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विश्वप्रेम की जाग्रत मूर्ति हैं सद्गुरुदेव
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विश्वप्रेम की जाग्रत मूर्ति हैं सद्गुरुदेव

- पूज्य संत श्री आशाराम बापूजी

सद्गुरु-महिमा

गुरु के बिना आत्मा-परमात्मा का ज्ञान नहीं होता है । आत्मा-परमात्मा का ज्ञान नहीं हुआ तो मनुष्य पशु जैसा है । खाने-पीने का ज्ञान तो कुत्ते को भी है । कीड़ी को भी पता है कि क्या खाना, क्या नहीं खाना है, किधर रहना, किधर से भाग जाना । किधर पूँछ हिलाना, किधर पूँछ दबाना यह तो कुत्ता भी जानता है लेकिन यह सब शारीरिक जीवन का ज्ञान है । जीवन जहाँ से शुरू होता है और कभी मिटता नहीं, उस जीवन का ज्ञान आत्मज्ञान है ।

भगवान शिवजी ने पार्वतीजी को वामदेव गुरु से मंत्रदीक्षा दिलायी, काली माता ने प्रकट होकर गदाधर पुजारी को कहा कि ‘तोतापुरी गुरु से ज्ञान लो’ और महाराष्ट— के नामदेव महाराज को भगवान विट्ठल ने प्रकट होकर कहा : ‘विसोबा खेचर से दीक्षा लो ।’ तो गुरु के ज्ञान के बिना, आत्मज्ञान के प्रकाश के बिना जीवन निर्वासनिक, निर्दुःख नहीं होता है ।

सोने की लंका पा ली रावण ने लेकिन निर्वासनिक नहीं हुआ, निर्दुःख नहीं हुआ और शबरी भीलन ने केवल मतंग गुरु का सत्संग सुना और गुरुवचनों का आदर किया तो वह निर्वासनिक हो गयी, निर्दुःख हो गयी । वासना ने रावण को कहीं का नहीं रखा और निर्वासनिक शबरी, राजा जनक आदि ने पूर्णता पा ली ।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान ।

शबरी भीलन आत्मरस से ऐसी पवित्र हो गयी कि भगवान राम उसके जूठे बेर खाते हैं । मीराबाई का भोग लगता तो श्रीकृष्ण खाते हैं । भगवान की भक्ति और भगवान का ज्ञान सत्संग से जैसा मिलता है, ऐसा सोने की लंका पाने से भी नहीं मिलता । व्यासपूर्णिमा, गुरुपूर्णिमा कितना दिव्य ज्ञान देती है कि हम भगवान वेदव्यास के ऋणी हैं, गुरु के हम आभारी हैं । जिसके जीवन में सद्गुरु नहीं हैं उसका कोई सच्चा हितैषी भी नहीं है । बिना गुरु के व्यक्ति मजदूर है, संसार का बोझा उठा-उठा के मर जाते हैं ।

कालसर्पयोग बड़ा दुःख देता है लेकिन गुरु का मानसिक पूजन व प्रदक्षिणा, गुरुध्यान, गुरुमंत्र के जप और गुरु के आदर से कालसर्पयोग का प्रभाव खत्म हो जाता है ।

गुरु किसको बोलते हैं ? जो विश्वप्रेम की जाग्रत मूर्ति हैं । विश्व की किसी भी जाति का आदमी हो, किसी भी मजहब का हो सबके लिए जिनके हृदय में मंगलमय आत्मदृष्टि, अपनत्व है, वे हैं सद्गुरु ।

गुरुकृपा हि केवलं...

गुरुकृपा क्या होती है ? जो संत हैं, सद्गुरु हैं वे मरनेवाले शरीर में अनंत का दर्शन करा देंगे । जो मुर्दा शरीर है, शव है, उसमें शिव का साक्षात्कार, जो जड़ है उसमें चेतन का अनुभव करा दे उसको बोलते हैं गुरुकृपा । जैसे चन्द्रमा से चकोर तृप्ति पाता है, पानी से मछली आनंद पाती है और भगवान के दर्शन से भक्त आनंदित होते हैं, ऐसे ही सद्गुरु के दर्शन से सत्संगी आनंदित, आह्लादित और ज्ञानसम्पन्न होते हैं । मेरे को अगर गुरु नहीं मिले होते तो मैंने जितनी तपस्या की उससे हजार गुना भी ज्यादा करता तो भी इतना मुझे फायदा नहीं होता जितना गुरुकृपा से हुआ । बिल्कुल सच्ची, पक्की बात है ।

मैं अपने बापूजी (भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज) की बात करता हूँ । साँईं से (मन-ही-मन) बातचीत हुई । वे पूछ रहे थे : ‘‘छा खपे ?’’ मतलब क्या चाहिए ? मैंने कहा : ‘‘जंहिं खे खपे, तंहिं खे खपायो ।’’ मतलब जिसको चाहिए उसीको खपा दो । जो अब भी चाहनेवाला है तो उसीको खपाओ । बहुत हँसे, आनंदित हो रहे थे ।

आध्यात्मिक ज्ञान गुरु-परम्परा से ही मिलता है । नाथ सम्प्रदाय में पुत्र-पिता की परम्परा नहीं होती है, गुरुवंश की परम्परा होती है । गोरखनाथजी मत्स्येन्द्रनाथजी के पुत्र हैं । मत्स्येन्द्रनाथजी अपने गुरु के पुत्र हैं । दैहिक पिता की परम्परा नहीं चलती, आध्यात्मिक पिता की परम्परा चलती है । आशाराम थाऊमल नहीं चलेगा, आशाराम लीलाशाहजी । लीलाशाहजी केशवानंदजी चलेंगे । केशवानंदजी से और आगे चलेंगे । ऐसे करते-करते दादू दयालजी तक परम्परा जायेगी और दादू दयालजी से आगे जायेंगे तो ब्रह्माजी तक, और आगे जायेंगे तो विष्णु भगवान तक । विष्णु भगवान जहाँ से पैदा हुए उस ब्रह्म तक की हमारी परम्परा है, आपकी भी वही है । देखा जाय तो आपका-हमारा मूल ब्रह्म ही है ।

ज्ञान की परम्परा से दीये से दीया जलता है । तोतापुरीजी के शिष्य रामकृष्ण परमहंस, रामकृष्ण से ज्ञान मिला विवेकानंदजी को ।  ऐसे ही अष्टावक्र मुनि हो गये, उनके शिष्य थे राजा जनक और जनक से ज्ञान मिला शुकदेवजी को । उद्दालक से आत्मसाक्षात्कार हुआ श्वेतकेतु को, भगवान सूर्य से याज्ञवल्क्य को और याज्ञवल्क्य से मैत्रेयी को ।

तो यह ज्ञान किताबों से नहीं मिलता, दीये से दीया जलता है । हयात महापुरुषों से ही आत्मसाक्षात्कार होता है, पुस्तक पढ़ के कोई साक्षात्कारी हो जाय यह सम्भव ही नहीं है । सद्गुरु के संग से बुद्धि की ग्रहणशक्ति बढ़ती है, बुराइयाँ कम होती हैं, वर्षों की थकान मिटती है ।

‘वह भगवान, यह भगवान, यह मिले, वह मिले...’ अरे ! जो कभी नहीं बिछुड़ता है उस मिले-मिलाये में विश्रांति सद्गुरु की कृपा से ही होती है ।

गुरुमंत्र का माहात्म्य

‘गुरु’ शब्द कैसा होता है पता है ?

गुरु शब्द में जो ‘ग’कार है वह सिद्धि देनेवाला है, ‘र’कार है वह पाप को हरनेवाला है और ‘उ’कार अव्यक्त नारायण के साथ, हरि के साथ जोड़ देता है केवल गुरु शब्द बोलने से । ‘गुरु’ शब्द बहुत प्रभावशाली है और गुरु-दर्शन, गुरु-आशीष बहुत-बहुत कल्याण करता है । भगवान का एक नाम ‘गुरु’ भी है । तो और सब ‘पूर्णिमा’ हैं लेकिन यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा ‘गुरुपूर्णिमा’ है अर्थात् पाप, ताप, अज्ञान, अंधकार मिटानेवाली बड़ी पूर्णिमा, भगवान से मिलानेवाली पूर्णिमा और सिद्धि देनेवाली पूर्णिमा है । ऐसी है गुरुपूर्णिमा । जैसे ‘गं गं गं’ जप करें तो बच्चों की पढ़ाई में सिद्धि होती है । ऐसे ही ‘गुरु, गुरु, गुरु’ जपें तो भक्तों का मनोरथ पूरा होता है । भगवान शिवजी कहते हैं :

गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्ध्यन्ति नान्यथा ।...

‘जिसके मुख में गुरुमंत्र है उसके सब कर्म सिद्ध होते हैं, दूसरे के नहीं ।’ जिसके जीवन में गुरु नहीं हैं उसका कोई सच्चा हित करनेवाला भी नहीं है । जिसके जीवन में गुरु हैं वह चाहे बाहर से शबरी भीलन जैसा गरीब हो फिर भी सोने की लंकावाले रावण से शबरी आगे आ गयी ।

गुरुपूर्णिमा का महत्त्व

ब्राह्मणों के लिए श्रावणी पूर्णिमा, क्षत्रियों के लिए दशहरे का त्यौहार, वैश्यों के लिए दीपावली का त्यौहार तथा आम आदमी के लिए होली का त्यौहार... लेकिन गुरुपूनम का त्यौहार तो सभी मनुष्यों के लिए, देवताओं के लिए, दैत्यों के लिए - सभीके लिए है । भगवान श्रीकृष्ण भी गुरुपूनम का त्यौहार मनाते हैं, अपने गुरु के पास जाते हैं । देवता लोग भी अपने गुरु बृहस्पति का पूजन करते हैं और दैत्य लोग अपने गुरु शुक्राचार्य का पूजन करते हैं और सभी मनुष्यों के लिए गुरुपूर्णिमा का महत्त्व है । इसको व्यासपूर्णिमा भी बोलते हैं । यह मन्वंतर का प्रथम दिन है । महाभारत का सम्पन्न दिवस और विश्व के प्रथम आर्षग्रंथ ‘ब्रह्मसूत्र’ का आरम्भ दिवस है व्यासपूर्णिमा ।

एटलांटिक सभ्यता, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, मिस्र, तिब्बत, चीन, जापान, मेसोपोटेमिया आदि में भी गुरु का महत्त्व था, व्यासपूर्णिमा का ज्ञान, प्रचार-प्रसार का लाभ उन लोगों को भी मिला है ।

कितने भी तीर्थ करो, कितने भी देवी-देवताओं को मानो फिर भी किसीकी पूजा रह जाती है लेकिन गुरुपूनम के दिन गुरुदेव की मन से पूजा की तो वर्षभर की पूर्णिमाएँ करने का व्रतफल मिलता है और सारे देवताओं व भगवानों की पूजा का फल मिल जाता है ।   

[ऋषि प्रसाद अंक- 258]

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विश्वप्रेम की जाग्रत मूर्ति हैं सद्गुरुदेव

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गुरु के बिना आत्मा-परमात्मा का ज्ञान नहीं होता है । आत्मा-परमात्मा का ज्ञान नहीं हुआ तो मनुष्य पशु जैसा है । खाने-पीने का ज्ञान तो कुत्ते को भी है । कीड़ी को भी पता है कि क्या खानाक्या नहीं खाना है,किधर रहनाकिधर से भाग जाना ।

अनंत है गुरु की महिमा

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गुरुपूर्णिमा के दिन गुरु का दर्शनगुरु का पूजन वर्षभर की पूर्णिमाएँ मनाने का पुण्य देता है । दूसरे पुण्य के फल तो सुख देकर नष्ट हो जाते हैं लेकिन गुरु का दर्शन और गुरु का पूजन अनंत फल को देनेवाला है । 
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