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भोजन

भोजन

प्रतिक्षण होने वाले कायिक, वाचिक व मानसिक कर्मों के कारण शारीरिक शक्ति क्षीण होती रहती है। इस शक्ति को पुनः प्राप्त करने हेतु प्रतिदिन लिया जाने वाला आहार ईंधन का कार्य करता है।

आयुर्वेद के अग्रगण्य आचार्य महर्षि चरक कहते हैं-

वर्णः प्रसादः सौस्वर्यं जीवितं प्रतिभा सुखम्।

तुष्टिः पुष्टिर्बलं मेधा सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम्।।

'वर्ण, प्रसन्नता, सुंदर, स्वर, जीवन, प्रतिभा, सुख, संतोष, शरीर की पुष्टि, बल, मेधा, बुद्धि – ये सभी अन्न से ही प्रतिष्ठित हैं।'

चरक सूत्रस्थानः 27.349.350

भोजन एक यज्ञकर्म है। जिस प्रकार होम विधिवत किया जाता है, उसी प्रकार अन्नपानरूपी समिधा से अन्तराग्नि में विधिवत् हवन करना चाहिए।

भोजन सुबह-शाम करना चाहिए। इसके बीच में अन्नसेवन नहीं करना चाहिए। बीच में भूख लगने पर दूध अथवा फल का सेवन कर सकते हैं।

शीत ऋतु में प्रथम पहर के बाद (सूर्योदय के तीन घंटे बाद) व अन्य ऋतुओं में द्वितीय प्रहर के बाद अर्थात् मध्याह्न काल में भोजन करना हितावह है। पहले सेवन किये गये भोजन का सम्यक् पचन होने से पूर्व पुनः आहार का सेवन नहीं करना चाहिए, अन्यथा प्रथम आहार से बना अपक्व आहार-रस दुबारा लिये गये आहार के साथ मिलकर शीघ्र ही दोषों को प्रकुपित कर अजीर्ण व्याधियाँ उत्पन्न करता है। प्रथम लिये हुए आहार का सम्यक् पचन होने के बाद अर्थात् 6 से 8 घंटे के बाद शाम को पुनः लघु आहार लेना चाहिए।

भोजन के सम्यक् पचन के लक्षणः

मन में उत्साह, शुद्ध गंधहीन डकार, मल मूत्रादि का सुखपूर्वक निष्कासन, शरीर में हलकापन, भूख व प्यास लगना – ये पूर्व आहार के सम्यक पचन के लक्षण हैं। इस समय पुनः भोजन कर लेना चाहिए। अन्यथा समय व्यतीत होने पर देर से भोजन करने से वायु अग्नि को मंद कर देती है, भोजन कष्ट से पचता है व दूसरे समय भोजन करने की इच्छा नहीं होती।

आहार की मात्राः

आहार की मात्रा अग्नि के बल (पाचनशक्ति) पर निर्भर होती है। जितना भोजन शरीर में कोई भी कष्ट न पहुँचाते हुए यथासंभव पच जाय वही व्यक्ति के लिए प्रमाणित मात्रा है।

आमाशय (जठर) के तीन भाग कल्पित कर एक भाग घन आहार के लिए, एक भाग द्रवरूप आहार के लिए व एक भाग त्रिदोषों को कार्य करने के लिए रखना चाहिए।

पचने में भारी पदार्थों का सेवन आधी भूख रखकर करना चाहिए वह हलके पदार्थों का सेवन भी थोड़ी-सी भूख रखकर ही करना चाहिए। भारी पदार्थों (सूखा मेवा, मिठाई, तले हुए पदार्थ आदि) का अति मात्रा में सेवन भयंकर परिणाम लाता है।

मात्रावत् आहार के लक्षणः

आहार के द्वारा पेट पर दबाव न पड़े, पेट में भारीपन व पीड़ा न हो, हृदय की गति में रूकावट न हो, बैठना, सोना, चलना, श्वास-प्रश्वास आदि में प्रयास न हो, सायं और प्रातःकाल में आहार का सुखपूर्वक परिपाक हो जाय, इन्द्रियाँ तृप्त रहें, बल, वर्ग और शरीर की वृद्धि हो – ये मात्रापूर्वक आहार के लक्षण हैं।

कम मात्रा में लिया गया आहार मन में अतृप्ति, उदासीनता उत्पन्न करता है। अल्प आहार से शरीर, बल, वीर्य, ओज का क्षय होता है। इन्द्रियों व बुद्धि की कार्यक्षमता का ह्रास होता है। अल्प आहार 80 प्रकार के वातरोगों का कारण है। साथ ही मात्रा से अधिक भोजन रोगोत्पत्ति का प्रमुख कारण है।

हितकर-अहितकर आहारः

तत्त्वं नित्यं प्रयुञ्जीत् स्वास्थ्यं येनानुवर्तते।

अजातानां विकाराणाम् अनुत्पत्तिकरं च यत्।।

च.सू. 5.13

उसी आहार का नित्य सेवन करना चाहिए जो स्वास्थ्य को बनाये रख सके और रोगों को उत्पन्न न करे। श्री चरकाचार्य जी ने उपर्युक्त श्लोक में स्वस्थवृत्त के व्यापक सिद्धान्त की नींव डाली है।

नित्य सेवनीय पदार्थः

साठी के चावल,शालि धान के चावल, गेहूँ, जौ, मूँग, गाय का दूध व घी, मिश्री, सैंधव नमक, तिल का तेल, जीवन्ती (डोडी), बथुआ, परवल, ताजी कोमल मूली, अदरक, अनार, अंगूर, हरड़, आँवला व दिव्योदक अर्थात् जमीन पर गिरने से पहले इक्टठा गया वर्षा का जल ये नित्य सेवन करने योग्य पदार्थ हैं।

क्वचित सेवनीय पदार्थः

ओट (घोड़ जई), सरसों का साग, भेड़ का दूध, बर्रे का तेल, बड़हर का फल, आलू, गन्ने से बनी राप, वर्षा ऋतु में नदी का पानी सर्वथा त्याज्य है।

सेवनीय द्रव्य श्रेष्ठ गुणयुक्त होने पर भी जठराग्नि, प्रकृति, वय, दोषस्थिति, देश, काल आदि का विचार करके ही उनका सेवन करना चाहिए अन्यथा वे भी अहितकर हो जाते हैं।

जठराग्निः

हितकर भोजन को शरीर के लिए उपयुक्त बनाना यह जठराग्नि का कार्य है। प्रदीप्त जठराग्नि के अभाव में हितकर आहार भी अहितकर हो जाता है। अग्नि की स्थिति वय, ऋतु, देश, प्रकृति आदि के अनुसार बदलती रहती है।

युवावस्था, पित्त, प्रकृति, शीतऋतु में अग्नि तीव्र होती है। वृद्धावस्था, कफ प्रकृति, वसंत व वर्षा ऋतु में अग्नि मंद होती है। सभी व्याधियों में अग्नि मंद रहती है क्योंकि रोगों का मूल ही मंदाग्नि है।

अतः अग्नि का विचार कर ऐसे ही पदार्थों का सेवन करना चाहिए, जिनसे जठराग्नि प्रदीप्त रहे।

भोजन व्यवस्थाः

हितकर द्रव्यों के द्वारा पवित्रता व प्रेम से बनाया गया लघु, षडरसयुक्त, मधुर रस बहुल भोजन एकान्त स्थान में पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुँह करके, प्रियजनों के साथ बैठकर करना चाहिए।

भोजन करने से पूर्व पितर, देवता, अतिथि, बालक, गौमाता, गुरुजन – इनको भोजन कराकर, पशु-पक्षी तथा जिनके पालन का उत्तरदायित्व लिया हुआ है उनको अपने से भोजन देकर, प्रकृति आदि का विचार करके, भोजन की निन्दा न करते हुए, न बोलते हुए, न बहुत धीरे-धीरे न बहुत शीघ्रता से, मनोय़ोग के साथ अर्थात् मनःपूर्वक भोजन करना चाहिए।

भोजन करने के बाद दस मिनट तक सिर, सीना व कमर सीधी रखकर बैठें। तत्पश्चात् सौ कदम चलकर 15 मिनट बाईं करवट लेकर लेट जायें, सोयें नहीं।

इस प्रकार आहार-विधि-विधान का वर्णन करने के बाद अंत में आचार्य चरक कहते हैं-

आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत सम्यक्।

चरक विमानस्थानः 125

अपने लिये हितकर-अहितकर अपनी आत्मा से ही विदित होता है। भलीप्रकार समझकर आहार-विहार का सेवन करें।

गैपफिलरः

आदायन्ते च मध्ये  भोजनस्य तु शस्यते।

निरत्ययं दोषहरं फलेष्व आमलकं नृणाम्।।

भोजन के आदि, अंत व मध्य में सर्वदोष नाशक, फलों में श्रेष्ठ आँवले का (या आँवला चूर्ण का) निरंतर सेवन मनुष्यों के लिए उत्तम है।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ


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Created by Prateek Keswani in 8/17/2012 9:01:03 PM
Hari Om!
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Created by Prateek Keswani in 8/17/2012 9:00:28 PM
Hari Om!

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