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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी भाग २

आप कौन हैं बताओ ? ब्रह्म हैं ?

बापूजी : आप कौन हैं बताओ ? ब्रह्म हैं ?
घाट वाले बाबाजी : बस मैं क्या हूँ ये मेरे को पता नहीं आपसे पूछ रहा हूँ |
बापूजी : नहीं आप बताओ क्या हैं ?
घाट वाले बाबाजी : आपको बता तो दिया के आप बताओ के मैं क्या हूँ ? या केसरिया बता दे |
साधक : मैं क्या हूँ, वो जो दीखता है वो ही आप हैं |
बापूजी : हाँ, हाँ | मैं क्या हूँ, मुझे पता नहीं, ऐसा जो बोलता है वोही हैं आप |
घाट वाले बाबाजी : क्या हूँ मैं ? क्या हूँ ?
साधक : अनंत | वो अनंत-वनंत, ब्रह्म ये सब अपने समझने के लिए नाम है | उसका कोई नाम नहीं
वहाँ फिर चुप |
बापूजी : आप चुप हैं, जहाँ वाणी जाती नहीं, उपनिषदें जिसकी महिमा गाती हैं, वशिष्ठ जी जिसको
नमस्कार करते हैं, कृष्ण जिसके गीत गाकर थकते नहीं | शास्त्र जिसकी गरिमा गाते हैं वो आप हैं |
चुप हो  |चुप भी नहीं अचुप भी नहीं | चुप, अचुप दोनों से परे | तो परे भी नहीं, वहाँ वाणी भी नहीं
जाती है | बस बिलकुल बोलना बंद | शंकराचार्य ने कहा था सबके लिए एकांत वास, लघु भोजनात,
मौनम निराशा करुणा वरुदा | चित प्रसाद होता है | जल्दी से चित का प्रसाद मिलता है |
घाट वाले बाबाजी : साधक के लिए ?
बापूजी : हाँ
घाट वाले बाबाजी : साधक के लिए एकांत बढ़ाना चाहिए |
बापूजी : एकांत, अल्प आहार, इंद्रिय निग्रह | उससे तुरंत आत्म साक्षात्कार होता है |
घाट वाले बाबाजी : इंद्रिय निग्रह, शांत एकांत, इससे क्या होता है ? इंद्रिय के निग्रह से आत्मा का क्या
सबंध है ?
बापूजी : इंद्रिय निग्रह से मन पर असर पड़ेगा |
घाट वाले बाबाजी : मन से आत्मा का क्या सबंध है ?
बापूजी : मन और आत्मा एक ही तो है | जो विष्याकार है वो मन है और निर्विषय आत्मा है |
घाट वाले बाबाजी : निर्विषय आत्मा है, निर्विषय आत्मा, विषय मन है | निर्विषय होगा तो आत्मा है
नहीं तो नहीं |
बापूजी : नहीं तो वैसे तो सविषय भी आत्मा ही है |
घाट वाले बाबाजी : आत्मा में कोई विषय नहीं, निर्विषय-विषय कुछ नहीं | दोनों से परे है, दोनों का
साक्षी है |
बापूजी : हाँ तो परे है, साक्षी है, वो जानने के लिए भी तो अंतर कर्ण की स्तिथि चाहिए | शुद्ध अंतर
कर्ण में ही बोध होगा ना |
घाट वाले बाबाजी : अंतर कर्ण की शुद्धि, अशुद्धि से इसका कोई सबंध नहीं है |
बापूजी : अंतर कर्ण बाधित हो जायेगा |
घाट वाले बाबाजी : अंतर कर्ण प्रकृति का है और प्रकृति के पार है | प्रकृति से सबंध नहीं | प्रकृति जड़
है वो चेतन है | प्रकृति परिवर्तनशील है | व परिवर्तन है, दोनों का मेल भी नहीं होता | माना हुआ मन
है ना मानने से छुट जायेगा |
बापूजी : माना किसने ?
घाट वाले बाबाजी : मान लिया भई मान लिया | वो इतना शुद्ध है जो सामने आया उसी को अपना
जान लिया | अपना तो उसको दीखता नहीं | अपना भी उसको नहीं दीखता | अनंत है ना - अनादी,

अनंत को कौन देखेगा | अपना दीखता नहीं, जो दीखता है उसको अपना मान लिया | अनंत दिखने में
आ जाये तब तो अंत आ गया | नहीं दिखने में आता तो कल्पना ही है | दिखने में नहीं आता तो
कल्पना ही है | और देख लिया तो अंत वाला हो गया | अनंत देखा नहीं जाता, हम उसको देखना
चाहते हैं |
बापूजी : अनंत देखा नहीं जाता लेकिन देखने की इच्छा भी तो अनंत से ही उठती है |
घाट वाले बाबाजी : ज्ञान स्वरूप है ना | जानने की इच्छा तो है पर जाना जाता नहीं अनंत | जाना
जाता है तो दृश्य हो जाता है |
बापूजी : दृश्य भी तो वही है |
घाट वाले बाबाजी : दृश्य कल्पित है | दृश्य की सत्ता नहीं है |
बापूजी : दृश्य की स्वतंत्र सत्ता नहीं है, अस्ति बाती रूप में तो वही है |
घाट वाले बाबाजी : वो तो कल्पित है, कल्पित चीज होता ही नहीं प्रकृति होती है |
बापूजी : और प्रकृति से तृप्ति नहीं होती | जो भी प्रतीत होगा ना, जो भी इंद्रियों के विषय में आ गया
धन, सत्ता, वैभव, माल, कुछ भी, उससे तृप्ति नहीं होगा | प्रकृति से तृप्ति नहीं होती | यदि प्रकृति से
तृप्ति होती तो आज तक हो जाती | जिनको जितना भी मिला है और , और | देखिये, सुनिए, गुनिये
मन माहि | मोह मूल परमार्थ नाही | जो देखने, सुनने में आ जाता है वो सब दृश्य | तो दृश्य और
द्रष्टा का विवेक करने से भी लाभ होता है साधक को |
घाट वाले बाबाजी : वैराग्य के लिए करो, दृष्टा ही श्रीष्टा है |
बापूजी : दृष्टा ही तो श्रीष्टा है | जिस वक्त दृष्टा की जैसी दृष्टि वैसी श्रृष्टि |
घाट वाले बाबाजी : एक ही सत्ता है | दृष्टा, दृश्य के रूप में खेल कर रहा है |
साधक : जैसे बच्चा होता है ना, पिताजी होते हैं, फिर समझो के वो जब शांत होने वाले होते हैं
पिताजी तो वो जो अपनी असल जो चीज होती है यानि धन-दौलत- जेवरात, वो बच्चे को बुला के इधर
आ, यहाँ पर पड़ी है ना ये है | खास गुड़ बात | अखी जिंदगी तो कमा कमा के बनाया, एक सेकंड में
उसको दे देते हैं | ये कैसे प्रभु | आपने जो भी पाया, ऐसी कोई चाबी लगा दो के ऐसा हो जाए |
घाट वाले बाबाजी : चाबी तो लगा रहे हैं | चाबी तो इतना ही चाहे आज ग्रहण कर लो चाहे १०० वर्ष
के बाद ग्रहण करो |
बापूजी : बोलते हैं के रामकृष्ण ने विवेकानंद को बोला के मैं जिंदगी भर जो कमाया वो तेरे को दे
दिया | जैसे पिता अपने पुत्र को |
घाट वाले बाबाजी : जिंदगी भर कमाया वही दे रहा है वो | सौगात में | ये तो कमाई और क्या कमाई
|
बापूजी : ये तो खाली आप तो जेनरल बात कहते हैं | तो आत्मा का संकल्प भी कर दो इनके ऊपर |
घाट वाले बाबाजी : संकल्प छोड़ दो तो हो जायेगा | करो नहीं |
बापूजी : संकल्प छोड़ देने की भी तो आप कृपा करो |
घाट वाले बाबाजी : संकल्प हम कहते हैं के ना करें | संकल्प कौन करता है ?
साधक : पिताजी कमा कमा के बेटे को एक सेकंड में सब मसाला दे ही देता है |
घाट वाले बाबाजी : यहाँ पिता-पुत्र कोई नहीं है | यहाँ तो अद्वेत है, एक ही है, देना-लेना है ही नहीं |
साधक : हाँ देना-लेना तो है ही नहीं पर जो समझ नहीं है उसका बिलकुल एकदम समझ आ जाये,
देना-लेना तो है ही नहीं | जो कचरा-पट्टी है निकालकर फेंक दें |
घाट वाले बाबाजी : जो समझ से परे है उसको समझ में लाना कैसे ?

बापूजी : समझ से परे है ऐसा समझ में आ जाये, बस |
घाट वाले बाबाजी : यहाँ संसार भर की बुद्धियाँ समाप्त हो जाती हैं वहां से वो शुरू होता है | बोलो
कैसे समझोगे ? एक बुद्धि नहीं संसार भर की बुद्धियाँ यहाँ समाप्त हो जाती है | बुद्धि उसके बुल-
बुले हैं, बुद्धि समुद्र में लीन हो सकती है-बुलबुला | समुद्र को तो जान नहीं सकते |
बापूजी : अथवा तो समुद्र बुलबुले में आ नहीं सकता |
घाट वाले बाबाजी : बुलबुला समुद्र में लीन हो सकता है | समुद्र को जान नहीं सकता | अनंत में अपने
को विलीन कर लो | बस चिंता हटा दो |
बापूजी : विलीन करेगा तो कर्ता तो बना रहेगा |
घाट वाले बाबाजी : नहीं, प्रछिन हट गया तो विलीन हो गया, प्रछिनता का ही तो बंधन है | प्रछिन
हटेगा तो प्रछिन हो गया, अनंत में समा गया | बंधन तो प्रछिन मानने से है |
बापूजी : बोलते हैं अपना पता नहीं होता तो संत बताते हैं अपना पता |
घाट वाले बाबाजी : येही विचार करो मैं कौन हूँ |
बापूजी : वो तो करते-करते १८-१९ साल हो गये |
घाट वाले बाबाजी : उससे क्या हुआ ? जब तक पहुँचो नहीं मैं में तो करते रहो |
बापूजी :  अब पहुँचना क्या, वो तो अपना स्वरूप है | आत्मज्ञान क्या होता है ?
घाट वाले बाबाजी : आत्मज्ञान स्वतः सिद्ध है, सदा ही है |
बापूजी : मिलता क्यों नहीं है फिर ?
घाट वाले बाबाजी : मिला हुआ ही है सबको, ना मिलने की भ्रांति हो रही है |
बापूजी : भ्रान्ति कैसे दूर हो ?
घाट वाले बाबाजी : बस भ्रांति को भ्रांति जान लिया, दूर हो गया |
बापूजी : भ्रांति को भ्रांति कैसे जान लें ?
घाट वाले बाबाजी : भ्रांति को नहीं कौन जानता है ? नहीं को कौन जानता है ?
बापूजी : नहीं को हम जानते हैं |
घाट वाले बाबाजी : तो वही आप हो | नहीं को जानने वाला आप हो |
बापूजी : चित शांत हो जाता है |
घाट वाले बाबाजी : शांत है ही होता क्या है ? सदा ही शांत है | शांत होगा तो फिर अशांत भी हो
जायेगा | सदा ही शांत है | हो गया ज्ञान ? अब इतना होने के बाद भी ज्ञान नहीं हुआ ? अज्ञान जो
होगा चला भी जायेगा | ऐसा ज्ञान नहीं | ज्ञान तो सदा ही है | अज्ञान कब था ?
बापूजी : ज्ञान सदा है | तो फिर ज्ञान तो आनंद स्वरूप है, सुख रूप है तो लोग दुखी क्यों हैं ?
घाट वाले बाबाजी : तो गे को देखते हैं ना | उसको देखना छोड़ दो तो ज्ञान आनंद स्वरूप हो जायेगा |
बापूजी : गे को देखना, सच्चा मानना छोड़ दो, आनंद स्वरूप है ही |
घाट वाले बाबाजी : जो दीखता है वो है नहीं,
बापूजी : जो दीखता है वो है नहीं, और जो है वो दीखता नहीं है | तो दीखता क्या नहीं है ?
घाट वाले बाबाजी : जो दिख रहा है, सुनाई पड़ रहा है, स्पर्श हो रहा है सब जानने में आते हैं ना | तो
जानने वाला कौन है ?
बापूजी : जानने वाला है दृष्टा |
घाट वाले बाबाजी : वही दृष्टा आप हो |

बापूजी : देखो जी दृश्य की कल्पना करके दृष्टा है ना |
घाट वाले बाबाजी : चलो दृश्य को देखता है तो दृष्टा तो है कम से कम | दृश्य नहीं अपने आप को
देखो | दृश्य नहीं अपने को मानो |
बापूजी : दृश्य नहीं माना तो भी दृष्टा माना अपने को तो भी क्या हुआ ?
घाट वाले बाबाजी : दृष्टा को कोई दुःख नहीं है |
बापूजी : दृश्य की कल्पना से दृष्टा हुआ और श्रुति बोलती है “एक मेव द्वितय” | अब यहाँ दृश्य और
दृष्टा दो है ही है |
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