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आरोग्य प्रेरक निर्देश
हँसना व सदैव प्रसन्न रहना निरोगी रहने की अदभुत औषधि है।
स्वास्थ्य भौतिक तत्त्वों की अपेक्षा हमारे विचार व क्रियाओं पर अधिक निर्भर है।
शरीर के प्रति आसक्ति जितनी कम उतना शरीर स्वस्थ व अधिक क्रियाशील !
व्याधि प्रकृति के नियमों की अवहेलना का परिणाम है।
व्याधि का समूल नाश इंद्रिय संयम व मन की शुद्धि होने पर ही संभव है।
असत्य वाणी से हृदय व मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को हानि पहुँचती है। जीवनशक्ति का ह्रास होता है।
चिंता से सौंदर्य, पाचनशक्ति व निद्रा का नाश होता है।
काम से वायु, क्रोध से पित्त, लोभ से कफ व अभिमान से त्रिदोष प्रकुपित होते हैं।
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