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25 April 10 ,Haridwar:* मनचाही वस्तु मिल जाएगी तो मन से पार नहीं जायेंगे ...मन चाही परिस्थिति में सुखी रहना चाहेंगे तो भगवान कृपा कर के वहाँ से गडबडी करा देंगे ...क्योंकि मन ही तो हमें जन्म जन्मान्तरों में भटकाता है ...जब मन का चाह न हो तो समाज लेना इश्वर की बड़ी कृपा है ......
* "कपट गांठ मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव "...गुरु से छल कपट करके व्यवहार करना मोक्ष के रस्ते से गिरना है ...कहाँ तो इन्द्रपद भी तुक्ष लगे और कहाँ छल कपट कर के तुच्छ जीवों की नई जन्म मरण ...."मुरख ह्रदय न चेत चाहे गुरु मिले बिरंची सम "...
* इश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में धोखा है , दुःख को बुलाना है , भविष्य में अंध कूप में गिरना है ...