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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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/ Categories: PA-000437-Q&A

मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार एक ही है कि अलग अलग है ?

साधक: मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार एक ही है कि अलग अलग है ?

    पूज्य बापूजी : मुक्ति का मतलब है बंधनों से मुक्त होना ,दुःखों से मुक्त होना । दुःखों से मुक्त आत्म-साक्षात्कार के बिना हुआ नहीँ जाता । परमात्मा की प्राप्ति कहो,मुक्ति कहो, एक ही बात है ।
     
      मुक्ति भी पाँच प्रकार की होती है । यहाँ से मर गए ,स्वर्ग में चले गए; उसे स्वर्गीय मुक्ति कहते हैं । ठाकुर जी का भजन करते हैं ,ठाकुर जी के देश में चले गए ; वो सायुज्य मुक्ति होती है । फिर ठाकुर जी के नजदीक रहे तो सामीप्य मुक्ति, और नजदीकी होगये तो मंत्री की नाई तो सायुज्य मुक्ति ,सामीप्य मुक्ति लेकिन वास्तविक में पूर्ण मुक्ति होती है जिसमें ठाकुर जी जिस आत्मा में 'में' रूप में जगे हैं ,उसमें अपने आपको जानना ; ये जीवन्मुक्ति होती है ,जीते जी यहाँ होती है । दुशरी मुक्ति मरने की बाद होती है स्वर्गीय मुक्ति, सालुक्य मुक्ति, सामीप्य मुक्ति ,सायुज्य मुक्ति,सारूप्य मुक्ति । इष्ट के त्रिलोक में रहना सालुक्य मुक्ति है । उनका चपरासी अथवा द्वारपाल जितनी नजदीक रहना सायुज्य मुक्ति है , सामीप्य मुक्ति । उनका खास मंत्री अथवा भाई की बराबरी, जैसे रहते हैं राजा के भाई ऐसे हो जाना भक्ति से सारूप्य मुक्ति । इन मुक्तियों में द्वेत बना रहता है । ये अलग है ,में अलग हूँ और ये खुश रहें ,उनके जैसे सुख-सुविधा ,अधिकार भोगना ये सब सालुक्य ,सामीप्य मुक्तियाँ हैं और पूर्ण मुक्ति है कि अपनी आत्मा की पूर्णता का साक्षात्कार करके यहीँ " पूर्ण गुरु की कृपा मिली,पूर्ण गुरु का ज्ञान " में अनन्त ब्रह्माण्ड व्यापी अपनी अनन्त स्वाभाव से  एकाकार होना ; ये जीवन्मुक्ति है ,ये परममुक्ति है । मुक्तियों की पांच भेद; यहाँ से मरकर स्वर्ग में चले गए ,चलो मुक्त होगये । वहाँ राग-द्वेष भी ज्यादा नहीँ रहता और कम होता है । फिर भी इधर से तो बहत अच्छा है । होगये मुक्त । जैसे कर्जे से मुक्त होगये, झगडे से मुक्त होगये ,तलाक दे दिया ,झंझट से मुक्त होगये ; ऐसी मुक्तियाँ तो बहत होती है ,लेकिन पूर्ण परमात्मा को पाकर बाहर से सूखी होने की बदले सत् में, चित् में, आनंद में स्थिति होगई ,वह पूर्ण मोक्ष ,उसको जीवन मुक्ति बोलते हैं । कैवल्य मुक्ति बोलते हैं ।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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