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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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अपनी खबर

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      तुम सो जाते हो, सपना  देखते हो, तो बड़ा विशाल दिखता  है । लेकिन जिसकी सत्ता से दिखता है उसके आगे वो तिनखे की नाई भी नही है । ना जाने ऐसे जगत कितनी बार बन-बन के नाश हो गये । लेकिन जिसकी सत्ता से रात को सपना  बनता है, उस सत्ता का पता नही होता । इसलिए सपने का जगत बड़ा लगता है और सत्ता नही भासती । सत्ता का ख्याल आ जाये तो ऐसे जगत तो रोज बन-बन के चले जाते हैं सपने में । ऐसे ही चेतन सत्ता के आगे ये जगत कुछ भी नही है ।
   जो सिनेमा के अंदर बैठे हैं अँधेरे में, तो पर्दे का जगत बहुत बड़ा लगता है । बाहर आ जाओ तो सिनेमा क्या होता है, थियेटर क्या होता है ? उसके पर्दे पर चल चित्र क्या कीमत रखते हैं ? सिनेमा थियेटर में देखोगे तो बहुत लम्बा-चौड़ा दुनिया दिखेगा एक पर्दे पे । लेकिन आकाश में आ जाओ, गगन मंडल में । जहाज में मुसाफरी करो तो थियेटर इतना लगेगा एक ईंट पड़ा है । ऐसे ही अपने आत्म विचार में देखो तो जगत अति तुच्छ भासता है । जब मूर्खता से देखते हैं, मोह-ममता से देखते हैं तो तेरा-मेरा ये बड़ा लम्बा-चौड़ा लगता है । जब ईश्वर को देखते हैं, आत्मा को देखते हैं, उसकी सत्ता को देखते हैं तो ये कुछ नही है । तिनखे की नाई है । इसीलिए बड़े-बड़े सम्राटों ने राज्य छोड़ दिया उस आत्मराज को पाने के लिए । लोग बोलते हैं कि बड़ा राज था, लेकिन जिनको जो आत्मराज मिला उसके आगे वो कुछ नही है । ॐ .... । एकांतवास, मौन, प्राणायाम, नियम और उत्साह । कईयों को अच्छी जगह मिलती है, पवित्र जगह मिलती है, जहाँ महान बनने की सम्भावना है, वहाँ भी ऐसे ही रह जाते हैं । और कई तो प्रतिकूलता में भी महान बन लेते हैं । जबतक रूचि नही होती है परमात्मा में, तब तक अनुकूलता मिल जाती है तो भी आदमी उपयोग नही कर सकता है । पहली शर्त है की रूचि होनी चाहिए । परमात्मा प्राप्ति की रूचि होनी चाहिए । परमात्मा के राज्य में पहुँचने की रूचि होनी चाहिए ।
    रूचि गोपीचंद की थी तो गुरु ने डाँटा, फटकारा धिक्कार दिया तो भी गोपीचंद डटा रहा । रूचि नही है तो गुरु पुचकारते हैं तो भी हम लोग भाग जाते हैं । आत्मपद में रूचि होनी चाहिए ।
   अविवेकी आदमी को संसार में रस आता है । और परम विवेकी आदमी को परमात्मा शांति में रस आता है । नियमित जप और प्राणायाम करें, भले १ घंटा, आधा घंटा निश्चित आसन पर बैठे, निश्चित समय पर बुद्धि सात्विक हो जायेगी । मन पवित्र होने लगेगा, शरीर निरोग होने लगेगा । राग, द्वेष के बिना चिंतन होता है । उस चिंतन का नाम मनोराज है । अज्ञानी को भी ऐसा होता है । किसी वस्तु में राग होता है तो उसका चिंतन होता है । किसी से द्वेष होता है तो उसका चिंतन होता है । और कभी-कभी राग-द्वेष नही होता है, फिर भी मन कि पट्टियाँ चलती रहती हैं उसको मनोराज बोलते हैं । इसीलिए ॐ करके उस पट्टी को काट देना चाहिए । फिर से एडजेस्ट हो जाती है । उसको फिर काट दो । गैप बढ़ जाती है उस पट्टी की । खाली जगह ब्रह्म है । बिना विचारों की जो जगह है वो ब्रह्म है । निद्रा ना हो, तंद्रा ना हो, जागृत ना हो । निद्रा भी ना हो, जागृत भी ना हो, सपना भी ना हो, तंद्रा भी ना हो, लय, रसास्वाद, मनोराज भी ना हो । बाकी की जो अवस्था है वो ब्रह्म है । निद्रा, तंद्रा, लय, रसास्वाद, मनोराज ये ना हो । अपने उस यार के सिवाय और किसी से मिलोगे तो बिछड़ जाओगे । अपने आप को खोजे बिना और किसी को खोजोगे तो विक्षेप होगा । इसीलिए अपने को खोजो, के तुम कौन हो ? कहाँ से आये हो ? आखिर कहाँ जाओगे ?
 खोजते-खोजते पता चल जायेगा के आत्मा हैं । ये देह तो छोड़ जायेंगे, जल जायेगा । देह जल जायेगा तो धन कहाँ रह जायेगा ? मिलकत कहाँ रहेगी ? देह के सबंधी कहाँ रहेंगे, कब तक रहेंगे ? इंद्रियों के रास्तो को रोको बाबा । बहुत हो गया । कबतक गटर में घूमोगे ? अब आत्मा रूपी शिखर पर चढ़ो । हाँ, गटर में फिसलना सुगम होता है, शिखर पर चढ़ना कठिन होता है । शिखर का अपना सौंदर्य है, अपनी हवाएँ हैं, अपनी खुशबु है, अपनी विशाल दृष्टि है । गटर में तो विशाल दृष्टि वाला भी कुंठित हो जाता है । दुर्जन का संग करता है तो सजन भी दुर्जन हो जाता है । इन्द्रियाँ बड़ी दुर्जन हैं । इन्द्रियोँ के भोग में जितना अधिक पड़ेगा उतनी बुद्धि कुंठित हो जायेगी, मन विक्षित हो जायेगा ।
    आत्मा के शिखर पर जितना भी चढ़ेगा उतना बुद्धि विशाल हो जायेगी । मन प्रसन्न हो जायेगा, प्रभु के गीत गूँजने लगेंगे । फिर तुम प्रभु हो जाओगे । प्रभु और तुम दो ना रहोगे । तुम्हारे गीत प्रभु के गीत हो जायेंगे । प्रभु के गीत तुम्हारे गीत होंगें । तुम्हारे दिल रूपी सितार से प्रभु का साज निकलेगा । तू खुद ही ईश्वर है, आनंद स्वरुप है, चेतन स्वरुप है ऐसा अनुभव करो । अपने आप में डुबो । बाहर के सुख के पीछे कब तक गुलामी करोगे ? कब तक जख मारते रहोगे ? कब तक दीन-हीन बनते रहोगे ? अपना असली राज्य छोड़कर भिखारियों का कटोरा कब तक लेकर घूमोगे ? ये मिल जाये तो ठीक, ये हो जाये तो ठीक, इतना खा लूँ तो ठीक, इतना देख लूँ तो ठीक । पहले अपने को तो देख लें, फिर देख लेना सब । ऐ मूर्ख इंसान रात-दिन तू भटक रहा है । तूने क्या खोया है, क्या पाना है जगत से तुझे, जो भटक रहा है ? तेरा खजाना तेरे पास है । तू अपने खजाने की ओर देख । ऐ ताल बे मंजिले, मंजिल किधर देखता है ? दिल ही तेरी मंजिल है, तू दिल की ओर देख । मंजिल के ताले, सुख के ताले, सुख किधर ढूँढता है ? तेरे दिल में सुख का दरिया लहरा रहा है, तू अपने दिल की ओर देख । बाहर की आँख बंद कर भीतर की आँख खोल । ऐ ताल बे मंजिले, मंजिल किधर देखता है ? दिल ही तेरी मंजिल है, तू दिल की ओर देख । मकान, दुकान, राज्य, धन, शरीर बिगड़ जाये लेकिन दिल नहीं बिगड़ना चाहिए । ॐ, ॐ, ……… । क्योंकि दिल में दिलबर रहता है । बुद्धि एक निश्चय करती है और दिल दूसरा कुछ कहता है । बुद्धि की बात हटा दो, दिल की मानो । क्योंकि दिल आत्मा के निकट रहता है, बुद्धि की अपेक्षा । तो दिल की आवाज सुन । वो क्या चाहता है । गहराई से सुन, पवित्रता से सुन । दिल की आवाज और मन की कल्पनाओं में फर्क । दिल तुम्हारा शांति और प्रेम, आनंद चाहता है । रजो-तमो गुण से आक्रांत जो मन है वो संसार का कीचड़ चाहता है । बुद्धि जब उसमें सहमति देती है तो कीचड़ की तरफ जाता है और बुद्धि विशुद्ध होती है, इंकार करती है, मन को फटकार देती है, सहयोग नहीं देती, तो इन्द्रियाँ बेचारी ठप हो जाती हैं । इसलिए आर्यों ने हमेशा बुद्धि को शुद्ध करने पर जोर दिया है । बुद्धि शुद्ध होगी तो व्यवहार शुद्ध होगा । शुद्ध बुद्धि के लिए  परमात्मा का नाम, जप, ध्यान, प्राणायाम । ये सब शुद्ध बुद्धि करने के लिए उपाय हैं । शुद्ध बुद्धि में ब्रह्मानंद झलकता है । जैसे शरीर में तो सारा चमड़ा है ही है । फिर भी जिव्हा पर ही मिठास आती है । जीभ और होंठों पर ही मिठास का स्वाद आता है । मुँह में ही मिठास आती है । है तो वहाँ भी चर्म लेकिन वहाँ पर मीठा को पकड़ने का, स्वाद को पकड़ने का खास जगह है । ऐसे ही ईश्वर तो है सर्व्याप्त । आपके रोम-रोम में ईश्वर चेतना है । हृदय में है, लेकिन जब शद्ध हृदय होता है तो उसका अनुभव होता है । जैसे मुँह खुलता है तो मिठास का अनुभव होता है । ऐसे ही अशुद्धि रूपी कंकड़, पत्थर हट जाते हैं, अशुद्धि रूपी पर्दा हट जाता है तो आत्मानंद का स्वाद आता है । और अपने को देह मानना बड़े में बड़ी अशुद्धि है । जगत को सत्य मानना बड़े में बड़ी अशुद्धि है । भोगों से मेरे को सुख मिलेगा ये बड़े में बड़ी अशुद्धि है, नालायकी है, अज्ञान है मन का । भोगो में सुख बुद्धि, जगत में सत्य बुद्धि, देह में अहं बुद्धि ये अशुद्धि के कारण हैं । आत्मा में अहं बुद्धि, जगत में मिथ्या बुद्धि और भोगों में विरक्ता बुद्धि ये शुद्धि के लक्षण हैं । ॐ, ॐ, …………। ।
    यदि गहराई से चिंतन करो ना तो आपको लगेगा जगत सपना है और व्यर्थ है । जैसे रात्रि का सपना, चालू सपना उस समय सत्य भासता है, जगने पर मिथ्या हो जाता है । ऐसे ही ज्ञान कि आँख से जगोगे तो ये जगत मिथ्या हो जायेगा । थोडा ही विवेक करो तो भी मिथ्या दीखता है । बचपन मिथ्या, जवानी मिथ्या, बीत गयी । कल की बात आज दिख रही है सपने तुल्य हो गयी । नदी, पर्वत, नाले, जंगल जहाँ बस्ती थी वहाँ उजाड़ हो गया । जहाँ उजाड़ थे वहाँ बस्तियाँ हैं । जहाँ खड्डे थे वहाँ पर्वत निखर आतर हैं, जहाँ पर्वत थे वहाँ समुद्र लहरा रहे हैं । चाँद सफर में, सितारे सफर में, दरिया सफर में, दरिया के किनारे सफर में । हम सफर में, तुम सफर में, ऐ साधक ये सारा जहाँ सफर में है । सपने का चित्र कैसे एक जैसा रह सकता है ? गहराई से देखो सब सफर में, सब बदल गया । बदलता जा रहा है । कहीं बस्तियां हो गयी, कहीं सड़कें हो गयी और कई सड़कें उजाड़ हो रही हैं । रोज, प्रति पल, प्रति सैकंड सब बदला जा रहा है । तुम्हारे शरीर के कण बदले जा रहे हैं । सत्य तो वो है जो कभी नही बदलता । विवेक से देखें तो भी ये जगत मिथ्या दीखता है । लोभी के आँख का प्याला कभी नहीं भरता । इस मिथ्या जगत के सुख में ही अपने को खो डालता है । और कल्पना वाले की कल्पना का भी अंत नही आता है । ईश्वर ईश्वर करके भटकता रहता है । बिना नाम के नामी को खोज रहा है । ईश्वर के ईश्वरत्व को जानो । भारतत्य दर्शन कहता है ईश्वर एक है । और वही भारत दर्शन कह रहा है, उसी दर्शन के तरफ ले जेन वाले ऋषि कह रहे हैं भगवान शंकराचार्य, भगवान शंकर, भगवान विष्णु, भगवान सूर्य फिर अनेक भगवान कह रहे हैं कि वो अनेक में है, है एक लेकिन जहाँ प्रकट हुआ अनेक में उसी का नाम है । अनेक नाम उसी के हैं । शिव में वही भगवान है, वशिष्ठ में वही भगवान है, विष्णु में वही भगवान है । उनको सदा प्रत्य्क्ष है इसलिए वो भगवान हैं । उस तत्व में, उस असलियत में "मैं " बुद्धि नहीं हुई इसलिए तुम अपने को अज्ञानियों के वचनों के अनुसार कुछ मान रहे हो वरना तुम भी वही भगवान हो । भरण करने की सत्ता हो, वो तुम हो । गमना-गमन की सत्ता तुम हो, वाणी को स्फुरने की सत्ता तुम हो । न, न करते भी जो बचता है वो तुम हो । सीधी तो बात है । अब अपने को न मानो तो तुम्हारी मर्जी । शास्त्र कहते हैं सर्वं खल्विदं ब्रह्म ॥ सब कुछ सब जगह वो ब्रह्म है, परमात्मा है, व्यापक है । हरि व्यापक सर्वत्र समाना । लेकिन तुमको इस चैतन्य में प्रेम होगा तो प्रकट होगा । आग लकड़ में पूरी भरी हुई है । जहाँ से प्रकट होती है उसकी विशेषता दिखती है । बड़वानल जल में रहता है लेकिन अप्रकट है, सामान्य रूप में है । उसका कोई विशेष फायदा नहीं मिलता । लकड़ी में अग्नि है लेकिन सामान्य रूप से है । जब प्रकट होती है तो उसका प्रकाश और तेज मिलता है । ऐसे ही तुम सामान्य रूप में तो हो चेतन, भगवान हो लेकिन पता नहीं । इसीलिए लाभ नही उठा पाते हो । पता चल जाये के आज तक जिसको दूर मान रहे थे, पता नही चला ईश्वर, ईश्वर कह रहे थे, वही मैं था । पता नहीं चला तो समझ रहे हैं ईश्वर हैं कहीं, हमसे दूर हैं । जब आप खोयोगे तो पता चेलगा मेरा ही नाम ईश्वर था । ये आपा बाहर का आरोपित था । सुन-सुन कर माना था मैं मफतलाल हूँ, जमनादास हु, आशाराम हूँ । मैं केवल राम हूँ । केवल राम कहो लेकिन इस शरीर को लेकर नहीं । तुम केवल ही राम हो । आशाओं के तो राम हो, आशाओं के दास नही । आशाओं के तुम आधार हो । लेकिन शरीर को लेकर नहीं । तुम्हारी असलियत को लेकर । ॐ, ॐ, ................... ।
   तुम्हारा देह तो परिश्रम से प्राप्त हुए है । माता-पिता के ४० दिन के परिश्रम, तुम्हारे खाने-पीने, जीने के परिश्रम । तुम सहज में ही प्राप्त हो । महनत से जो मिले वो माया है । सहज में जो मिले वो मालिक है । जो परिश्रम करके प्राप्त हो और अंत में रहे नहीं और होते समय भय, चिंता और शोक दे इसका नाम माया है ।
   कोई परिश्रम किये बिना स्वभाविक मिले । मिलने की खबर देते ही बेड़ापार कर दे । मिले तभी निर्भय और सम्राट बना दें । और वो कभी छूटे नहीं, कभी दीन ना बनाये इसका नाम परमात्मा है ॥

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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