |
बापूजी : अच्छा जी ब्रह्म | व्यापक होता है, शुद्ध, अनंत-अनंत शिव, कृष्ण, राम, अल्लाह, खुदा, सब
उसमें समा जाते हैं | वशिष्ठ और शिवजी का संवाद भी यही है - योगवशिष्ठ में | शिवजी कहते हैं के
हे मुनीश्वर ना ब्रह्माजी देव हैं, ना विष्णु देव हैं, ना मैं देव हूँ, ना तुम देव हो | देव तो वो परम है
चिदानंद स्वरूप, परब्रह्म | उसी के सहारे हम लोग, तुम लोग सब प्रतीत होते हैं | अच्छा, तो वो ब्रह्म
कैसे दिखे ?
घाट वाले बाबाजी : देखना छोड़ दो, दिख जायेगा |

बापूजी : देखना छोड़ दिया, आँखें बंद कर दें ?
घाट वाले बाबाजी : नहीं, बुद्धि की आँख बंद करो |
बापूजी : तो बुद्धों की बुद्धि की आँख ही तो बंद है ही है |
घाट वाले बाबाजी : बुद्धुओं की आँख बंद कैसे है |
बापूजी : बुद्धू लोगों को तो बोलते हैं के इसको तो बुद्धि ही नहीं, निर्बुद्धि है, मुर्ख है, उनको ब्रह्मज्ञान
हो गया |
घाट वाले बाबाजी : उनके कहने से थोडा, अपनी बुद्धि को छोड़ दो, आँख नहीं बुद्धि को बंद करो |
बुद्धि से सोचना बंद कर दो |
बापूजी : बुद्धि से सोचना बंद कर दें | अच्छा मन से संकल्प-विकल्प बंद कर दें | इन्द्रियों से देखना
बंद कर दें |
घाट वाले बाबाजी : सब देखो, सुनो लेकिन इनसे अलग रहो | देखना-सुनना इनका काम हैं हमारा नहीं
है |
बापूजी : अच्छा यही है उनसे ऊपर उठना | मन, बुद्धि, इन्द्रियों से जो कुछ हो रहा है ये प्रकृति में हो
रहा है, मुझ में नहीं | यही हो गया बुद्धि के पार जाना |
घाट वाले बाबाजी : ऐसे ही है | हाथ रखने से ज्ञान होता तो सभी पे हाथ रखता जाऊं तो ज्ञान होता
जाए |
बापूजी : वो भी आती है योगवशिष्ठ में कथा | और नहीं होता तो गुरु कृपा ही केवलम शिष्यस परम
मंगलम |
घाट वाले बाबाजी : गुरु युक्ति बता देगा, युक्ति से चलो, हो जायेगा |
बापूजी : युक्ति बता देंगें गुरु | कभी-कभी गुरु लोग संकल्प भी कर देते हैं |
घाट वाले बाबाजी : संकल्प कर देते हैं, संकल्प छोड़ना है के करना है |
बापूजी : नहीं उसका चित एकाग्र अपने योगबल से करा देते हैं थोड़ी देर में | कई ऐसे महापुरुषों के
जीवन में देखा-सुना गया है, अनुभव भी किया मैंने |
घाट वाले बाबाजी : थोड़ी देर के लिए हो सकता है |
बापूजी : नहीं तो रास्ता खुल जाता है ना | स्वाद आ जायेगा |
घाट वाले बाबाजी : कोई रास्ता नहीं खुलता | जब संकल्प खिंच लेगा तो वहीँ आ जायेगा |
बापूजी : तो आप संकल्प कर दो किसी पर हमारे साधक पर, मैं जरा टराए करूं कैसा होता है |
घाट वाले बाबाजी : कर दूँ, हो जायेगा |
बापूजी : आ जा केसरिया | अब ख़ास बात सुनो | प[पिता अपने सारे जीवन की कमाई जब मौज में
आ जाता है तो इधर-उधर देखता है कोई है तो नहीं फिर उस बच्चे को बोलता है के ये कुंजी ले ले,
ये फलानी-फलानी जगह तिजोरी है | ये मिल्क्त तेरी हो गयी | सारी जिंदगी का निचोड़ क्षण भर में
बाप दे सकता है हालाँकि वो मोह और ममता का सबंध है | तो संत तो निर्मम होते हैं | उनको फिर
देने में देर क्यों ? दे दो, आप जो ८० साल में कमाए हैं केसरिया को दे दो चलो |
घाट वाले बाबाजी : ८० साल में हम बीमार हुए हैं |

Previous Article ब्रह्म का साक्षात्कार किसको होता है ? - पूज्यश्री -घाट वाले बाबा प्रश्नोत्तरी भाग ३
Print
4170 Rate this article:
4.7
Please login or register to post comments.