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सुखमय जीवन का आधारः स्वस्थ शरीर
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सुखमय जीवन का आधारः स्वस्थ शरीर

धर्मार्थ काम मोक्षाणां आरोग्यं मूलमुतमम्।

चरक सूत्रस्थान 115

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थ का प्रधान मूल आरोग्य है।

आरोग्य का लक्ष्य सुख-शान्ति व समृद्धिमय जीवन के साथ अखण्ड आनन्द-अर्थात् आत्मबोध की प्राप्ति है। स्वस्थ शरीर के माध्यम से ही मनुष्य अपने व समाज के लिए उपयोगी बनकर परमात्मा को भी प्राप्त कर सकता है।

स्वस्थ व दीर्घ आयु, वृद्धावस्थापर्यंत मन, बुद्धि व इन्द्रियों की सम्यक् कार्यशीलता के लिए शरीर की रचना, क्रिया तथा मन-बुद्धि व इन्द्रियों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है। शरीर तथा उसके लिए हितकर अहितकर विहार का सम्यक् ज्ञान तथा तदनुरूप आचरण होने पर ही आरोग्यपूर्ण दीर्घायुष्य की प्राप्ति हो सकती है।

शरीर, इन्द्रियाँ, मन और आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं और उस आयु का ज्ञान देने वाला वेद है – आयुर्वेद।

तस्य आयुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः।

वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरूभवोर्हितम्।।

चरक सूत्रस्थान 143

आयुर्वेद आयु का पुण्यतम वेद होने के कारण विद्वानों द्वारा पूजित है। यह मनुष्यों के लिए इस लोक और परलोक में हितकारी है। अपना हित चाहने वाले बुद्धिमान पुरुष को चाहिए की वह आयुर्वेद के उपदेशों का अतिशय आदर के साथ पालन करें।

आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है और यह अपौरूषेय है अर्थात् इसका कोई कार्य नहीं है।

ब्रह्मास्मृत्वाऽऽयुषो वेदम्। (वा.सु.अ. 1)

ब्रह्माजी ने आयुर्वेद का स्मरण किया है।

जिस प्रकार उनकी इच्छा से सृष्टि की उत्पत्ति हुई, उसी प्रकार उनके स्मरणमात्र से आयुर्वेद का आविर्भाव हुआ। ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम एक लाख श्लोकोंवाली 'ब्रह्म संहिता' बनायी व दक्ष प्रजापति को इसका उपदेश दिया। दक्ष प्रजापति ने सूर्यपुत्र अश्विनीकुमारों को आयुर्वेद सिखाया। अश्विनीकुमारों ने इन्द्र को तथा इन्द्र ने आत्रेयादि मुनियों को आयुर्वेद का ज्ञान कराया। उन सब मुनियों नि अग्निवेश, पराशर, जातुकर्ण आदि ऋषियों को ज्ञान कराया, जिन्होंने अपने-अपने नामों की पृथक-पृथक संहिताएँ बनायीं। उन संहिताओं का संग्रह तथा प्रति संस्कार करके शेष भगवान के अंश चरकाचार्य जी ने चरक संहिता बनायी।

आयुर्वेद के आठ अंग हैं। यथा-

कायचिकित्सा – सम्पूर्ण शरीर की चिकित्सा।

कौमारभृत्यतंत्र – बाल चिकित्सा।

भूतविद्या – दैवव्यपाश्रयं चिकित्सा (मंत्र, होम, हवनादि)।

शल्यचिकित्सा – शस्त्रकर्म चिकित्सा।

शालाक्य चिकित्सा – गले के ऊपर के अंगों (नेत्र, कर्ण, नाक आदि) की चिकित्सा।

अगद तंत्र – विष चिकित्सा।

रसायन तंत्र – वृद्धावस्था को दूर करने वाली चिकित्सा।

गाजीकरण तंत्र – शुक्र धातुवर्धक चिकित्सा।

इन आठ अंगों में व्यापी उत्पत्ति के कारण (हेतु), व्याधि के लक्षण (लिंग) व व्याधिनिवृत्ति के उपाय (औषध) – इन त्रिसूत्रों का सूक्ष्म विवेचन समग्ररूप से किया गया है। हेतु, लिंग व औषध – ये आयुर्वेद के तीन स्तम्भ हैं।

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