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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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तो भक्ति का स्वरूप क्या है? भक्ति किसे कहते हैं? भजन का क्या लक्षण है? हमारा भजन सही हो रहा है उसका क्या लक्षण है ?

पूज्य श्री - सुरेशानद जी प्रश्नोत्तरी

पूज्य गुरुदेव: अच्छा, आपने बताया कि हमारी भक्ति बढ़ती रहे, भजन बढ़ता रहे, साधना बढ़ती रहे...तो भक्ति का स्वरूप क्या है?
जिसको बढायें, उसके विषय में भी तो महाराज बताओ...आधियज्ञ तो वह परब्रह्म परमात्मा ही है, आप अक्षर हो, शरीर क्षरता है...
भक्ति किसे कहते हैं?
श्री सुरेशानंदजी: गुरुदेव के सत्संग में हमने सुना है कि "भागो हि भक्ति", "भंजनं भक्ति", "रसनं भक्ति"....
पूज्य गुरुदेव: "भागो" का क्या मतलब महाराज?
श्री सुरेशानंदजी: जो भाग कर दे, कि ये सार है, ये असार है...असार से मन हटे और सार की तरफ की यात्रा शुरू हो जाये..."भागो हि भक्ति"...भंजनं भक्ति - जैसे मौत शरीर को मार देती है, उसी प्रकार दोषों को, दुर्गुणों को, विकारों को मारने का सामर्थ्य, भंजनं भक्ति....
पूज्य गुरुदेव: शाबाश है!! हमारा चेला इसी का नाम है....
हम लोग आपस में प्रश्नोत्तर सीख कर, कह कर, नहीं आते, ईमानदारी से कहता हूँ...एक दुसरे से setting करके नहीं आते हैं...तटस्थ...
पूज्य बापूजी : भजन का क्या लक्षण है ? हमारा भजन सही हो रहा है उसका क्या लक्षण है ?
श्री सुरेशानंदजी - गुरुदेव के चरणों में बैठकर ये सुना है की रसनं लक्षणं भजनं, रस आने लगे, अच्छा लगने लगे  यहाँ इतनी संख्या में बैठे है साधक - साधिकाएँ, सत्संगी और असंख्य ऐसे भी है जो पहली बार आये है शरीर को थोड़ी गर्मी लग रही है पर फिर भी रसनं लक्षणं भजनं, दर्शन से और सत्संग से बापूजी के वचनों से रस आ रहा है,आनंद आ रहा है, अच्छा लग रहा है, यही भजन का स्वरूप हमारे समझ में  



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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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