Gurupoonam Videos


Gurupoonam Audio



Gurupoonam Satsang

भगवान से बड़ा कौन व कैसे ? - स्वामी रामसुखदासजी
Ashram India

भगवान से बड़ा कौन व कैसे ? - स्वामी रामसुखदासजी

       संत तुलसीदासजी कहते हैं :

राम सिंधु घन सज्जन धीरा ।

चंदन तरु हरि संत समीरा ।।

       ‘श्रीरामचन्द्रजी समुद्र हैं तो धीर संत-पुरुष मेघ हैं । श्रीहरि चंदन के वृक्ष हैं तो संत पवन हैं ।’

(श्री रामचरित. उ.कां. : 119.9)

       भगवान श्रीकृष्ण भी दुर्वासाजी से कहते हैं :

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।

साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ।।

       ‘मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ । मुझमें तनिक भी स्वतंत्रता नहीं है । मेरे सीधे-सादे, सरल भक्तों ने मेरे हृदय को अपने हाथ में कर रखा है । भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे ।’(श्रीमद्भागवत : 9.4.63)

       भगवान संतों को बड़ा बताते हैं । भगवान ने कहीं भी अपने को संत से बड़ा बतलाया हो ऐसा देखने में नहीं आया । इस दृष्टि से संत ही बड़े हुए और यदि हम अपने लाभ के लिए विचार करते हैं तो भी संत ही बड़े हैं क्योंकि परमात्मा के सच्चिदानंद रूप में जीवमात्र के हृदय में रहते हुए भी संतकृपा और सत्संग के बिना जीव भगवान के उस परम आनंदमय स्वरूप के अनुभव से वंचित रहकर दुःखी ही रहते हैं । भगवत्स्वरूप का अनुभव भगवद्भक्ति से होता है और वह मिलती है संतकृपा तथा सत्संग से ।

भगति तात अनुपम सुखमूला ।

मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ।।

(श्री रामचरित. अर.कां. : 15.2)

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी ।

बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ।।

(श्री रामचरित. उ.कां. : 44.3)

       अतः हमारे लिए तो संत ही बड़े हुए । भगवत्कृपा से प्राप्त हुई मानव-देह का फल मनुष्य के कर्म एवं साधन के अनुसार स्वर्ग, नरक अथवा मोक्ष - सभी हो सकता है किंतु संतों की कृपा से प्राप्त हुए सत्संग का फल केवल परम पद ही होता है ।

  भगवान तो दुष्टों का उद्धार करते हैं उनका विनाश करके, पर संत दुष्टों का उद्धार करते हैं उनकी वृत्तियों का सुधार करके । भगवान अपने बनाये हुए कानून में बँधे हुए हैं परंतु संतों में दया आ जाती है । इस प्रकार भी संत भगवान से बड़े हैं । भगवान सब जगह मिल सकते हैं पर आत्मज्ञानी संत कहीं-कहीं ही हैं । अतः वे भगवान से भी दुर्लभ हैं ।

 हरि दुरलभ नहिं जगत में, हरिजन दुरलभ होय ।

हरि हेर्याँ सब जग मिलै, हरिजन कहिं एक होय ।। 

       हमारा उद्धार करने में तो संत ही बड़े हुए । अतः हमें उन्हींको बड़ा मानना चाहिए । तात्त्विक दृष्टि से देखें तो संत और भगवान दोनों एक ही हैं । 

संतों का सेवन किस प्रकार किया जाय ? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि संतों के सेवन का सर्वोत्तम ढंग है उनके मन, उनकी आज्ञा के अनुसार चलना, उनके सिद्धांतों का आदरपूर्वक पालन करना । यह संत-सेवन की ऊँची-से-ऊँची विधि है । इसका कारण यह है कि संतों को अपना सिद्धांत जितना प्यारा होता है उतने उनको अपने प्राण भी प्यारे नहीं होते, जो हम लोगों को सबसे अधिक प्यारे हैं । 

उनके सिद्धांत का सांगोपांग (अंगों-उप अंगों सहित) पालन करना, उनके मन के अनुसार चलना और यदि मन का पता न लगे तो इशारे, आज्ञा आदि  के  अनुसार चलना चाहिए । यह उनकी सबसे बड़ी सेवा है - ‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा ।’ अतः शरीर से सेवा करने के साथ ही श्रद्धा-प्रेमपूर्वक मन से भी सेवा की जाय तो कहना ही क्या है ! 

उनका सिद्धांत, भगवद्-अनुभव जानने के लिए उनका संग करके उनसे भगवत्संबंधी बात पूछनी चाहिए । इससे हम अधिक लाभ उठा सकते हैं । संतों से पुत्र, स्त्री, धन, मान, बड़ाई आदि से संबंध रखनेवाले सांसारिक पदार्थ चाहना अमूल्य हीरे को पत्थर से फोड़ना है; यह संतों के संग का सदुपयोग नहीं है । 

वे जो कुछ निर्देश करें उसे उनकी आज्ञा समझकर पालन करें । आज्ञापालन का स्थान सेवा में सबसे ऊँचा माना गया है । 

एक संत थे । उनके पास रहनेवाले श्रद्धालु व्यक्तियों में से एक व्यक्ति की एक दिन संत ने परीक्षा लेनी चाही । वे बोले : ‘‘मेरी कमर में दर्द हो रहा है, जरा अपने पैरों से  इसे दबा दो ।’’ श्रद्धालु ने कहा : ‘‘महाराज ! आपके शरीर पर पैर कैसे रखूँ ?’’ संत ने उत्तर दिया : ‘‘ठीक है, मेरे शरीर पर तो तुम पैर नहीं रखते पर मेरी जबान पर तो पैर रख ही दिया न ?’’ 

हाँ, यह सम्भव है कि हम संत के वचनों का पूरा पालन न कर सकें । किंतु यदि मन में वचन-पालन की नीयत है तथा उसके लिए यथा-सामर्थ्य प्रयत्न भी किया गया है तो फिर चाहे उसका अक्षरशः पालन न भी हो पाया हो तो भी उससे बहुत बड़ा लाभ होता है । 

सत्संग के लिए तो संत स्वयं अपनी ओर से चले जाते हैं क्योंकि प्रेमी-जिज्ञासुओं के पास जाने से भगवद्वाक्यों का मनन, विचार और अनुशीलन (सतत व गहरा अभ्यास) होता है, जो उन्हें अत्यंत प्यारे हैं । इतना ही नहीं, वे अपना संग करनेवाले व्यक्ति का उपकार भी मानते हैं कि इसके कारण हमारा कुछ समय भगवच्चर्चा में व्यतीत हुआ । काकभुशुंडिजी ने गरुड़जी से कहा : ‘‘महाराज ! मुझ पर आपकी बड़ी कृपा हुई जो मुझे सत्संग-भगवच्चर्चा का मौका दिया ।’’

  संत को प्रायः हम समझते नहीं । हम लोग तो उनकी बाहरी क्रियाओं की चमत्कारिक बातों की विशेषता देखना चाहते हैं । अपनी बुद्धि से संतों की पहचान करना बड़ा कठिन है । उनकी पहचान तो उन्हींकी एवं भगवान की कृपा से ही सम्भव है । कसौटी से पहचान करने पर तो हम ही चक्कर खा जाते हैं क्योंकि संतों की कसौटी करना ही गलत है । तो फिर संतों की पहचान कैसे हो ? 

जिनके संग से हमारा साधन बढ़े, हममें दैवी सम्पत्ति आये, हम आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हों, हमारे आचरण में न्याय व उदारता आने लगे, भगवद्-तत्त्व का ज्ञान होने लगे, सत्शास्त्र, भगवान, महापुरुष और धर्म में श्रद्धा बढ़े और भगवान में प्रीति हो व भगवद्-स्मृति अधिक रहने लगे, हमारे लिए वे ही संत हैं । उनसे इस प्रकार का आध्यात्मिक लाभ लेना ही सच्चा लाभ है । 

संतों का संग किया जाय तो वह कभी निष्फल नहीं जाता । पर उनका महत्त्व समझकर उनके सिद्धांतानुसार आचरण करते हुए उनका संग करना उनका वास्तविक संग करना है । इस प्रकार करने से ही उनके संग का वास्तविक लाभ शीघ्र प्रकट होता है । 

       --------------------------------------------------

Who is greater than God? Why?   – Swami Ramsukhdasji

       Sant Tulsidasji said,

राम सिंधु घन सज्जन धीरा ।

चंदन तरु हरि संत समीरा ।।

       “While Shri Rama is the ocean, the wise saints are like the rain-clouds; or to use another metaphor, while Shri Hari is the sandal tree, the saints represent the wind (that diffuse its perfume).”

(Shri Rama Charita Manasa Uttara Kanda: 119.9)

       Lord Krishna also said to Durvasa Muni,

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।

साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ।।

       “Oh Brahmana, I am completely under the control of my devotees. I am like one who has no self-dependence. My heart is won over and hence is in the possession of my righteous devotees, and I am the beloved of them.”  (Shrimad Bhagavata Purana: 9.4.63)

       God has said that saints are greater than Him. I have never found any scripture in which God has said that He is greater than saints. Thus saints are greater. If we think for our benefit, saints are greater. Because despite the Paramatma dwelling in the heart of every jiva as Truth-Consciousness-Bliss absolute, we remain unhappy being deprived of the realization of the Supremely blissful nature of God without saint’s grace and satsang. Realization of the real nature of God is obtained by devotion to God which is obtained through saint’s grace and satsang.

भगति तात अनुपम सुखमूला ।

मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ।।

“Devotion, dear brother, is incomparable and the very root of bliss; it can be acquired only by the favour of saints.” (Shri Rama Charita Manasa Aranya Kanda: 15.2)

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी ।

बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ।।

       “Devotion is independent and a mine of all blessings; men, however, cannot attain it except through the fellowship of saints.” (Shri Rama Charita Manasa Uttara Kanda: 44.3)

       Therefore saints are greater than God for us. The human body obtained by divine grace can be used to attain heaven, hell or moksha according to the actions and sadhana done by him, but satsang obtained through the saint’s grace gives the fruit of only Supreme State.

       God delivers the wicked by destroying them whereas saints do the same by reforming their mental modifications. God is bound by Laws enacted by Him but saints are overcome by mercy. Saints are greater even from this point of view. God can be found everywhere but Self-realized saints can be found in very few places.

हरि दुरलभ नहिं जगत में, हरिजन दुरलभ होय ।

हरि हेर्याँ सब जग मिलै, हरिजन कहिं एक होय ।।

       “In this world God is not a rarity, rather His loving devotee who has taken refuge in Him, is a rarity. On searching, God will be found everywhere but God’s loving devotees can be found in few places.”

       We should believe saints to be greater because they are greater in delivering us. Saint and God, both are one from the philosophical viewpoint.

       How to serve saints? This question can be answered in these words alone. The best way to serve a saint is to follow the dictates of his mind, his commands and follow His principles and ideal with deep regard. This is the highest possible way of serving saints because they love their principles more than their life breath which is dearest to all of us.

We should follow their principles in all respects, and conduct ourselves according to His mind and if we cannot know His mind we should follow his signals, commands etc. This is the greatest service we can render to Him. There is no service greater than following the commands of the saint.” Therefore if we serve Him with our mind also while serving Him physically it will be the best service.

We should live in His company and ask Him about God to know what His principle and divine realization is. We can reap greater benefits from Him this way. To desire worldly things related to a son, a woman, wealth, honour, fame etc. is to break a diamond with a stone. This is not the appropriate use of the company of saints.

Consider all that they suggest as their order and follow them. Obedience to the commands is believed to be the most important way of service.

There was a saint who wanted to test one of His devout followers living with Him. He said, “My back is aching. Press (massage) it with your feet.” The devout person said, “Maharaj, How can I place my foot on your body?” The saint replied, “You did not place your foot on my body but haven’t you placed it on my tongue?”

Yes, it is possible that you cannot follow the order of a saint completely but if your mind is inclined to follow His words, and you have made all possible effort, you will get great benefit even without carrying out His order to the letter.

Saints deliver satsang (uninvited) because by going to the loving aspirants of knowledge they get a chance to reflect, think and contemplate on divine thoughts which are very dear to them. Not only this, they thank the persons who hear His satsang because he could devote some of His time discussing God. Kakabhushundi said to Garuda, “You have done me a kindness by giving me a chance to discuss God through satsang.”

Usually we fail to understand saints. We wish to see some miraculous facts about their outward actions. It is very difficult to recognize a saint with our limited intellect. We can recognize him only through His grace and divine grace. We become perplexed when we try to recognize them by putting them to the test because it is wrong to test saints. Then how to recognize a saint?

On association with a great soul, if our sadhana is enhanced, divine qualities come to us, we progress on the spiritual path, get knowledge about divine truth, our faith increases in true shastras, God, we develop love for God and keep remembering Him then he is a saint for us. To get this type of benefit from Him is true benefit.

The association of saints never goes in vain. To live truly in His company is to understand the importance of His company and put his principles into practice. The real benefit of His company is experienced quickly by doing this.

[ऋषि प्रसाद अंक-293़]

Previous Article संसार से तरने का शास्त्रीय उपाय
Next Article गुरु और सद्‌गुरु
Print
26085 Rate this article:
5.0
Please login or register to post comments.

विश्वप्रेम की जाग्रत मूर्ति हैं सद्गुरुदेव

Ashram India 0 5062 Article rating: 5.0
गुरु के बिना आत्मा-परमात्मा का ज्ञान नहीं होता है । आत्मा-परमात्मा का ज्ञान नहीं हुआ तो मनुष्य पशु जैसा है । खाने-पीने का ज्ञान तो कुत्ते को भी है । कीड़ी को भी पता है कि क्या खानाक्या नहीं खाना है,किधर रहनाकिधर से भाग जाना ।

अनंत है गुरु की महिमा

Ashram India 0 15797 Article rating: 4.3
गुरुपूर्णिमा के दिन गुरु का दर्शनगुरु का पूजन वर्षभर की पूर्णिमाएँ मनाने का पुण्य देता है । दूसरे पुण्य के फल तो सुख देकर नष्ट हो जाते हैं लेकिन गुरु का दर्शन और गुरु का पूजन अनंत फल को देनेवाला है । 
RSS