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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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'बुफे सिस्टिम' नहीं, भारतीय भोजन पद्धति है लाभप्रद

'बुफे सिस्टिम' नहीं, भारतीय भोजन पद्धति है लाभप्रद

 आजकल सभी जगह शादी-पार्टियों में खड़े होकर भोजन करने का रिवाज चल पड़ा है लेकिन हमारे शाश्त्र कहते है कि हमें नीचे बैठकर ही भोजन करना चाहिए । खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ तथा पंगत में बैठकर भोजन करने से जो लाभ होते हैं वे निम्नानुसार हैं :
 
खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ
बैठकर (या पंगत में)भोजन करने से लाभ
१] यह आदत असुरों की है । इसलिए इसे 'राक्षसी भोजन पद्धति'कहा जाता हैं । 
 
१] इसे 'दैवी भोजन पद्धति' कहा जाता हैं । 
 
२] इसमें पेट, पैर व आँतों पर तनाव पड़ता है, जिससे गैस, कब्ज, मंदाग्नि, अपचन जैसे अनेक उदर-विकार व घुटनों का दर्द, कमरदर्द आदि उत्त्पन्न होते हैं । कब्ज अधिकतर बीमरियों का मूल है । 
 
२] इसमें पैर, पेट व आँतों की उचित स्थिति होने से उन पर तनाव नहीं पड़ता । 
 
३] इससे जठराग्नि मंद हो जाती है, जिससे अन्न का सम्यक पाचन न होकर अजीर्णजन्य कई रोग उत्पन्न होते हैं । 
 
३] इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है, अन्य का पाचन सुलभता से होता है । 
 
४] इससे ह्रदय पर अतिरिक्त भार पड़ता है, जिससे हृदयरोगों की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं । 
 
४] ह्रदय पर भार नहीं पड़ता । 
 
५] पैरों में जूते -चप्पल होने से पैर गरम रहते हैं । इससे शरीर की पूरी गर्मी जठराग्नि को प्रदीप्त करने में नहीं लग पाती । 
 
५] आयुर्वेद के अनुसार भोजन करते समय पैर ठंडे रहने चाहिए । इससे जठराग्नि प्रदीप्त होने में मदद मिलती है । इसीलिए हमारे देश में भिजन करने से पहले हाथ-पैर धोने की परम्परा हैं । 
 
 
६] बार-बार कतार में लगने से बचने के लिए थाली में अधिक भोजन भर लिया जाता है, तो ठूँस-ठूँसकर खाया जाता है जो अनेक रोगों का कारण बन जाता है अथवा अन्न का अपमान करते हुए फेंक दिया जाता हैं । 
६] पंगत में एक परोसनेवाला होता है, जिससे व्यक्ति अपनी जरूरत के अनुसार भोजन लेता है । उचित मात्रा में भोजन लेने से व्यक्ति स्वस्थ्य रहता है व भोजन का भी अपमान नहीं होता । 
 
७] जिस पात्र में भोजन रखा जाता है, वह सदैव पवित्र होना चाहिए लेकिन इस परम्परा में जूठे हाथों के लगने से अन्न के पात्र अपवित्र हो जाते हैं । इससे खिलनेवाले के पुण्य नाश होते हैं और खानेवालों का मन भी खिन्न-उद्दिग्न रहता है । 
 
७] भोजन परोसनेवाला अलग होते हैं, जिससे भोजनपात्रों को जूठे हाथ नहीं लगते । भोजन तो पवित्र रहता ही हैं, साथ ही खाने-खिलानेवाले दोनों का मन आनंदित रहता हैं । 
 
८] हो-हल्ले के वातावरण में खड़े होकर भोजन करने से बाद में थकान और उबान महसूस होती है । मन में भी वैसे ही शोर-शराबे के संस्कार भर जाते है । &l
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