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आध्यात्मिक

तात्त्विक

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

Admin 0 8151 Article rating: 4.3
 पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । 
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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

How to obtain Saraswatya mantra diksha?

Admin 0 472 Article rating: No rating

Guruji I wanted a saraswati mantra diksha from you. I want to excel in my studies. Im surprised to see so much miracles and blessings you are showering upon your followers

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ध्यान विषयक

Admin
/ Categories: PA-000444-Meditation

आत्मचिंतन कैसे करना चाहिए ? आत्मसाक्षात्कार हो जाने पर पूरी दुनिया कैसी लगती है ?

पूज्य बापूजी :- आत्मचिंतन का मतलब है 'अपना 'मैं' जहाँ से उठता है, जो सत् है, चित् है, आनन्द है, जो दुःख को देखता है, सुख को जानता है वह कौन है?' - ऐसा चिंतन। हानि-लाभ, अनुकूलता-प्रतिकूलता आने और मूढ़ उनमे डूब जाते हैजबकी आत्मचिंतन करने वाले दोनों का मजा लेते है : मैं इनका द्रष्टा हूँ,साक्षी हूँ, असंग हूँ।' ' मैं कौन हूँ ?' चिंतन करके शांत होगा उत्तर भी आएगा, अनुभव भी होगा। श्री योगवासिष्ठ महारामायण, विचारसागर, विचार चंद्रोदय आदि ग्रन्थों का अध्ययन करके अथवा 'श्री नारायण स्तुति' पढ़कर शांत हो जाओ। 
   आत्मसाक्षात्कार होने पर दुनिया वैसी ही दिखेगी जैसी अभी दिखती है लेकिन लोगो को सच्ची दिखती है, आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष को मिथ्या अथवा स्वप्नवत् दिखती है, भगवदरूप दिखती है, ब्रम्हरूप दिखती है। तुमने अँधेरे में दूर से सांप देखा, डरकर काँपने लगे। बत्ती ले के आये, नजदीक से देखा तो 'अरे ! यह तो रस्सी है।' फिर वापस उसी जगह पर आ गए। अभी भी सांप जैसा दिखता है लेकिन अब सांप का डर नही रहेगा। एक बार देख लिया चाहे फिर पहले कैसी भी कल्पना की हो, वे सब हट गयी। जो है सो है... फिर संसार से सुख लेने की कामना नही होगी। अपने आप में तृप्ति होगी, संतुष्टि होगीऔर 'अपना आपा केवल शरीर में नही, अनन्त ब्रम्हांडो में व्याप रहा है' ऐसा अनुभव होगा। वह अनुभव कैसा होगा वहाँ वाणी नही जाती। ब्रम्हा, विष्णु, महेश और उनके लोको भी व्यापकर ब्रम्हावेत्ता सभी को अपने आप में ही जानते है। वे चिदाकाशमय हो जाते है। जैसे आकाश सबमे - सब आकाश में, ऐसे ही चिदाकाश स्वरूप पूज्यनीय पुरुष। यहाँ बयान नही होता है। मत करो वर्णन हर बेअंत है। फिर भी वर्णन अपनी दृष्टि से किया साधको समझाने हेतु।

 

ऋषि प्रसाद { १ अक्टूबर २०१६ }

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प्रश्न :- गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन मे संशय उत्पन्न हो जाता है। 
पूज्य बापूजी :- सब कुछ क्या जानते है ?
प्रश्नकर्ता :- जैसे कोई सही चीज हो तो उसके विषय मे मन में द्वंद उत्पन्न होने लगता है कि यह ऐसा है कि ऐसा है ?



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