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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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शिवपुराण में, सबसे बड़े शिव जी, विष्णु पुराण में सबसे बड़े विष्णु, गायत्री उपासना में सबसे बड़ी माँ, गाणपत्य ग्रन्थ में सबसे बड़े गणपति तो ये क्या है ?

पूज्य श्री - सुरेशानद जी प्रश्नोत्तरी

पूज्य बापूजी - कल ये बात आयी थी देव ऋषि नारद ने कहा देवों में भगवान् नारायण उत्तम है, नदियों में गंगा जी,
मन्त्रों में ओंकार, तो भगवान् नारायण अगर महान देव है तो शिवजी कौन है? शिवजी को तो महादेव स्वयं कहते है
और श्री कृष्ण अथवा भगवान् विष्णु शिवजी का आदर करते है ये पुराणिक कथाओ के प्रसंग हम बता सकते
 है। भगवान् नारायण सबसे श्रेष्ठ देव है ये कैसे ? 
गायत्री वाले बोलेंगे सबसे महान गायत्री देवी है, सौर्य उपासक बोलेंगे सबसे महान देव सूर्य है, गाणपत्य वाले बोलेंगे
सबसे महान देव गणपति है, अल्लाह वाले बोलेंगे काफिरों चुप रहो, सबसे बड़ा अल्लाह है, गॉड वाले बोलेंगे की तुम्हारे
बहुत भगवानो का कोई महत्व नही हमारे जीसस भगवान सबसे बड़े। अब क्या किया जाये? अब वो जो कहते है ठीक
अपनी अपनी जगह पर। लेकिन अपने ही धर्म ग्रन्थ शिवजी को बड़ा बताते है शिवपुराण में, सबसे बड़े शिव जी। विष्णु
पुराण में सबसे बड़े विष्णु, गायत्री उपासना में सबसे बड़ी माँ, गाणपत्य ग्रन्थ में सबसे बड़े गणपति बाकि के देव उनके
आगे स्तुति करते है, तो ये क्या है ?

श्री सुरेशानंदजी - अपना सनातन धर्म महान है, सर्व धर्म सम्मान हो सकता है, पर सर्व धर्म समान नही हो
सकता। सनातन धर्म को हम सनातन धर्म कहते है पुरातन धर्म नही कहते। पुरातन प्राचीन हो जायेगा। इस सनातन
धर्म वैदिक धर्म में सबकी मति शुद्ध हो, सबका कल्याण हो, सबका मंगल हो उसके लिए सबकी अपनी अपनी रूचि
भी होती है, कोई शिवजी को इष्ट मानते है, कोई विष्णु जी को, या विष्णु भगवान के 24 अवतार हुए उनमे से किसी
एक को मानते है, कोई गणपति जी को जैसे गुरुदेव ने अभी बताया। तो उन उन देवों की उपासना करके, परब्रह्म
परमात्मा का जो सबके अंदर वही है उसका साक्षात्कार कर सके और ये उन देवों की महानता और उन देवों की कृपा
है के वो कभी ऐसा भाव तो अपने में रखते ही नहीं है के हम बड़े के ये बड़े। वो तो अपनी उपासना करने वाले
उपासक को आत्मसाक्षात्कार हो जाये उस हेतु कृपा करके आत्म ज्ञानी गुरु के चरणों में पहुंचा देते है, जिससे उसको
एक्तत्व का बौध हो जाएँ। उसका भी कल्याण हो जाये। ऐसा गुरुवर मेरी समझ में आया ।

पूज्य बापूजी - नही नही। ऐसा है की जब गणपतय ग्रन्थ पढ़ेंगे तो गणपति सर्वोपरी देव है, शिवजी और विष्णु भी
उनके दर्शन करते है अथवा उनका आदर करते है और भागवत पढ़ेंगे तो शिवजी कृष्ण के दर्शन करने आये, शिवपुराण
पढ़ेंगे तो भगवान नारायण ने शिवजी की उपासना किया और कमल हज़ार सहश्त्र कमल चढाते थे और शिवजी ने
परीक्षा हेतु 1 कमल गायब कर दिया। तो भगवान नारायण ने देखा की हज़ार कमल में से एक नही है। शिवजी की
उपासना में विघ्न आया तो अपना नेत्र कमल निकालकर चढाने लगे तो शिवजी प्रकट होगये।यहाँ दीखता है की
भगवान शिव की उपासना नारायण ने की। सुदर्शन चक्र मिला। तो कल नारद जी के वचन में ये आया की देवताओं में
श्रेष्ठ विष्णु है तो मुझे शाम को ये विचार आया की में ये सवाल करूँ। देवताओं में श्रेष्ठ अगर विष्णु है तो महादेव
कौन है ? महादेव कम श्रेष्ठ हुए क्या? और विष्णु जी श्रेष्ठ है तो महादेव की उपासना क्यों किया ? 
माना हुआ संदेह के चक्राव में आ सकता है ,जाना हुआ संदेहों को मिटा देता है। 
पंच देवों की उपासना के ग्रंथों के रचियेता एक ही है व्यास। फिर एक एक ग्रन्थ के देव को ऊँचा बताया बाकि के देवों
को उनके आगे स्तुति करता दिखाया ऐसा क्यों ? और व्यास जी अज्ञानी नही है, अल्पज्ञ नही है। श्री कृष्ण उनका
आदर करते है। व्यासजी दृष्टिपात से पांडू को जन्म दिया, धृतराष्ट्र को दिया, विदुर को दिया, पांडव और कौरवों के
दादाजी। पांडू के जन्म दाता पिता, महाभारत के रचियेता पंचम वेद, विश्व का आर्ष ग्रन्थ सर्वोपरि ग्रन्थ के रचियेता
ब्रह्मसूत्र के, व्यासजी है। तो उनके ग्रंथो में ऐसी विषमता क्यों, क्या कारण है ? 
उनकी नज़र में तो अपनी पार्टी, परायी पार्टी नही है । फिर भी ग्रंथो में नारायण सर्वोपरी देव, शिव पुराण में  शिव
सर्वोपरी देव क्यों ?


पूज्य बापूजी - सबसे बड़ा देव विष्णु। तत्व रूप से विष्णु को देखो तो सबसे बड़े है और शिव को देखो तत्व रूप से तो
शिव बड़े है। तो जहा शिव पुराण आता है तो शिवजी को कारण रूप से लिया और देवताओं को कार्य रूप से दिखाया।
तो कारण बड़ा होता है, कार्य छोटा होता है। ऐसे गणपति को तत्व रूप से, कारण रूप से दिखाया और शिवजी को,
विष्णु को कार्य रूप से दिखाया। तो हर भक्त अपने-अपने इष्ट में आदि यज्ञ तत्व को, कारण तत्व को देखे । इष्ट की
आकृति है एकाग्र होने के लिए, प्रेरणा पाने के लिए। लेकिन इष्ट का कारण तत्व आपके कारण तत्व से एकत्व के लिए
इसीलिए भिन्न-भिन्न देवता और भिन्न-भिन्न छोटा बड़ापन जो दिखाया गया है उसमे राग नही है, द्वेष नही है ऊँची
समझ का परिचय है व्यास जी का ।  
ॐ ॐ ॐ .......

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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