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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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साँई ! साधन करते हुए मन पुराने संस्कारो में गिरने लगे तो क्या करना चाहिए ?

प्रश्न :- साँई ! साधन करते हुए मन पुराने संस्कारो में गिरने लगे तो क्या करना चाहिए ?
पूज्य बापूजी :- मन से लड़ो मत। साधन करते हुए भी मन पुराने संस्कारो में जाता है तो उसके जाने न जाने की उपेक्षा कर दो। 'पुराने संस्कार मेरे नही है, मन के है, चित्त के है। मेरे तो भगवान है।' और पुराने संस्कार अच्छे हो तो भी क्या, बुरे है तो भी क्या; संस्कार तो संस्कार है ! तरंग तो तरंग है और क्या ! कचरा तो कचरा है। होता है, जाता है। 'ऐसा होना चाहिए, ऐसा नही होना चाहिए' - कोई आग्रह नही रखो। उन पुराने संस्कारो को महत्व न दो। न उनमे डूबो, न उनसे भिड़ो। न उनको रोको, न उनके साथ चलो। उपेक्षा.... जैसे यहाँ आते समय रास्ते मे कितना ट्रैफिक मिला होगा, कितने उतार चढ़ाव आये होंगे लेकिन आपको अभी कोई भी ज्यादा याद नही है। आपने सबकी उपेक्षा की क्योंकि लक्ष्य इधर का था। ऐसे ही लक्ष्य रखो अपनी समता में , अपने आनंद में, अपने सच्चिदानंद स्वभाव में आने का, बाकी जो हुआ, हुआ। उसमे महत्व बुद्धि हटा दो तो आसान तरीका हो गया।
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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

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कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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