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दिनचर्या

स्वस्थवृत्त

स्वास्थ्य-रक्षण हेतु स्वस्थ पुरुष को दिवस व रात्रि में जो नित्यकर्म करने चाहिए, उन्हें स्वस्थवृत्त कहते हैं। इसमें दिनचर्या तथा ऋतुचर्या का वर्णन होता है। इनके पालन से शरीर स्वस्थ रहता है।

दिनचर्या

प्रातःउत्थानः

स्वस्थ पुरुष को ब्राह्ममुहूर्त में सूर्योदय से दो घंटे पहले अर्थात् लगभग 4.30 बजे उठना चाहिए। तत्पश्चात चित्त एकाग्र करके इष्ट देवता का स्मरण-चिंतन करना चाहिए। ब्रह्म अर्थात् ईश्वर प्राप्तर्थ साधना के लिए यह समय अनुकूल होने के कारण इसे ब्रह्ममुहूर्त कहा जाता है।

शौचविधिः

वेग आने पर मल-मूत्र का स्वाभाविक उत्सर्ग करें। बिना वेग के अनावश्यक यत्न द्वारा मल-मूत्रोत्सर्ग नहीं करना चाहिए। इससे वायु प्रकुपित होता है।

दंतधावनः

दंतधावन के लिए 25 सें.मी. लम्बी, कनिष्ठिका उँगली के बराबर मोटी, सीधी, हरी लकड़ी का दातौन बनायें। दातौन के लिए कड़वे, कसैले, तीखे रसवाली नीम, बबूल, करंज या खैर वृक्ष की लकड़ी श्रेष्ठ मानी गयी है। लकड़ी चबाकर उसकी कुर्विका बनाकर दाँत साफ करें।

दातौन के अतिरिक्त दंतमंजन का भी उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए सोंठ, काली मिर्च, पीपर, हरड़, बहेड़ा, आँवला, दालचीनी, तेजपत्र तथा इलायची के समभाग चूर्ण में थोड़ा-सा सेंधा नमक तथा तिल का तेल मिलाकर 'दंतशोधक पेस्ट' बनायें। कोमल कुर्विका से अथवा प्रथम उँगली से मसूड़ों को नुकसान पहुँचाये बिना दाँतों पर घिसें। इससे मुख की दुर्गन्ध, मैल तथा कफ निकल जाते हैं एवं मुख में निर्मलता, अन्न में रूचि तथा मन में प्रसन्नता आती है।

दंतधावन के उपरान्त जिह्वा निर्लेखनी से जिह्वा साफ करनी चाहिए। इसके लिए दातौन के दो भाग करके एक भाग का उपयोग करें।

दिन में दो बार दंतधावन करें। भोजन के बाद तथा किसी भी खाद्य-पेय पदार्थ के सेवन के बाद दाँतों व जिह्वा की सफाई अवश्य करनी चाहिए।

गण्डूष धारण (कुल्ले करना)- द्रव्यों को मुख में कुछ समय रखकर निकाल देने को गण्डूष धारण करना कहते हैं। त्रिफला चूर्ण रात को पानी में भिगो दें। सुबह छानकर इस पानी से कुल्ला करें। दंतधावन के बाद गण्डूष धारण करने से अरूचि, दुर्गन्ध, मसूड़ों की कमजोरी दूर होती है। मुँह में हलकापन आता है। गुनगुने तिल तेल से गण्डूष धारण करने से स्वर स्निग्ध होता है। दाँत व मसूड़े वृद्धावस्था तक मजबूत बने रहते हैं। वृद्धावस्था में भी दाँत देर से गिरते हैं।

नेत्र प्रक्षालनः

ठंडे पानी से अथवा त्रिफला चूर्ण रात को पानी में भिगोकर, सुबह कपड़े से छानकर उस पानी से नेत्र धोने चाहिए। दिन में 2-3 बार नेत्र प्रक्षालन आँखों के लिए अत्यन्त हितकारी है।

अंजनविधिः

इसके उपरांत आँखों में 'अंजन' लगाना चाहिए नेत्र् प्रक्षालन तथा अंजन प्रयोग से मनुष्य दीर्घकाल तक बिना कष्ट के सुखपूर्वक सूक्ष्म वस्तुओं को भी देख सकता है। इसके लिए सुरमा उत्तम है। अंजन आँखों में डालने के लिए विशेष तौर पर बनवायी हुई 20सें.मी. लम्बी सोने अथवा चाँदी की सलाई का उपयोग करें।

नस्यः

अंजन के बाद नस्य कर्म करना चाहिए। इसमें नाक में औषधि द्रव्य की बूँदे डाली जाती हैं। इसके लिए अणुतैल का उपयोग श्रेष्ठ है। अणुतैल न हो शुद्ध तिल तेल का भी उपयोग किया जा सकता है। यह तेल गुनगुना करके 2-2 बूँद दोनों नथुनों में डालें। नस्य के लिए प्रातःकाल का समय उत्तम है।

नस्यक्रिया करने से त्वचा दृढ़ तथा कान्तियुक्त होती है। कपाल, सिर के संधिस्थान व स्नायु सशक्त हो जाते हैं। मुख प्रसन्न, आवाज स्निग्ध व गंभीर होती है। बाल सफेद नहीं होते तथा शीघ्र बढ़ जाते हैं। सभी इन्द्रियाँ विमल व अत्यधिक सबल हो जाती हैं।

अभ्यंग (मालिश)

नित्य विधिपूर्वक अभ्यंग दिनचर्या का अंग होना चाहिए। इससे वातदोष का शमन होता है। शरीर पुष्ट होता है, नींद अच्छी आती है, शारीरिक तथा मानसिक श्रम से उत्पन्न थकान दूर होती है, वार्धक्य के लक्षण जल्दी उत्पन्न नहीं होते। अभ्यंग त्वचा के लिए अत्यन्त हितकारी है। इससे त्वचा दृढ़ तथा मुलायम होती है।

अगर सर्वांग अभ्यंग असंभव हो तो सिर, कान तथा पैरों में अवश्य करना चाहिए। अभ्यंग के लिए तिल का तेल उत्तम है। औषध सिद्ध तेलों का उपयोग विशेष लाभदायी है।

शिरोभ्यंगः

सिर पर मालिश करने के लिए ठंडे तेल का उपयोग करें। ब्राह्मी, आँवला, भांगरा, जटामांसी आदि से सिद्ध तिल तेल का उपयोग उत्तम है। इससे बाल मजबूत, करने, घने तथा लम्बे होते हैं। मस्तिष्क में स्थित ज्ञानेन्द्रियों के केन्द्रस्थानों का पोषण होता है। सिर की तृप्ति तथा मुख की त्वचा सुन्दर होती है।

कर्णाभ्यंगः

कान में प्रतिदिन सरसों का तेल डालने से बहरापन नहीं आता। सिर, गर्दन व कान में दर्द नहीं होता।

पादाभ्यंगः पैरों में घी या तेल की मालिश करने से थकावट तुरंत दूर हो जाती है, नेत्रों को आराम मिलता है और नेत्रज्योति बढ़ती है। पैरों की रूक्षता, सुप्ति (सुन्नता), व्रण, बिवाई नष्ट होकर पैरों की त्वचा कोमल हो जाती है।

अभ्यंग निषेधः नवीन ज्वर, अजीर्ण व त्वचा विकारों में तथा कफ के रोगियों को अभ्यंग नहीं करना चाहिए।

(अभ्यंग का विस्तृत विवरण आश्रण से प्रकाशित पुस्तक 'आरोग्यनिधि भाग-1' में देखें।)

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