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सफल दीर्घ जीवन का रहस्य
महर्षि वसिष्ठ जी ने काकभुशुण्डीजी से पूछा कि, आप इतने दीर्घकाल से स्वस्थ कैसे बने रहे हो ? इस पर उन्होंने कहाः मैं सदा आत्मभाव में स्थित रहता हूँ। मनोरथों के पीछे शक्ति का अपव्यय नहीं करता। अकारण चिंता व विषाद में नहीं फँसता, जरा-मृत्यु के भय से मुक्त रहता हूँ। हर्ष-शोक व सुख-दुःख से विचलित नहीं होता। सबको अपने समान मानता हूँ। मोह-प्रमाद से दूर रहता हूँ। समर्थ होने पर भी दूसरों पर प्रहार नहीं करता। दूसरों से दुःख पाने पर भी खिन्न नहीं होता। निर्धन होने पर भी लोभ नहीं करता। दूसरों को सुखी देखकर सुखी और दुःखी देखकर दुःखी हो जाता हूँ। प्राणिमात्र का सुहृद और सहायक हूँ। विपत्ति में धैर्ययुक्त तथा सम्पत्ति में सरल व्यवहार युक्त रहता हूँ। अतः सदा निरामय होकर जीवित रहता हूँ।
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