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क्या हमारी वैदिक संस्कृती में इस तरह से नूतन वर्ष मनाया जाता है – पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू
* मांस मदिरा के सेवन के साथ कुछ लोग नए वर्ष को मनाते हैं जिसकी सजा अन्य लोगो को भुगतना पड़ता हैं |
* पाश्चात्य संस्कृती का इस तरह से नशा चढ गया हैं कि १.५ लाख बकरों की बलि, ३८००० गाय और भैंसों की बलि और ३८०००ली० शराब चट |
* ३१ तारीख को इतना खून बहे ये नूतन वर्ष है| क्या यही हमारी संस्कृती है? जरा सोचिये
* इससे अच्छा तो हमारा दिवाली है कोई शराब नही, किसी प्राणी की बली नही | दीवाली मैया को प्रणाम है जो हमारा पाप ताप का नाश कर राम नाम के प्रेम की प्याली पिलाती है |
* क्रिसमस के दिनों में जितना खून खराबा होता है और मांस मदिरा चलता हैं उतना किसी और दिनों में नही होता | क्या यही Jesus का उद्देश्य था?
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Does our Indian culture allows us to celebrate this type of New year ?- Pujya