प्रश्नोत्तरी

Q&A Videos

  • Loading videos, Please wait.

Q&A Audios

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 


आध्यात्मिक

RSS

तात्त्विक

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

RSS

आश्रमवासी द्वारा उत्तर

RSS

ध्यान विषयक

RSS
Admin

अपनी खबर 2

अपनी खबर 2


   कभी दीन ना बनाये इसका नाम परमात्मा है । तो बोले भगवान को पाने के लिए परिश्रम क्यों करना पड़ता है बाबाजी ? भैया मेरे, भगवान को पाने के लिए परिश्रम नहीं है । ईश्वर को पाने के लिए कतई परिश्रम की जरूरत नहीं है लेकिन जो कचरा-पट्टी हमने भर रखा है, जो बेवकूफी भर रखी है जन्मों की उसको हटाने के लिए महेनत है । ईश्वर को पाने के लिए तिनखा भर उठाने की भी महेनत नहीं । विशिष्ठ कहते है रामजी फूल, पत्ते और तांस तोड़ने में परिश्रम है । फूल के मर्दन में भी परिश्रम है । आशाराम कहते हैं कि चाय का कप बना हुआ रक़ीबी में उलटना भी परिश्रम है । कप को उठाके रकाबी से बाहर रखना भी परिश्रम है । अरे नादान और तो क्या चाय का घूँट भरना भी परिश्रम है । क्योंकि चाय चाहिए, रेकाबी चाहिए, बनाने वाला भी चाहिए, हाथ में आनी चाहिए फिर तुम्हारा मुँह झुकना चाहिए । चाय तुम्हारी ओर आनी चाहिए तब तुम एक घूँट भर पाते हो ।
उसमें इतना भी नहीं केवल तुम्हारी नादानी छूट जाये तो बस वो ही-वो है । हिन्दू, ईसाई, पारसी, पटेल को मनुष्य को मिलना हो तो कितनी देर लगेगी । केवल जो मान बैठे हो ऊपर-ऊपर का सब वो छोड़ दो तो पहले तुम मनुष्य हो बाबा । बाद में तुम हिन्दू, ईसाई, पारसी,…… पहले तुम मनुष्य हो । ऐसे ही पहले तुम ब्रह्म हो, बाद में जीव, फिर जात-पात ये बेवकूफी बाद में व्यवहार चलाने मात्र की है । भगवान पाने के लिए परिश्रम नहीं, बेवकूफी छोड़ने के लिए परिश्रम है । ईश्वर के पास आने की जरूरत नहीं है, ईश्वर से जितने दूर चले गये हैं ख्यालों से, उन ख्यालों को हटाने के लिए परिश्रम की जरूरत है । मैं करूं वैसा अँधा भी नहीं कर सकता है ।
   बंदगी का था कसूर बंदा मुझे बना दिया । मैं खुद से था बेखबर तभी तो सर झुका दिया । वो थे ना मुझ से दूर, ना मैं उनसे दूर था आता ना था नजर तो नजर का कसूर था । ये तुम्हारे गीत होंगें । अभी तो संतों के सुनाई पड़ते हैं बाद में तुम्हारे हो जायेंगें । अष्टावक्र बोलते हैं तब अष्टावक्र के वचन हैं । लेकिन जनक इतना सत पात्र है के घड़ी भर के बाद अष्टावक्र का अनुभव जनक का अनुभव हो जाता है । अब जनक का श्वास में उसका अनुभव मिश्रित हो जाता है । बन जाता है सतशास्त्र । अष्टावक्र किसी मुर्ख के आगे बोलते तो गीता ना पैदा होती । लेकिन जनक के आगे गीत गाये हैं, इसलिए गीता का जन्म हो गया ।
वशिष्टजी ऐसे ही किसी देहात्मी के सामने बोलते तो शायद योगवशिष्ठ जैसे पवित्र ग्रंथ का निर्माण ना होता । लेकिन पूर्ण आधिकारी हैं मर्यादा पुरुषोत्तम । हे रघुकुल के चंद्रमा शिष्य में जो लक्षण चाहिए वो सब तुम में हैं । त्याग, इन्द्रिय संयम, सरलता, नम्रता, विवेक, वैराग्य, षट सम्पत्ति की तीव्र इच्छा है तुम्हारे पास । साधक में जो लक्षण चाहिए वो तुम में हैं और गुरु में जो लक्षण चाहिए वो मुझ में हैं । मैं भी परम गुरु हूँ । मुझे अपना स्वरुप हस्तमल लकवत भस्ता है । मेरी सदा स्वरुप में निष्ठा है । देह में निष्ठा, ममता, अहम नहीं है । इसीलिए रामजी काम बन जायेगा और कम बन गया । रामजी कहते हैं भगवान अब मानो दूसरा ही वशिष्ठ हूँ । मुझे तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पद भी शोक संयुक्त भस्ता है । मैं इतना आनंद का दरिया हो गया हूँ । ब्रह्मा का सुख क्या होता है ? बाह्य ! विष्णु का पद क्या होता है ? विष्णु तत्व तो मेरा ही स्वरुप है लेकिन विष्णु का, शिव का पद क्या होता है ? वे तो एक-एक गुण के माया के अधिष्ट दाता हैं । माया जिससे फुर्ती है वो मैं स्व्यं महेश्वर हूँ । क्या मजे की खबर है । वाह ! वाह ! क्या शुभ समाचार है । ॐ  …………  सती सीतला हांडा ठार, बेडा तार । पंखा हांकते रहो सती सीतला को, राजी करते रहो । लेकिन सती सीतला तो तुम्हारी आत्मा है, उसको राजी कर लिया ना तो ऊँट पर, गधे पर और हँस पर और और वाहनों पर बैठने वाली देवियाँ तुमको देखकर प्रसन्न हो जाएँगी । क्योंकि तुम्हारा स्वरुप ही ऐसा है परम प्रसन्न, परम आनंद और वो तुम्हारे स्वरुप की सत्ता से ही तो देवियाँ हो भासती हैं । अब उनको तुम अपना स्वरुप नहीं जानते हो तो उनको कुछ विशेष समझते हो तो अपने को तुच्छ समझते हो । अपने को देह समझते हो तो तुम तुच्छ हो ही हो इसमें कोई शक नहीं है और यदि अपने को चैतन्य समझते हो तो तुम परमात्मा हो ही हो इसमें शक करना मूर्खों का काम है । अभागे लोग शक करते हैं । जिस दिल में परमात्मा होने में शक हो उस दिल को पिस्तौल लगा दो, अच्छा रहेगा । वो कोई दिल है ? वो तो धोकनी है । अपने ईश्वरत्व में, अपने आत्मा में, अपने चैतन्य होने में तुम्हे शक हो रहा है ?
अच्छा तुम चैतन्य नहीं हो तो क्या हो जड़ हो ? जड़ को पता है मैं जड़ हूँ ? नहीं के मैं मनुष्य हूँ । खड़ा है, जो दिख रहा है बाबा वो मैं हूँ । जो दिख रहा है उसको पता है वो मैं हूँ ? जो देख रहा है उसको पता है वो मैं हूँ ? नहीं । तो कौन बोलता है ? बाबाजी मन की सत्ता से बोलता है, इंद्रियों का सहारा लेकर । मन इंद्रियों का, जिव्हा का उपयोग करता है, तब ये बोलता है मैं हूँ ये । अच्छा तो मन की सत्ता लेकर बोल रहा है इंद्रियों का उपयोग करता हुआ तुम्हारा शरीर बोलता है ठीक है । तो मन को अपनी सत्ता है, जो इंद्रियों को सत्ता देता है । मन कभी कैसा, कभी कैसा ये तुम जानते हो । मन बदलता है, बुद्धि के निर्णय बदलते हैं । इन बदलने वाले को भी कोई देख रहा है की नहीं । बोले हाँ बाबा देखता तो है । वो कौन है, बोले वो मैं हूँ । तो वो तुम हो के ये शरीर तुम हो, ये तुम जरा ढूँढ के आ जाना । ॐ  …………… । गहराई से सोचना । सत्संग सुनकर फिर कहीं झंझट में मत पड़ जाना । सत्संग सुनकर अपनी गहराई में खो जाना तो पता चलेगा कि ऋषियों का अनुभव कितना तुम्हारे अनुभव के साथ जुड़ा है । तुम्हारा अनुभव और जिनका अपने स्वरुप में अहम प्रकटे हैं उनके और अपने अनुभव में कितनी दुरी है । जरा खोजो । जब ऋषि का वचन आपका वचन हो जाये, जब ऋषियों का अनुभव आपका अनुभव हो जाये तो ईश्वर का अनुभव आपका अनुभव हो जायेगा । तो आपको पता चल जायेगा आज दिन तक झख मारे थे संसार में । आज दिन तक जो भी समझा, सुना, देखा, सब बेवकूफी के ही अलग-अलग नाम हैं । जिससे देखा जाता है, सोचा जाता है, समझा जाता है उसको नहीं देखा, नहीं समझा, बाकी सब समझा, देखा ।  धूल पड़ी उसपर । ऐसा आपको अनुभव होगा । जैसे महान दरिद्र को चक्रवर्ती सम्राट बना दिया जाये, उसको आश्चर्य हो जायेगा । १०-५ का बल्ब जलता हो जिस घर में उस घर में सूर्य उतर आये । १० बाई ८ का जिस रसोड़े में आकाश है उस रसोड़े में पूरा आकाश आ जाये तो दिवाले दिखती ही नहीं हैं, पलायन हो जाती हैं । ऐसे ही जब बोध होगा तो ये कल्पनाओं की सत्यता तुम को दिखेगी ही नहीं । मैं देव हूँ, मेरी ये जात,मेरा ये धन है, मेरा ये मकान है । ये मेरे कर्म हैं, ये शुभ हैं, ये अशुभ हैं । ये सारी दिवाले, ईंटें, चुना, सब गायब हो जायेगा । रेती के कण सब हवा हो जायेंगें जब तुम्हारे रसोड़े में पूरा आकाश उतर आएगा । हकीकत में तो तुम्हारे रसोड़े में अभी भी आकाश है इसीलिए तो रसोड़ा है । आकाश ना होता तो रसोड़ा कैसे होता ? ऐसे ही अभी भी तुम्हारे देह में वही चैतन्य आकाश है । देहआत्म भाव हटा दो, तो उम विशाल गगनगामी जो पक्षी हैं उनके भी अधिष्टदाता हो । हवाई जहाज तुम में ही उड़ रहे हैं, तुमको अनुभव हो जायेगा । बाबाजी हवाई जहाज हम में उड़ रहे हैं ? हाँ, हाँ बिल्कुल । सूर्य भी तुम में ही खड़ा है । चाँद भी तुम में ही चमक रहा है । तारे तुम में टीम-टिमा रहे हैं । बृह्माण्ड तुम्हीं में बन-बनकर नाश हो रहे हैं । ऐसा तुम्हारा स्वरुप है । तुम पागलों की नाइ हांड-मास की देह को मैं मानकर अपनी असलियत को खो बैठे हो । ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी तुम्हीं में राज बना रहे हैं । लेकिन उनको अपने अहम में प्रकटे हैं । लेकिन तुमको देह में अहम है इसीलिए डरते हो, सुकड़ जाते हो, ये कैसे कर सकते हैं ? ऐसा कहोगे तो ब्रह्मा, विष्णु नाराज ना होंगें, तुम्हें आलिंगन करने को उत्सुक हो जायेंगें । ऐसा तुम यदि अनुभव करोगे तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश के लिए गिड़गिड़ाना ना पड़ेगा । ब्रह्मा, विष्णु, महेश तुम्हारी संगति कर लेंगे कि आज ये हमारा स्वरुप हो गया है, जीव शिव रूप हो गया है । बड़े में बड़ी उनकी प्रसन्नता हो जायेगी । बड़े में बड़ी उनकी पूजा हो जायेगी । सजातीय विचार वालों में सन्मति होती है, प्यार हो जाता है । कुटुंब में यदि विजातीय विचार है तो दुश्मनाहट हो जाती है । और दुरी वाले व्यक्ति में भी यदि सजातीय विचार हैं तो प्रेम हो जाता है । उसकी संम्पति आपकी हो जाती है । ऐसे ही फिर ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पद फिर आप ही के पद हैं । सच पूछो तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश और आप देखने भर को आप हैं और वे हैं वरना फिर... अब मुझे चुप होने के सिवाय कुछ नहीं आता । ॐ , ॐ,   ……………… । ये राज समझ में तो आता है समझाया नहीं जाता । इसीलिए ऋषि चुप हो जाते हैं । फिर भी उसके इर्द-गिर्द के इशारे तो करते हैं । ऋषि बोलते रहते हैं जीवन भर । जिसके लिए बोलना असम्भव है उसी के लिए बोलते रहते हैं । फिर भी वे समझते हैं के कुछ चूक गये, फिर बोलो । बोलते, बोलते  ....... फिर बोलते हैं के बोलने की गुंजाईश नहीं फिर चुप । क्योंकि वे पूर्ण हैं और पूर्ण के लिए कितना भी बोलो अपूर्ण ही रह जाता है । कितना भी समझायो फिर भी अपूर्ण ही रह जाता है । आखिर ऋषि ने ये महसूस किया होगा के पूर्ण मदः, पूर्ण मिदं, पूर्णात, पूर्ण मुदयचते, पूर्णस्य, पूर्ण मादाय, पूर्ण मेवावशिष्यते ॥ ऐसा करके ही अपने को संतोष, विश्रांत किया होगा । अपूर्ण कान, अपूर्ण वाणी, अपूर्ण मन, और खबरें दे रहे हैं पूर्ण की । इनमें वो पूर्ण आएगा नहीं लेकिन उस पूर्ण का चिंतन करते-करते ये खो जाते हैं । तुम अपनी कुहाड़ी इस पेड़ पर मारो, ये विधि वाक्य हैं । इस लकड़ पर, उस पटिया पर, ऐसे करते-करते स्टील के खम्बे पर कुहाड़ी मरवाते हैं । ताकि तुम्हारी कुहाड़ी की धार भुटी हो जाये । तुम्हारी कुहाड़ी कुहाड़ी ना बचे, खो जाये अपने असली लोहे पने में ।
   ऐसे ही तुम्हारी बुद्धि अपने असली ब्रह्म में खो जाये, इसीलिए बोलते हैं ब्रह्म का चिंतन करो । ब्रहम से ही तो बुद्धि, मन फुर्ती है । जगत का चिंतन करके उसको धार हो गयी विषयों की । अब ब्रह्म का चिंतन करो, अपनी धार भुटी करो । अपनी असलियत में जगाओ । जो आज तक अपने जीवन को काट रही थी । ॐ, ॐ,  …। कुहाड़ी लकड़ी को कटती है लेकिन सत्ता लकड़ी से ही लेती है । ऐसे ही तुम अपने जीवन को काटते हो जीवन की सत्ता लेकर ही । ॐ, ॐ,  …… । संसार की कोई ऐसी चीज नहीं जिसको देखकर, खाकर, पीकर, जिससे मिलकर आप उब ना जाएँ । चाहे कोई भी चीज हो धन, सत्ता, पत्नी, शराब, कीर्तन, ताल, मंजीरे, ठाकुरजी दिखने वाले जिसको भी आप देखो । आप उब जायेंगें । एक अपना आपा है जिसको आप जितना भी पियो, मिलो, सानिध्य लो, कभी उबान, थकान ना होगी । एक अपने आप से कभी थकान नहीं होती और सबसे थक जाते हैं । लेकिन अपने आप को कब छोड़ते हो ? जीवन को छोड़कर मौत को जाते हो, मौत को छोड़कर फिर जीवन में आते हो । उन दोनों को छोड़कर फिर समाधि में जाते हो । समाधि को भी छोड़ देते हो, फिर बाहर आते हो । लेकिन अपने आप को कभी नहीं छोड़ सकते । जिसको तुम कभी ना छोड़ सको वो परमात्मा है । वही तुम हो, तुम्हारा यार है और जिसको साथ ना रख सको वो माया है । सीधी तो बात है । ढूढ़ते जाओ जिसको तुम छोड़ नहीं सकते वो कौन है ? और जिसको रखने के बाद भी तुम रख नहीं सकते हो वो कौन है ? वो धोखा है, माया है । और जिसको जितना भी पर्यटन करने के बाद भी ना छोड़ सको तो वो परमात्मा है, ईष्वर है ।
   मैं मर जाऊँ तो सुखी हो जाऊँ । तो तुम तो हो, शरीर बदलते हो, हज़ार-हज़ार शरीर बदल गये, मर-मिट गये लेकिन तुम नहीं मिटे यार । हज़ार-हज़ार बुद्धि के निर्णय, मन के भाव बदल गये, मिट गये लेकिन तुम ना मिटे । जो ना मिटा वो ईष्वर है, जो मिट गया वो माया है । बस इतना ही कहना है फिर भी कुछ रह जाता है क्योंकि तुम पूर्ण हो ।  ॐ, ॐ,  ............. ।
अजित सिंह ने शराब पी ली थी । मवालियों के टोले में कुछ दिन सहमत हो गया । था तो सम्राट । भांग, शराब, भंगेड़ियों के संग में धीरे-धीरे वो अपने को एक दीन-हीन व्यक्ति मानने लगा । था तो राज-पाठ का अधिकारी, था तो सम्राट । पिता ने राज-तिलक कर दिया था । लेकिन राज-तिलक भूल गया और भांग के नशे में चला गया भंगेड़ियों के संग में । फिर भिक्षा कहाँ मिलती है, रुपय ज्यादा कहाँ मिलते हैं ऐसी चर्चाएँ सुनते, सुनाते इसकी भी रूचि हुई चलो सम्राट बहुत दाता है, दान देता है । एकादशी को, अमावस्या, सावन का महीना, पुरुषोत्तम का महीना में विशेष दान करता है । जब कभी मौज आ जाये तो एक एक-दो, ५-१० अशर्फियाँ भी दे देता है । अजित सिंह नशे में सुबह उठा और द्वारपालों के आगे गिड़गिड़ाया के मुझे सम्राट के पास जाना है । मुझे जाने दो । देखते हैं कि है तो राजकुमार, सम्राट । लेकिन हालत बुरी है । बोलते हैं यार तू तो सम्राट जैसा लगता है । अजित सिंह कहता है लगता सम्राट जैसा हूँ, लेकिन हूँ बहुत गरीब । मुझे जाने दो । फिर दूसरे सिपाही मिले आगे । उन्होंने भी कहा तू तो हमारे सम्राट जैसा लग रहा है । बोला ऐसा मत कहो मैं तो बहुत गरीब हूँ । मुझे जेल में डाल देंगें । आये राज-दरबार में तो वर्ष के अंतिम दिन थे, वजीर हिसाब-किताब देख रहे थे । चश्मा चढ़ा था । वजीर को कहा कृपा करके मुझे सम्राट से मिलवा दो । वजीर ने चश्मा उठा के देखा तो ! अभी मैं इनके ही आदेश की राह देख रहा हूँ और ये मारा-मारा फिर रहा है । हाय ! रे नशा तेरा दुर्भाग्य । उसने कहा मैं आपको सम्राट से मिलवा दूँ, आप क्या चाहते हैं ? उसने कहा एक-आध अशर्फी चाहता हूँ, बहुत दुखी हूँ । बोले सम्राट तब मिलेंगे जब मेरी बात मानोगे । दही और घी, तुलसी के पत्ते मिले हुए होंगें । एक कटोरी आप पी लो, तो मैं आपको सम्राट से मिलवा दूंगा और कभी आपसे दूर भी ना होगा । एक कटोरी पी ली, दही घी मिश्रित । नशा उतरा । वजीर कहता है अब मैं तुम्हे सम्राट से मिलवाने की कोशिश कर रहा हूँ । सम्राट कहता है के सम्राट मुझसे जुदा कब था । ये तो मेरी बेवकूफी थी, मेरा नशा था । नशा उतरते ही मुझे पता चला मैं ही सम्राट हूँ । नाहक भिखारियों के संग में भीख माँग रहा था ।

Print
7479 Rate this article:
No rating
Please login or register to post comments.

Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

RSS