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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन में संशय उत्पन्न हो जाता है

प्रश्न :- गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन मे संशय उत्पन्न हो जाता है। 
पूज्य बापूजी :- सब कुछ क्या जानते है ?
प्रश्नकर्ता :- जैसे कोई सही चीज हो तो उसके विषय मे मन में द्वंद उत्पन्न होने लगता है कि यह ऐसा है कि ऐसा है ?
पूज्य बापूजी :- जब सब कुछ जानते हो तो द्वंद कैसे उत्पन्न होता है ? 
प्रश्नकर्ता :- मालूम है संसार झूठ है फिर भी मन उसमे उलझता है। 
पूज्य बापूजी :- हाँ तो अपने पुराने संस्कार है न, तो होता है। मिथ्या संसार सच्चा लग रहा है क्योंकि पुराने संस्कार है कई जन्मों के और उनको सच्चा मान कर जी रहे है और अभी केवल सुनकर एकदम से दृढ़ता नही होती तो द्वंद होता है। संसार के मिथ्यात्व के प्रति सजग रहना, यही तो सावधानी है। इसी को तो साधना कहते है। सावधानी का नाम ही साधना है। यही पुरुषार्थ है। पुरुषस्य अर्थ इति पुरुषार्थः। उस परमात्मा के अर्थ प्रयत्न करना, कोशिश करना पुरुषार्थ है। किसी ने रुपये पैसे कमाये, पद पाया तो बोले : अरे ! 'इसने पुरुषार्थ किया।' क्या खाक पुरुषार्थ किया ! वह तो प्रकृति-अर्थ किया। पुरुषार्थ तो यह है कि भगवान में टिकने का यत्न हो। यह पुरुषार्थ करो, 'ईश्वर की ओर' पढो और दूसरी कोई छोटी मोटी पुस्तक-सत्साहित्य पढो अथवा जहाँ रहते हो वही ऐसे विचार करो कि 'आखिर यह कब तक ? यह भी गुजर जाएगा, यह भी बीत जाएगा, यह भी नही रहेगा, परमात्मा के सिवाय सब सपना है, उसको जानने वाला प्रभु अपना है' आदि-आदि। ऐसे सूत्र घरो में दीवालों पर लिखे रहे तो ये पक्के हो जाएंगे। ये सभीके फायदे के लिए है।
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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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