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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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भगवन् ! सम्पूर्णतः नष्ट हुई अविद्या का फिर उदय कैसे होता है ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2017, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 289

भगवान विष्णु ब्रह्मा जी की तपस्या से प्रसन्न होकर उनको ‘त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद्’ का गुरु शिष्य संवाद सुनाते हैं-

श्रीगुरुभगवान को नमस्कार करके शिष्य पूछता हैः “भगवन् ! सम्पूर्णतः नष्ट हुई अविद्या का फिर उदय कैसे होता है ?” गुरु बोलेः “वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में जैसे मेंढक आदि का फिर से प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार पूर्णतः नष्ट हुई अविद्या का उन्मेषकाल (भगवान के पलक खोलने पर) फिर उदय हो जाता है।”

शिष्य ने फिर पूछाः “भगवन् ! जीवों का अनादि संसाररूप भ्रम किस प्रकार है ? और उसकी निवृत्ति कैसे होती है ? मोक्ष का साधन या उपाय क्या है ? मोक्ष का स्वरूप कैसा है ? सायुज्य मुक्ति क्या है ? यह सब तत्त्वतः वर्णन करें।”

गुरु कहते हैं- “सावधान होकर सुनो ! निंदनीय अनंत जन्मों में बार-बार किये हुए अत्यंत पुष्ट अनेक प्रकार के विचित्र अनंत दुष्कर्मों के वासना-समूहों के कारण जीव को शरीर एवं आत्मा के पृथकत्व का ज्ञान नहीं होता। इसी से देह ही आत्मा है, ऐसा अत्यंत दृढ़ भ्रम हुआ रहता है। मैं अज्ञानी हूँ, मैं अल्पज्ञ हूँ, मैं जीव हूँ, मैं अनंत दुःखों का निवास हूँ, मैं अनादि काल से जन्म-मरणरूप संसार में पड़ा हुआ हूँ’ – इस प्रकार के भ्रम की वासना के कारण संसार में ही प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति की निवृत्ति का उपाय कदापि नहीं होता।

मिथ्यास्वरूप, स्वप्न के समान विषयभोगों का अनुभव करके अनेक प्रकार के असंख्य अत्यंत दुर्लभ मनोरथों की निरंतर आशा करता हुआ अतृप्त जीव सदा दौड़ा करता है। अनेक प्रकार के विचित्र स्थूल-सूक्ष्म, उत्तम-अधम अनंत शरीरों को धारण करके उन-उन शरीरों में प्राप्त होने योग्य विविध विचित्र, अनेक शुभ-अशुभ प्रारब्धकर्मों का भोग करके उन-उन कर्मों के फल की वासना से लिप्त अंतःकरणवालों की बार-बार उन-उन कर्मों के फलरूप विषयों में ही प्रवृत्ति होती है। इससे संसार की निवृत्ति के मार्ग में प्रवृत्ति (रूचि) भी नहीं उत्पन्न होती। इसलिए (उनको) अनिष्ट ही इष्ट (मंगलकारी) की भाँति जान पड़ता है।

संसार-वासनारूप विपरीत भ्रम से इष्ट (मंगलस्वरूप मोक्षमार्ग) अनिष्ट (अमंगलकारी) की भाँति जान पड़ता है। इसलिए सभी जीवों की इच्छित विषय में सुखबुद्धि है तथा उनके न मिलने में दुःखबुद्धि है। वास्तव में अबाधित ब्रह्मसुख के लिए तो प्रवृत्ति ही उत्पन्न नहीं होती। क्योंकि उसके स्वरूप का ज्ञान जीवों को है ही नहीं। वह ब्रह्मसुख क्या है यह जीव नहीं जानते क्योंकि बंधन कैसे होता है और मोक्ष कैसे होता है ?’ इस विचार का ही उनमें अभाव है। जीवों की ऐसी अवस्था क्यों है ? अज्ञान की प्रबलता से। अज्ञान की प्रबलता किस कारण है ? भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की वासना (इच्छा) न होने से। इस प्रकार की वासना का अभाव क्यों है ? अंतःकरण की अत्यंत मलिनता के कारण।”

शिष्यः “अतः (ऐसी दशा में) संसार से पार होने का उपाय क्या है ?”

गुरु बताते हैं- “अनेक जन्मों में किये हुए अत्यंत श्रेष्ठ पुण्यों के फलोदय से सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों के सिद्धान्तों का रहस्यरूप सत्पुरुषों का संग प्राप्त होता है। उस सत्संग से विधि तथा निषेध का ज्ञान होता है। तब सदाचार में प्रवृत्ति होती है। सदाचार से सम्पूर्ण पापों का नाश हो जाता है। पापनाश से अंतःकरण अत्यंत निर्मल हो जाता है। निर्मल होने पर अंतःकरण सदगुरु की दयादृष्टि चाहता है। सद्गुरु के (कृपा-) कटाक्ष के लेश (थोड़े अंश) से ही सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। सब बंधन पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं। श्रेय (मोक्षप्राप्ति) के सभी विघ्न विनष्ट हो जाते है। सभी श्रेय (श्रेष्ठ) कल्याणकारी गुण स्वतः आ जाते हैं। जैसे जन्मांध को रूप का ज्ञान नहीं होता, उसी प्रकार गुरु के उपदेश बिना करोड़ों कल्पों में भी तत्त्वज्ञान नहीं होता। इसलिए सद्गुरु-कृपा के लेश से अविलम्ब ही तत्त्वज्ञान हो जाता है।

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