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आध्यात्मिक

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मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार एक ही है कि अलग अलग है ?

साधक: मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार एक ही है कि अलग अलग है ?

    पूज्य बापूजी : मुक्ति का मतलब है बंधनों से मुक्त होना ,दुःखों से मुक्त होना । दुःखों से मुक्त आत्म-साक्षात्कार के बिना हुआ नहीँ जाता । परमात्मा की प्राप्ति कहो,मुक्ति कहो, एक ही बात है ।
     
      मुक्ति भी पाँच प्रकार की होती है । यहाँ से मर गए ,स्वर्ग में चले गए; उसे स्वर्गीय मुक्ति कहते हैं । ठाकुर जी का भजन करते हैं ,ठाकुर जी के देश में चले गए ; वो सायुज्य मुक्ति होती है । फिर ठाकुर जी के नजदीक रहे तो सामीप्य मुक्ति, और नजदीकी होगये तो मंत्री की नाई तो सायुज्य मुक्ति ,सामीप्य मुक्ति लेकिन वास्तविक में पूर्ण मुक्ति होती है जिसमें ठाकुर जी जिस आत्मा में 'में' रूप में जगे हैं ,उसमें अपने आपको जानना ; ये जीवन्मुक्ति होती है ,जीते जी यहाँ होती है । दुशरी मुक्ति मरने की बाद होती है स्वर्गीय मुक्ति, सालुक्य मुक्ति, सामीप्य मुक्ति ,सायुज्य मुक्ति,सारूप्य मुक्ति । इष्ट के त्रिलोक में रहना सालुक्य मुक्ति है । उनका चपरासी अथवा द्वारपाल जितनी नजदीक रहना सायुज्य मुक्ति है , सामीप्य मुक्ति । उनका खास मंत्री अथवा भाई की बराबरी, जैसे रहते हैं राजा के भाई ऐसे हो जाना भक्ति से सारूप्य मुक्ति । इन मुक्तियों में द्वेत बना रहता है । ये अलग है ,में अलग हूँ और ये खुश रहें ,उनके जैसे सुख-सुविधा ,अधिकार भोगना ये सब सालुक्य ,सामीप्य मुक्तियाँ हैं और पूर्ण मुक्ति है कि अपनी आत्मा की पूर्णता का साक्षात्कार करके यहीँ " पूर्ण गुरु की कृपा मिली,पूर्ण गुरु का ज्ञान " में अनन्त ब्रह्माण्ड व्यापी अपनी अनन्त स्वाभाव से  एकाकार होना ; ये जीवन्मुक्ति है ,ये परममुक्ति है । मुक्तियों की पांच भेद; यहाँ से मरकर स्वर्ग में चले गए ,चलो मुक्त होगये । वहाँ राग-द्वेष भी ज्यादा नहीँ रहता और कम होता है । फिर भी इधर से तो बहत अच्छा है । होगये मुक्त । जैसे कर्जे से मुक्त होगये, झगडे से मुक्त होगये ,तलाक दे दिया ,झंझट से मुक्त होगये ; ऐसी मुक्तियाँ तो बहत होती है ,लेकिन पूर्ण परमात्मा को पाकर बाहर से सूखी होने की बदले सत् में, चित् में, आनंद में स्थिति होगई ,वह पूर्ण मोक्ष ,उसको जीवन मुक्ति बोलते हैं । कैवल्य मुक्ति बोलते हैं ।

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तात्त्विक

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

Admin 0 7553 Article rating: 4.1
 पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । 
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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

How to obtain Saraswatya mantra diksha?

Admin 0 463 Article rating: No rating

Guruji I wanted a saraswati mantra diksha from you. I want to excel in my studies. Im surprised to see so much miracles and blessings you are showering upon your followers

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ध्यान विषयक

निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

Admin 0 4606 Article rating: 4.3
श्री हरि प्रभु ! चालू सत्संग में जब मन निःसंकल्प अवस्था में विषय से उपराम होकर आने लगता है ,तो प्रायः निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

ध्यान की अवस्था में कैसे पहुंचे ? अगर घर की परिस्थिति उसके अनुकूल न हो तो क्या करे ?

Admin 0 2770 Article rating: No rating

ध्यान  की  अवस्था  में  कैसे  पहुंचे ? अगर  घर  की  परिस्थिति  उसके  अनुकूल  न  हो  तो  क्या  करे ?

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EasyDNNNews

गुरुदेव ! सदा और सर्व अवस्थाओ में अद्वैत की भावना करनी चाहिए पर गुरु के साथ अद्वैत की भावना कदापि नही करनी चाहिए - ऐसा जो कहा गया है उसका रहस्य समझाने की कृपा करें।

Admin 0 7030 Article rating: 4.2
1 दिसंबर 2010
निरंतर अंक - 216

गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन में संशय उत्पन्न हो जाता है

Admin 0 4702 Article rating: 4.3
1 जनवरी 2011
अंक - 217
प्रश्न :- गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन मे संशय उत्पन्न हो जाता है। 
पूज्य बापूजी :- सब कुछ क्या जानते है ?
प्रश्नकर्ता :- जैसे कोई सही चीज हो तो उसके विषय मे मन में द्वंद उत्पन्न होने लगता है कि यह ऐसा है कि ऐसा है ?



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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

पूज्य श्री - सुरेशानंदजी प्रश्नोत्तरी

Admin 0 4131 Article rating: 3.5
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