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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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ध्यान विषयक

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Admin

अपनी खबर 3

अपनी खबर 3

    ऐसे ही अज्ञान का नशा उतरता है तो पता चलता है मेरा ही नाम ईश्वर, ब्रह्म, सुख, चैतन्य था । सभी देह को "मै" मान बैठे हैं इसीलिए सोच रहे हैं के कहीं और बैठा है । पुकारो, चीखो, चिलाओ तो आयेगा । चीखने, चिल्लाने से तो कभी आया नहीं । अपनी बेवकूफी को छान-छान के दूर करो फिर कभी तुमसे दूर गया ही नहीं है । बस इतना ही कहूंगा । ज्यादा कहने को कुछ बचता नहीं है । फिर भी कुछ रह जाता है । ॐ, ॐ,  ............. । इस राज को जो समझते हैं वे चुप हो जाते हैं । क्योंकि वाणी का विषय नहीं है । कोई-कोई महापुरुष नितांत साहस करते हैं और जिन्होंने ज्यादा साहस किया वे शूली पे चढ़ाये गये । जहर के प्याले उन्हें दिए गये । नासमझ अरबों, खरबों में हैं और इस राज को समझने वाला कभी-कभी कहीं-कहीं पर कोई-कोई है । बहुमति तो मूर्खों की ही होती है, बुद्धिमानों की नहीं । और बुद्धिमानों में भी तत्व वेताओं की तो बहुमति होती ही नहीं । जगत में बुद्धिमान १०००-२००० कहीं मिल सकते हैं लेकिन आत्मवान तो कभी-कभी कहीं-कहीं होता है । जो इस विशाल अनुभव को, इस विशाल सत्य को, नग्न सत्य को स्वीकार करने की बुद्धि को जोड़ पाये वही सच-मुच बुद्धिमान है । बाल की खाल उतरने वाले तो कई हैं । अक्ल सिखाने वाले तो कई हैं । कोर्ट और कचहरियों में मुकदमे लड़ने वाले तो कई हैं । लेकिन मौत से पार जानने वाला कोई तरकीब वकील मिल जाये । असली ग्राहक से निपटने वाला कोई असली सतपिता मिल जाये । कोई सद्गुरु मिल जाये तब पता चलता है के ये सब कई मुकदमे लड़ लेते हैं लेकिन मौत का मुकदमा लड़ना बाकि रह जाता है । कई ग्राहकों से निपटते हो लेकिन आखरी ग्राहक, मौत रह जाता है । कई भोग ले सकते हो लेकिन मृत्यु के एक झटके में सब छूट जाता है । धन्य हैं उन पुरुषों को जो ज्ञान के एक झटके से अज्ञान को तोड़ देते हैं । और सदा-सदा के लिए तुम्हे सम्राट बना देते हैं, मुक्त बना देते हैं । फिर ३३ करोड़ देवता भी मिलकर तुम्हे सताना चाहे, तुम्हे दुखी करना चाहें वे नहीं कर सकते हैं ।
वो चाहते ही नहीं हैं । वे तो तुम्हारी कृपा चाहते हैं बाद में । तुम यदि बोधत्व को उपलब्ध हो जाते हो, अपने आप को ठीक से जान लेते हो, तो वे देवता तुम्हारा दर्शन करके अपना भाग्य बनाया करते हैं । तुम्हारी कृपा लेकर अपना वैभव सजाया करते हैं ।
उपनिषद कह रही है तुम्हारी बात |
यो वै ब्रह्मैव जानाति तेषां देवानां बलिं विहति।।
जो ब्रह्म जो जनता है देवता लोग उसे नमन करते हैं, बलि देते हैं । मैं आनंद स्वरुप था ये मुझे पता ना था । मैं आनंद स्वरुप नहीं हूँ ऐसी जो मेरी मति थी वो दुर्मति थी । अब कहाँ चली गयी कोई पता नहीं ।
नास्ति ब्रह्म सदानंदम इतिमे दुर्मति स्थिता: |
क्व गतासा न जानामि यदाह्म त्वं वपो स्थिता: ||

   मैं आनंद स्वरुप, ब्रह्म स्वरुप नहीं हूँ ऐसी जो मेरी मति थी वो मेरी दुर्मति ही थी । अब जब मैं ब्रह्म स्वरुप हो गया तो वो मेरी दुर्मति कहाँ चली गयी इसका पता ही नहीं ।
जिसको मति लखती है वो जगत है, और जो मति को लखता है वो जगदीशवर है । बस यही मैं कहना चाहता था । और ज्यादा कुछ नहीं कहता । फिर भी कुछ रह जाता है ।
मति ना लखे, जो मति लखे सो मैं शुद्ध अपार ॥
     जिसको बुद्धि नहीं देखती, जो बुद्धि को देखता है । जहाँ वाणी नहीं पहुँचती, लेकिन जिससे वाणी पहुँचने की कोशिश कर रही है । जहाँ तुम्हारी नजर नहीं जाती लेकिन जिससे तुम्हारी नजर दौड़ती है । वो चेतन आत्मा है और वो तुम हो । इतना ही कहता हूँ, फिर भी कुछ रह जायेगा । ॐ, ॐ,  …। ये ब्रह्म विद्या पवित्र दिल में प्रकाशित होती है और अपवित्र दिल को शुद्ध कर देती है । इसका एक वचन सुनने वाला भी हजारों गौ दान करने वाले पुण्यआत्मा से कम नहीं है वो । एक क्षण भी तुमने इस वचन को गहराई से सोचा, सुना, मनन किया तो स्वर्ग का सुख तो पक्का है । लेकिन मैं जनता हूँ के मेरे साधक इतने लोभी नहीं, इतने इंद्रियों के गुलाम नहीं के यहाँ के भोग या स्वर्ग के भोगों के लिए अपना जीवन व्यर्थ करेंगें । वे जीवन के मूल्यों को जानते हैं । एक क्षण-क्षण बड़े कीमती हैं । श्वास खत्म हो जाये तो लाख रुपया भी खर्चने से एक श्वास भी ज्यादा नहीं ले सकते हैं । श्वास चलाने वाले डॉकटर बेचारे मर जाते हैं तो हमारी तुम्हारी क्या ताकत है ? निकला हुआ तीर वापस नहीं लौटता, निकला हुआ शब्द वापस नहीं आता । ऐसे ही बीता हुआ श्वास वापस नहीं आता । जीवन की खूब कद्र करो । व्यर्थ की चर्चाओं में, हां-हां, हूँ-हूँ में समय मत व्यर्थ गवाओ । पहले अपना काम निपटा लो । एक बार अपने घर होकर आ जाओ फिर जगत में घूमोगे, उठोगे, बैठोगे तो तुम्हारी हर अदा संसारियों के लिए कृपा हो जायेगी । तुम्हे करनी नहीं पड़ेगी हो जायेगी । तुम्हे लोगों का, अपना कल्याण करना ना पड़ेगा, हो जायेगा । जैसे सूर्य के उदय होने से सब काम होने लगते है, सूर्य को कृपा करने, रौशनी देने के लिए परिश्रम नहीं करना पड़ता है, करोड़ों-करोड़ों जीव उससे लाभविंत होने लगते हैं । ऐसे ही सूर्य का सूर्य तुम अपने आपको जब अनुभव करने लगोगे तो पता चेलगा पूरी प्रकृति पर करुणा कृपा बरस रही है तो मेरे द्वारा ही बरस रही है । फिर आपको कोई योजना नहीं बनानी पड़ेगी आपकी हर हरकत लोगों के लिए कल्याणदाई हो जायेगी । मनुष्य ही नहीं पशु और पक्षी के लिए आपका होना सार्थक हो जायेगा । सच्चा बड़े में बड़ा काम तो ब्रह्मवेता ही करते हैं । जिन्हें हम आलसी, बाबाजी या मुफ्तिया कह लेते हैं नादानी में बड़े में बड़ा करुणा-कृपा का कार्य तो उन्हीं के द्वारा होता है और बिना परिश्रम के, बिना बताये होता है ।  हम लोग थोडा करते हैं तो बोलते हैं ये किया वो किया । अपने आप में जो मस्त हैं उन्हें छूकर जो हवा जा रही है वो भी सुख और शांति के पैगाम दिए जा रही है । सच्चाई की खबरें भीतर से जगा रही है ।
       तो सच्चे में सच्चा देखना है तो ब्रह्मवेता को ही देखना है । महान में महान परोपकारी है तो वो ब्रह्मवेता ही है और वो ब्रह्मवेता तुम हो सकते हो । ब्रह्मवेता और तुम दूर नहीं हो । ब्राह्मणवता और तुम एक ही हो । यही मैं कहना चाहता हूँ । आगे कुछ बचता नहीं है, फिर भी कुछ रह जाता है । ॐ, ॐ,   ................... । रामतीर्थ कहते हैं मैं बुद्ध, कबीर, नानक, जीसस, मंसूर होकर आया लेकिन लोग मुझे ना समझ पाये । मैं कृष्ण, राम बनकर आया लेकिन लोगों ने मुझे विनोद में ही ना सुना । अब रामतीर्थ होकर आया हूँ । लेकिन तुम नहीं समझ पा रहे हो । क्या शुभ समाचार है, क्या असलियत है ? आशाराम भी तुमको यही बात कहता है के अनेक-अनेक रूप तुम्हारे हमारे हैं और अभी भी कहीं आशाराम कहीं कुछ कहीं कुछ होकर आयें हैं । और हम भी यही कहते हैं तुम भी वही हो जो अनंत, अनंत सम्भावनाएँ हो सकती हैं । मानो तो इसी घड़ी निहाल हो जाओगे, स्वर्ग में जाकर क्या सुख लोगे ? स्वर्ग के अधिष्ठाता तुम्हारे पैर छूने वाले की सेवा करने को तैयार हैं ।
     भृगु ऋषि के पैर छूते थे शुक्र, सेवा करते थे । थोडा ध्यान किया । धारणा सिद्ध हुई । शुक्र को दिखी विश्वाची अप्सरा, चित मोहित हो गया, शुक्र चले गये अप्सरा के मोह में आकर । शुक्र नितांत मुर्ख भी नहीं थे और ब्रह्मवेता भी ना थे । त्रिशंकु की नाइ थे वे । जैसा संग मिल गया, जैसा देख लिया ऐसी इच्छा हो जाती थी । नितांत मुर्ख नहीं थे के कोई संकल्प सिद्ध ना हो और पूर्ण ज्ञानी नहीं थे के कोई संकल्प उठे ही नहीं । चिंतन करते-करते वे सूक्ष्म शरीर से विश्वाची अप्सरा के पीछे गये । वे पहुँचे स्वर्ग में इंद्र के पास । इंद्र को पता चला के भृगु का सेवक शुक्र आ गया है । इंद्र ने अपने सिंघासन पर शुक्र को बैठाया और अर्गपात से पूजन किया । हालांकि इंद्र देवता है दूसरे की मन की बात को जानता है । फिर भी ब्रह्मवेता का सेवक है चाहे विश्वाची अप्सरा के पीछे ही आया है । लेकिन सेवक तो ब्रह्मवेता का है, इसका पूजन करने से स्वर्ग की शोभा बढ़ती है । और बाद में कहा इन्हें विहार कराओ । स्वर्ग में बहुत भोग भोगे । ऐसा कोई भोग नहीं अपने आत्मा के सिवाय जिसमें से आपको उबान ना आये अथवा चेतन नाश ना हो जाये । शुक्र का चेतन, तत्व नाश ना हुआ लेकिन उनकी रूचि, पुण्य नाश हो गया । गिराए गये और ब्राह्मण के घर जन्म लिया । विश्वाची को भी गिराया गया, उसने राजकन्या होकर जन्म लिया और फिर उनकी शादी हुई । ससुर राज-पाठ देकर चले जाते हैं । ये भोगते हैं राज पाठ को, सोचते हैं स्त्री, भोग महा आपदा है । दोनों को छोड़कर चला गया जंगल में । लेकिन अपने को नहीं छोड़ पाया अब तक । भृगु जी के आश्रम को छोड़कर स्वर्ग पहुँचा, फिर ब्राह्मण के घर पहुँचा । ब्राह्मण को छोड़ दिया राज्य में पहुँचा । फिर राज्य को छोड़कर जंगल में गये । अब जंगल को छोड़कर मौत में पहुँचेगा । फिर मौत को भी छोड़कर तपस्वी वेश में पहुँचेगा । अपने को वो छोड़ नहीं सकता है । इस प्रकार उसने कई जन्म पाये । कभी पशु कभी पक्षी कुछ वृक्ष कभी कुछ हुआ । चीखते-चीखते प्राण दिए । फिर ब्राह्मण के घर आया कई जन्मों के बाद । तब भृगु जी की समाधि खुली, देखा के मेरा पुत्र जो मेरी तीनों पहर सेवा करता था और मैं समाधि में लग गया, वो भी समाधि करता था । चिरंजीवी था वो । इसको किसने मारा ? भृगु ऋषि कोप में आ गये । श्राप देकर कालपुत्र को भस्म करता हूँ । मेरे पुत्र को काल ने ही मारा है । कुपित हो गये, धरती काम्पने लगी । महासमाधि में से उतरे । उनके कोप को देखकर काल मूर्तिमंत होकर विशाल काया धरकर प्रकट हुआ और कहा ऋषि आप कोप ना करिये । और तुम्हारे कोप से मेरा कुछ नाश नहीं होगा । समय की धारा में तो हमारे-कई आये गये । ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी समय की धारा में ले लेता हूँ । मेरा तो सब भोजन हैं, खिलौने हैं । आकाश को कोई पत्थर मारे तो आकाश को क्या हानि ? पत्थर मारो किसी देहधयसी को, किसी वस्तु को । मैं तो निराकार हूँ । मेरी कोई आकृति नहीं है । मनुष्यों ने कल्पा है मुझमें दिशा, काल । मैं तो एक ही रस हूँ क्योंकि मेरा प्रादुर्भाव एक रस से ही है । इसीलिए ऋषिवर तुम मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते । मैं श्राप से भयभीत होकर तुम्हारे आगे प्रकट नहीं हुआ हूँ । लेकिन तुम्हारे जैसे बोधवन यदि क्रोध करें तो औरों का क्या हाल होगा । ये प्रार्थना करने को प्रकट हुआ हूँ । तुम्हारे पुत्र को काल ने नहीं खाया, उसको वासना ने खाया है । काल नहीं मरता, मौत नहीं मरती, इच्छाएँ, वासनाएं ही मारती है । जब शरीर पूरा हो जाता है तो इच्छाएँ रह जाती है और उन्हें पूरा करने के लिए फिर उसके हिसाब का चोला मिलता है । तो वासनाएं मारती हैं । तुम समाधि लगाकर देखो, मैंने तुम्हारे पुत्र को नहीं मारा, विश्वाची ने मारा है । वो विश्वाची के पास गया, इंद्र ने उसका पूजन किया । भोगी की पूजा करो तो भी उसकी भोग की वासना नहीं जाती । ज्ञानी का, योगी का अनादर करो फिर भी उसकी ज्ञान की मस्ती नहीं जाती । भोगी को पुरे भोग दे दो लेकिन उसकी वासना नहीं मिटती । शुक्र विश्वाची के साथ भोग भोगते-भोगते मिट गया फिर ब्राह्मण हुआ, फिर ये हुआ, फिर वो हुआ, अभी गंगा के किनारे ब्राह्मण पुत्र तप कर रहा है । दोनों गये गंगा किनारे देखा तप कर रहा है । वहाँ तो शरीर सुखा है । उस शरीर को हिंसक पशु-पक्षियों ने नाश नहीं किया क्योंकि वो अहिंसा प्रदान भृगु का आश्रम था । एकांत था । मानसिक, शारीरिक हिंसा करने वाले लोग आते नहीं थे । जहाँ संत एकदम अकेले रहते हैं वहाँ उनके पूरे वाइब्रेशन मिलते हैं । जहाँ लोगों का आना-जाना होता है वहाँ संत के वाइब्रेशन कम होते हैं लेकिन नाश नहीं होते । शुक्र का शरीर मात्र शून्य बचा था । पक्षियों ने अपने घोसले बना लिए थे । पवन जब गुजरता था तो बांसुरी जैसी आवाज निकलती थी उस शरीर में से । उनके दांत भी बाहर निकल आये थे । मनो अपने नश्वर जीवन को हँसता है । भोग की वासना को हँस रहा है, मनो खबर दे रहा है के अंत में ये हाल है । भृगु ऋषि ने अपने संकल्प से उसको वहाँ से जगाया, उपदेश करने के लिए । इतने भोग भोगने के बाद भी उसे कहीं संतोष नहीं हुआ और शुक्र और तुम एक ही हो, भृगु ऋषि और तुम एक ही हो,  भृगु ऋषि ने अपने को जाना कोई भी अपने को छोड़कर नहीं जा सकता है । सब छोड़कर चलते हो लेकिन अपने को कभी नहीं छोड़ सकते हैं । जैसे पानी में होते हुए हीरा हाथ में आया तो पानी में हैं इसीलिए नहीं बोल पते । जब बाहर आते हैं तो बोलते हैं । ऐसे ही नींद में आपके साधन कुंठित होते हैं लेकिन फिर भी आप हैं । नहीं देखने को भी तुम देख रहे हो, इतना ही कहना चाहता हूँ और कुछ बचता नहीं है लेकिन काफी रह जाता है । जबतक तुम ना जगोगे तो काफी रह जायेगा और जग गये तो कुछ नहीं रह जाता है । ॐ, ॐ,  ………… । इसी वचनों को तुम बार-बार दोहराते जाओ एकांत में सयमी जीवन गुजारते-गुजारते । ये महासमाधि की उपलब्धि करा सकते हैं । महानिर्वाण का अंत में अनुभव करा सकते हैं । अपने घर की तरफ जाने का प्रयास करने वाले ही जी रहे हैं बाकि तो व्यर्थ के श्वास बिगाड़ रहे हैं ।
     मनुष्य रुपए मृगा सवयन्ति । मनुष्य के रूप में मृग विचर रहे हैं । जैसे मृग कोमल-कोमल घास खाता है, समय गुजार रहा है । कब उसे शिकारी झपेट ले, ऐसे ही हमको भी कब मौत रूपी शिकारी झपेट लें कुछ पता नहीं । कोमल-कोमल विषयों के पीछे, संकल्पों-विकल्पों के पीछे हम अपना समय नाश कर रहे हैं । जागे नहीं तो बहुत कुछ कहना है । शायद तुम कहने-सुनने से पार हो जाओ इसीलिए कहा जा रहा है । आत्मा, प्रभु को नहीं दे सकते लेकिन प्रभु की ओर के इशारे ही दे सकते हैं । शास्त्र और संत तुमको ईष्वर नहीं दे सकते और उनकी करुणा-कृपा के बिना तुमको ईश्वर मिल भी नहीं सकता । वे तुमको ईश्वर के द्वार तक पहुँचा सकते हैं । बेवकूफी हटाएंगे लेकिन ईश्वर तो तुमको देंगे नहीं । ईश्वर तो तुम्हारा अपना आपा है वो तुमको देंगें कैसे ? कहाँ से देंगें ? ईश्वर कोई भौतिक वस्तु थोड़े ही है, जड़ वस्तु थोड़े ही है के उठाके दी जाये और मजे की बात है जो चीज कोई देता है वो छीन भी सकता है । ईश्वर कोई देता नहीं इसीलिए ईश्वर कोई छीन भी नहीं सकता । एक ईश्वर है जो दिया भी नहीं जाता और छीना भी नहीं जाता । यही मैं कहना चाहता हूँ, और कुछ कहने को बचता नहीं, फिर भी रह जाता है । ॐ, ॐ,  ……………… ।  १९४२ में एक सैनिक को बुरी तरह चोट लगी थी । अपना बिल तो वो शत्रुओं के बीच खो चूका था लेकिन अपनी स्मृति भी खो चूका था । उसके साथी पहुँच गये, उसको उठा लाये, इलाज किया । जग तो गया लेकिन स्मृति ना जगी । मनोवैज्ञानिकों ने कोशिश की स्मृति नहीं जगी । आखिर उन्होंने कहा अपने देश में इसको घुमाया जाये । हर स्टेशन का बोर्ड दिखाया जाये शायद उसे देखकर इसकी स्मृति लौट आये । उस सैनिक को २ सैनिक पूरा इंग्लैंड घुमाया । लेकिन उसे याद नहीं आया । अचानक एक स्टेशन पर उतरा, बाहर निकला, गलियों से गुजरा और एक द्वार को खटखटाया और चिलाया ये मेरा घर है, मेरा देश है, मेरा गांव है । ऐसे ही संत तुम्हे कई-कई जगहों से घुमाते हैं के कहीं तुम कह दो के अहम ब्रह्मास्मि । आत्मा, ईश्वर मेरा ही नाम है, घर है । जब अपने घर आये तो यात्रा पूर्ण होती है । हमारा घर, मकान ये दुनिया के छेड़ा होता है । इसीलिए अब विश्राम स्थान आ रहा है कथा का जब आपका घर आ जायेगा तो कथा पूरी हो जायेगी । ॐ  ॐ ……………… ।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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