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संजीवनी बूटी – भक्ति
श्रीरामचरितमानस में आता हैः
सदगुरू बैद बचन विस्वासा।
संयम यह न विषय कै आसा।।
रघुपति भगति सजीवन मूरी।
अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहिं।
नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।
सदगुरूरूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो। श्रीरघुनाथजी की भक्ति संजीवनी बूटी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि)। इस प्रकार का संयोग हो तो रोग नष्ट हो जाते हैं, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते।
(श्रीरामचरितमानस उ.का. 121.3.4
प्राणवर्धन में 'अहिंसा', बलवर्धन में 'वीर्य', पोषण करने वालों में 'विद्या', मन को आनंदित करने वालों में 'इंद्रियों पर विजय', व मन को प्रसन्न करने वालों में 'तत्त्व का बोध' सर्वश्रेष्ठ है।
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