प्रश्नोत्तरी

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आध्यात्मिक

तात्त्विक

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

Admin 0 7542 Article rating: 4.1
 पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । 
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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

How to obtain Saraswatya mantra diksha?

Admin 0 463 Article rating: No rating

Guruji I wanted a saraswati mantra diksha from you. I want to excel in my studies. Im surprised to see so much miracles and blessings you are showering upon your followers

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ध्यान विषयक

निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

Admin 0 4603 Article rating: 4.3
श्री हरि प्रभु ! चालू सत्संग में जब मन निःसंकल्प अवस्था में विषय से उपराम होकर आने लगता है ,तो प्रायः निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

ध्यान की अवस्था में कैसे पहुंचे ? अगर घर की परिस्थिति उसके अनुकूल न हो तो क्या करे ?

Admin 0 2770 Article rating: No rating

ध्यान  की  अवस्था  में  कैसे  पहुंचे ? अगर  घर  की  परिस्थिति  उसके  अनुकूल  न  हो  तो  क्या  करे ?

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गुरुदेव ! सदा और सर्व अवस्थाओ में अद्वैत की भावना करनी चाहिए पर गुरु के साथ अद्वैत की भावना कदापि नही करनी चाहिए - ऐसा जो कहा गया है उसका रहस्य समझाने की कृपा करें।

Admin 0 7021 Article rating: 4.2
1 दिसंबर 2010
निरंतर अंक - 216

गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन में संशय उत्पन्न हो जाता है

Admin 0 4687 Article rating: 4.3
1 जनवरी 2011
अंक - 217
प्रश्न :- गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन मे संशय उत्पन्न हो जाता है। 
पूज्य बापूजी :- सब कुछ क्या जानते है ?
प्रश्नकर्ता :- जैसे कोई सही चीज हो तो उसके विषय मे मन में द्वंद उत्पन्न होने लगता है कि यह ऐसा है कि ऐसा है ?



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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

Admin
/ Categories: QA with other saints

ज्ञान स्वरूप है, आनंद स्वरूप है और प्राणी मात्र का सहृद है, उसको हम कैसे पायें । जिसको हम छोड़ नही सकते उसको कैसे पायें ? और जिसको हम रख नही सकते उसकी वासना कैसे मिटायें ?

पूज्य श्री - सुरेशानंदजी प्रश्नोत्तरी

पूज्य बापूजी - वह  ज्ञान स्वरूप है, आनंद स्वरूप है और प्राणी मात्र का सहृद है, उसको हम कैसे पायें । जिसको हम
छोड़ नही सकते उसको कैसे पायें ? और जिसको हम रख नही सकते उसकी वासना कैसे मिटायें ?


श्री सुरेशानंदजी - साधन भी गुरुदेव हमे सत्संग में बताते ही है। भगवान कृष्ण ने भी इसके बारे में गीते के १३वे
अध्याय में बहुत ही सुंदर ढंग से बताया है।  भगवान कृष्ण भी वही कर रहे थे जो आज पूज्य बापूजी कर रहे है। और
हम लोग वही कर रहे है जो बीच बीच में अर्जुन भी कर थे।  परन्तु अर्जुन जी की एक बहुत बड़ी विशेषता रही की
भले वो बीच बीच में  भगवान् की बात कह रहे थे, शंका कर रहे थे की आप ये जो कह रहे हो आपने ये ज्ञान सूर्य
को दिया था, सूर्य ने मनु को दिया था, मनु जी ने इक्ष्वाकु  को दिया था।  तो आप तो अब के है, सूर्य तो कब के
है । आपने सूर्य को कैसे दिया, ये शंका की।  भगवान् ने कहा के अर्जुन तेरे और मेरे कई जन्म हुए है।  तुम जानते
नही हो, मैं जनता हूँ | 

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||
तो अर्जुन ने ये बात सुनकर फिर दुबारा तर्क नहीं किया।  बीच बीच में प्रश्न शंका जरुर कर रहे है।  पर भगवान् की
हाँ में हाँ मिलाते गये।  तो विषाद से शुरू हुई भगवत गीता वो सत्य की विजय यात्रा पर पूरी हो गयी।

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