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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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ध्यान विषयक

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प्रश्न :- हे गुरुवर ! कामनारहित गुरुभक्ति कैसे करे ? मन में कोई कामना न रहै और आपसे प्रीति हो जाये।

पूज्य बापूजी :- भगवान को पाने की कामना रखने से दूसरी कामनाएँ चट (खत्म) हो जाती है। भगवान को पाने की कामना, कामना नही गिनी जाती है, तो हो गए कामना रहित। 
         आपसे प्रीति कैसे करे ? तो हमको आप क्या मानते है ? दाढ़ी वाले बाबा इधर बैठे है - ऐसा मान के प्रीति करेंगे ? इधर घुसेंगे,चिपकेंगे - इसका नाम प्रीति है क्या ? मेरे पैर दबायेंगे अथवा मेरे को कुछ खिलाएंगे - इसको प्रीति बोलते है तो आपको वहम है। आप मेरे 'मैं'  को प्रीति करिये। मेरा 'मैं' तो चिद् वपु (चैतन्य शरीर) विभु व्याप्त है। अर्थात आप अपने - आपको प्रीति करेंगे तो मुझे ही करेंगे। आप अपने आप को प्यार करिये 'मैं सुखस्वरूप हूँ, चेतनस्वरूप हूँ, अमर हूँ। दुःख से, चिंताओं से, भय से, कल्पनाओ से मेरा कुछ लेना देना नही है।' ऐसा करके अपने को प्रीति करिये तो आपने मेरे को कर ली प्रीति। यदि मेरे को इस रूप में मानो तो अपने को प्रीति हो गयी क्योंकि तुम और हम आकृति से दो दिखते है, बाकी एक ही तत्व है हम सब।
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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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