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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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ईश्वरीय वरदानों को जगाने की अष्टसूत्री

ईश्वरीय वरदानों को जगाने की अष्टसूत्री - लोक कल्याण सेतु – दिसम्बर २०१३ से

प्रत्येक व्यक्ति के अंदर ईश्वर के वरदान छुपे हुए हैं, प्रतिभाओं के भंडार भरे हैं | जिन्होंने अपने लक्ष्य को निर्धारित किया, अपने समय, श्रम और साधन को सही दिशा में नियोजित किया वे सफलता के शिखर पर आरुढ़ हुए है | परंतु जो इन्हें नजरअंदाज करते रहे, कुसंग क्षीण होते-होते आयु के साथ समाप्त हो गये | किशोरवस्था जीवन का एक ऐसा मोड़ है जिसका हरेक कर्म भावी जीवन को प्रभावित करता है | अत: सावधानीपूर्वक कदम उठाना चाहिए |

१७ वर्ष के श्रीकृष्ण ने अपने से कई गुना अधिक विकराल चाणूर, मुष्टिक, कंस आदि अनाचारी अत्याचारियों से इस धरा को मुक्त किया था | इसी उम्र में अर्जुन धनुर्विद्या में पारंगत एवं प्रवीण हो गये थे और युधिष्ठिर सत्यनिष्ठा के पुजारी हो चुके थे | आचार्य शंकर किशोरवस्था के पड़ाव तक तो अपने ज्ञान, कर्म, भक्ति, मंत्र आदि अनेकों विद्याओं में प्रवीण होकर जगतविख्यात हो गये थे | स्वामी रामतीर्थ, भगवत्पाद साँई श्री लीलाशाहजी महाराज, पूज्य संत श्री आशारामजी बापू आदि महापुरुषों ने युवावस्था में ही मानव-जीवन के परम लक्ष्य ‘आत्मसाक्षात्कार’ को पा लिया था | शहीद भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल आदि क्रांतिकारियों ने अपने लहू और प्राणों से जो शहादत देकर देश की परतंत्रता की बेड़ियाँ तोड़ीं, वह उम्र भी लगभग किशोरावस्था की ही थी | इस पुण्यभूमि पर इतिहास की धरा को मोदेनेवाली सिंहनी कुमारियों की भी कमी नहीं है | सीता, सावित्री, पार्वती से लेकर दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई ने किशोरावस्था में तप व तलवार की चमक से अनहोनी को होनी में बदल दिया | हर युवक –युवती एवं हर मनुष्य ऐसा पुरुषार्थ कर सकता हिया | आवश्यकता है तो बस उचित मार्गदर्शन की, सोये हुए आत्मविश्वास को जगाने की | ये योग्यताएँ जगाने के लिए बापूजी के सान्निध्य में दो-तीन ध्यानयोग शिविर आपके जीवन में चार चाँद लगा देंगे | आइये, जानें

कुछ सुवर्ण-सूत्रों को :

१) पूर्ण सफलता के लिए मानव-जीवन के परम लक्ष्य ईश्वरप्राप्ति पर दृष्टि रखना आवश्यक है | अपना प्रत्येक विचार, कर्म, वचन उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही हो तो चाहे आप उद्योगपति बनें, चाहे प्राध्यापक, चाहे और कुछ, आप अपने को तृप्त, कृतकृत्य
 पाओगे |

२) अपने समय, श्रम और साधन को लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लगाना चाहिए |

३) मनोरंजन के साधन स्वास्थ्य व ज्ञान वर्धक हों | फूहड़ दृश्य देखना, गप्पबाजी करना ये हममें विषाक्त विचार-भावों को जन्म देते हैं |

४) खानपान सात्विक तथा दिनचर्या को नियमित रखना चाहिए |

५) आकर्षण एवं लगाव श्रेष्ठता एवं उत्कृष्टता की ओर होना चाहिए |

६) सदाचार में इतने व्यस्त हों कि कुसंग, खराब आदतों में पड़ने के लिए समय ही न बचे |

७) सोच सकारात्मक रखें, कभी भी निराश न हों |

८) नैतिक मूल्यों के विकास. सुषुप्त शक्तियों के जागरण और प्राप्त शक्तियों के सदुपयोग हेतु ईश्वर में दृढ़ आस्था, ईश्वरप्राप्त महापुरुषों का सत्संग, दीक्षा, उनके उपदेशों का अध्ययन करें |

यह अष्टसूत्री जितनी सरल है, उतनी ही हितकारी भी है | आप इसे जीवन में उतारकर महान परिवर्तन का अनुभव कर सकते हैं |

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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