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धर्म का पालन आयुष्कर है
धर्म से हृदय का भार हल्का होता है। अधर्म से हृदय भय, चिंता, विषाद, ग्लानि से पीड़ित होकर भीतर ही भीतर जर्जर होने लगता है। दुर्भावनाओं का कुप्रभाव हृदय, स्नायुमंडल, रक्त पर निश्चितरूप से पड़ता है। इससे प्राणशक्ति घट जाती है। शरीर की स्वाभाविक क्रियाएँ गड़बड़ा जाती हैं। अशान्त अंतर्द्वन्द्व से स्वास्थ्यनाश अवश्यंभावी है। धर्मानुसार शुद्ध भाव से कर्तव्य करने से हृदय निर्मल व निर्भार होता है व मनुष्य को निश्चिंतता, कृतकृत्यता का अनुभव होता है।
न कृतार्थानां मरणभयं। - कौटिल्य
जो कर्तव्यपालन से कृतार्थ हो जाता है, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता।
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