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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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ध्यान विषयक

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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रस कितने प्रकार के होते है ? विनाशकारी रस, हितकारी रस और मोक्षदायी रस में क्या फर्क है ?

पूज्य श्री - सुरेशानद जी प्रश्नोत्तरी

पूज्य बापूजी - रस कितने प्रकार के होते है ? विनाशकारी रस, हितकारी रस और मोक्षदायी रस में क्या फर्क है ?
श्री सुरेशानंदजी - प्रमाद रस, विषयी रस और भगवतिय रस इस प्रकार के रस होते है। विनाशकारी रस जो गुरुदेव
ने कहा उसको भगवान कृष्ण ने गीता में कहा – विषयेन्द्रियसंयोगाधत्तदग्रेमृतोपमम | परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं
स्मृतम ||


पूज्य बापूजी - नहीं उससे भी हल्का रस होता है तामसी, आलस्य, निद्रा, शराब, कबाब उसका मजा लेना, ये तामसी
रस है ।  इन्द्रिय विषयों का ये राजसी रस है ।  मंदिर में जाना, माँ बाप की सेवा, सजनता का व्यव्हार, भक्तिभाव ये
सात्विक रस है ।  और इष्ट देव को अपना, अपने को इष्ट देव का मान कर प्रीति पूर्वक भजना ये प्रेम रस है और
भी है ।
विचार का रस, ये शरीर है, ये मन है, ये बुद्धि है, ये सुख है ये दुःख है , ये सब दीखता है। तो जिससे दिखता  है वह नित्य है और जो दीखता है वह नित्य है। बहुत ऊँची बात है । अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः स्थूल सूक्ष्म कारण ये शरीर
अनित्य है । 
श्री सुरेशानंदजी - शरीर अनित्य है परन्तु अनित्य शरीर में सत्संग के अभाव और कुसंग के प्रभाव के कारण
आसक्ति हो जाती है परन्तु सत्संग में पहुँचते है आदरपूर्वक, कर्ण से ही नही अन्तःकर्ण पूर्वक गुरु की वाणी सुनते है,
निर्णायक होकर नही अपितु निष्ठावान होकर सुनते है ।
पूज्य बापूजी - निर्णायक होकर सुनोगे खाली होकर चले जाओगे ।

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