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पुण्यमय दर्शन किसका ?

'महाभारत' भगवान व्यास जी कहते हैं-

यो यादृशेन भावेन तिष्ठत्यस्यां युधिष्ठिर।

हर्षदैन्यादिरूपेण तस्य वर्षं प्रयाति वै।।

'हे युधिष्ठिर ! आज नूतन वर्ष के प्रथम दिन जो मनुष्य हर्ष में रहता है, उसका पूरा वर्ष हर्ष में जाता है और जो शोक में रहता है, उसका पूरा वर्ष शोक में व्यतीत होता है।'

दीपावली के दिन, नूतन वर्ष के दिन मंगलमय चीजों का दर्शन करना भी शुभ माना गया है, पुण्य-प्रदायक माना गया है। जैसेः

उत्तम ब्राह्मण, तीर्थ, वैष्णव, देव-प्रतिमा, सूर्यदेव, सती स्त्री, संन्यासी, यति, ब्रह्मचारी, गौ, अग्नि, गुरु, गजराज, सिंह, श्वेत अश्व, शुक, कोकिल, खंजरीट (खंजन), हंस, मोर, नीलकंठ, शंख पक्षी, बछड़े सहित गाय, पीपल वृक्ष, पति-पुत्रावली नारी, तीर्थयात्री, दीपक, सुवर्णमणिमोतीहीरामाणिक्यतुलसीश्वेत पुष्पफ़लश्वेत धान्य, घी, दही, शहद, भरा हुआ घड़ा, लावा, दर्पण, जल, श्वेत पुष्पों की माला, गोरोचन, कपूर, चाँदी, तालाब, फूलों से भरी हुई वाटिका, शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा, चंदन, कस्तूरी, कुंकुम, पताका, अक्षयवट (प्रयाग तथा गया स्थित वटवृक्ष) देववृक्ष (गूगल), देवालय, देवसंबंधी जलाशय, देवता के आश्रित भक्त, देववट, सुगंधित वायु शंख, दुंदुभि, सीपी, मूँगा, स्फटिक मणि, कुश की जड़, गंगाजी मिट्टी, कुश, ताँबा, पुराण की पुस्तक, शुद्ध और बीजमंत्रसहित भगवान विष्णु का यंत्र, चिकनी दूब, रत्न, तपस्वी, सिद्ध मंत्र, समुद्र, कृष्णसार (काला) मृग, यज्ञ, महान उत्सव, गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोधूलि, गौशाला, गोखुर, पकी हुई फसल से भरा खेत, सुंदर (सदाचारी) पद्मिनी, सुंदर वेष, वस्त्र एवं दिव्य आभूषणों से विभूषित सौभाग्यवती स्त्री, क्षेमकरी, गंध, दूर्वा, चावल औऱ अक्षत (अखंड चावल), सिद्धान्न (पकाया हुआ अन्न) और उत्तम अन्न – इन सबके दर्शन से पुण्य लाभ होता है।

(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्यायः 76 एवं 78)

लेकिन जिनके हृदय में परमात्मा प्रकट हुए हैं, ऐसे साक्षात् कोई लीलाशाहजी बापू जैसे, नरसिंह मेहता जैसे संत अगर मिल जायें तो समझ लेना चाहिए कि भगवान की हम पर अति-अति विशेष, महाविशेष कृपा है।

                

नूतन वर्ष - संदेश

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रावण पर राम की विजय का अर्थात् काम राम की विजय का और अज्ञानरूपी अंधकार पर ज्ञानरूपी प्रकाश की विजय का संदेश देता है – जगमगाते दीपों का उत्सव 'दीपावली।'

 

भारतीय संस्कृति के इस प्रकाशमय पर्व की आप सभी को खूब-खूब शुभकामनाएँ... आप सभी का जीवन ज्ञानरूपी प्रकाश से जगमगाता रहे... दीपावली और नूतन वर्ष की यही शुभकामनाएँ...

 

दीपावली का दूसरा दिन अर्थात् नूतन वर्ष का प्रथम दिन.. जो वर्ष के प्रथम दिन हर्ष, दैन्य आदि जिस भाव में रहता है, उसका संपूर्ण वर्ष उसी भाव में बीतता है। 'महाभारत' में पितामह भीष्म महाराज युधिष्ठिर से कहते हैं-

 

यो यादृशेन भावेन तिष्ठत्यस्यां युधिष्ठिर।

हर्षदैन्यादिरूपेण तस्य वर्षं प्रयाति वै।।

 

'हे युधिष्ठिर ! आज नूतन वर्ष के प्रथम दिन जो मनुष्य हर्ष में रहता है उसका पूरा वर्ष हर्ष में जाता है और जो शोक में रहता है, उसका पूरा वर्ष शोक में ही व्यतीत होता है।'

 

अतः वर्ष का प्रथम दिन हर्ष में बीते, ऐसा प्रयत्न करें। वर्ष का प्रथम दिन दीनता-हीनता अथवा पाप-ताप में न बीते वरन् शुभ चिंतन में, सत्कर्मों में प्रसन्नता में बीते ऐसा यत्न करें।

 

सर्वश्रेष्ठ तो यह है कि वर्ष का प्रथम दिन परमात्म-चिंतन, परमात्म-ज्ञान और परमात्म-शांति में बीते ताकि पूरा वर्ष वैसा ही बीते। इसलिए दीपावली की रात्रि को वैसा ही चिंतन करते-करते सोना ताकि नूतन वर्ष की सुबह का पहला क्षण भी वैसा ही हो। दूसरा, तीसरा, चौथा... क्षण भी वैसा ही हो। वर्ष का प्रथम दिन इस प्रकार से आरंभ करना कि पूरा वर्ष भगवन्नाम-जप, भगवान के ध्यान, भगवान के चिंतन में बीते....

 

नूतन वर्ष के दिन अपने जीवन में एक ऊँचा दृष्टिबिंदु होना अत्यंत आवश्यक है। जीवन की ऊँचाइयाँ मिलती हैं – दुर्गुणों को हटाने और सदगुणों को बढ़ाने से लेकिन सदगुणों की भी एक सीमा है। सदगुणी स्वर्ग तक जा सकता है, दुर्गुणी नरक तक जा सकता है। मिश्रितवाला मनुष्य-जन्म लेकर सुख-दुःख, पाप-पुण्य की खिचड़ी खाता है।

 

दुर्गुणों से बचने के लिए सदगुण अच्छे हैं, लेकिन मैं सदगुणी हूँ इस बेवकूफी का भी त्याग करना पड़ता है। श्रीकृष्ण सबसे ऊँची बात बताते हैं, सबसे ऊँची निगाह देते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं-

 

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।

न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि कांक्षति।।

 

'हे अर्जुन ! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है (वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है)।'

(गीताः 14.22)

 

सत्त्वगुण प्रकाश है, रजोगुण प्रवृत्ति है और तमोगुण मोह है। ज्ञानी उनमें पड़ता भी नहीं और उनसे निकलता भी नहीं, न उनको चाहता है और न ही उनसे भागता है – यह बहुत ऊँचा दृष्टिबिंदु हैं।

 

'हमारे जीवन में इसकी प्रधानता है.... उसकी प्रधानता है...' यह सब लौकिक दृष्टि है। सच्चाई तो यह है कि सबके जीवन में सब दुःखों से निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति की ही प्रधानता है।

 

इसके लिए सुबह नींद में से उठते समय अपने संकल्प में विकल्प न घुसे, ऐसा संकल्प करें। आपने कोई ऊँचा इरादा बनाकर संकल्प किया है तो उस संकल्प में कोई विकल्प न घुसे इसकी सावधानी रखें।

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संकल्पों की शक्ति 'एटॉमिक पावर (आण्विक शक्ति)' से, भी ज्यादा महत्व रखती है और भारतीय संस्कृति ने इसे अच्छी तरह से महसूस किया है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने दीपावली और नूतन वर्ष जैसे पर्वों का आयोजन किया है ताकि मनुष्य आपसी राग-द्वेष भूलकर और परस्पर सौहार्द बढ़ाकर उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहे....

 

राग-द्वेष में मलिन संकल्प होते हैं, जो बंधनकारी होते हैं। राग आकर चित्त में एक रेखा खींच देता है तो द्वेष आकर दूसरी रेखा खींच देता है। इससे चित्त मलिन हो जाता है। इसीलिए परस्पर के राग-द्वेष को मिटाने के लिए'नूतन वर्षाभिनंदन' की व्यवस्था है।

 

शास्त्रों में आता हैः विदूषाणां किं लक्षणं? पूर्ण विद्वान, पूर्ण बुद्धिमान के लक्षण क्या हैं? अदृढ रागद्वेषः। जिसके चित्त में राग-द्वेष दृढ़ नहीं है, वह विद्वान है।'

 

निम्न व्यक्ति का राग-द्वेष होता है लोहे पर लकीर के समान। मध्यम व्यक्ति का राग-द्वेष होता है धरती पर लकीर के समान। भक्त और जिज्ञासु का राग-द्वेष होता है – बालू पर लकीर के समान और ज्ञानी के बाह्य व्यवहार में हल्का-फुल्का राग-द्वेष दिखता भी है, पर चित्त में देखो तो कुछ नहीं।

 

इस नूतन वर्ष के दिन हम भी यह संकल्प करें कि 'हमारा चित्त किसी बाह्य वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति में न फँसे।' क्योंकि बाह्य जो कुछ भी है, प्रकृति का है। उसमें परिवर्तन अवश्यंभावी है, लेकिन परिवर्तन जिससे प्रतीत होता है, वह परमात्मा एकरस है और अपने से दूर नहीं है। वह पराया नहीं है और उसका हम कभी त्याग नहीं कर सकते हैं।

 

संसार की किसी भी परिस्थिति को हम रख नहीं सकते हैं और अपने आत्मा-परमात्मा का हम त्याग कर नहीं सकते हैं। जिसका त्याग नहीं कर सकते, उसको जानने का इरादा पक्का कर लें और जिसको सदा रख नहीं सकते, उस संसार से अहंता-ममता मिटाने का इरादा पक्का कर लें, बस। अगर इतना कर लिया तो फिर आपके कदम ठीक जगह पर पड़ेंगे। फिर महाराज ! मुझे यह सफलता मिली। ऐसा सफलता का गर्व न होगा बल्कि सारी सफलताएँ तो क्या, ऋद्धि-सिद्धियाँ भी आकर अपने खेल दिखायेंगी तो वे आपको तुच्छ लगेंगी। इस अवस्थावाले के लिए उपनिषद ने कहाः

 

यो एवं ब्रह्मैव जानाति तेषां देवानां बलिंविहति।

 

'जो ब्रह्म को जानता है, उस पर देवता तक कुर्बान हो जाते हैं।'

 

श्री कृष्ण और उनके प्रियपात्र प्रतिदिन प्रातः ऊँचा चिंतन करके ही धरती पर पैर रखते थे, बिस्तर का त्याग करते थे। इस नूतन वर्ष का संदेश यही है कि आपने जो ब्रह्मज्ञान की बातें सुनी हैं, ईश्वरीय अनुभव में सफल होने की जो युक्तियाँ सुनी हैं उन युक्तियों को, उन बातों को प्रातः उठते ही दोहरायें, बाद में बिस्तर का त्याग करें।

 

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दूसरी बात, अपने में जो कमियाँ हैं उन्हें जितना हम जानते हैं, उतना और कोई नहीं जानता। हमारी कमियाँ न पड़ोसी जानता है, न कुटुंबी जानता है, न पति जानता है, न पत्नी जानती है। अतः अपनी कमियाँ स्वयं ही निकाली जा सकती हैं। जैसे, पैर में काँटे चुभने पर एक-एक करके उन्हें निकाला जाता है, वैसे ही अपनी गलतियों को चुन-चुनकर निकालना चाहिए। ज्यों-ज्यों आपकी कमियाँ निकलती जायेंगी, त्यों-त्यों आत्मानुभव, आत्मसामर्थ्य का निखार आता जायेगा।

 

तीसरी बात, भूतकाल को भूल जाओ। सोचते हैं- 'हम छोटे थे तो ऐसे थे, वैसे थे....' तुम ऐसे-वैसे नहीं थे भैया ! तुम्हारे शरीर और चित्त ऐसे वैसे थे। तुम तो सदा से एकरस हो। तुम तो वह हो, जैसा नानक जी कहते हैं-

 

आदि सचु जुगादि सचु। है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

 

चौथी बात भविष्य की कल्पना मत करो। हम मरने के बाद स्वर्ग में जायेंगे या बिस्त में जायेंगे। इस भ्रांति को निकाल दो वरन् जीते जी ही वह अनुभव पा लो, जिसके आगे स्वर्ग का सुख तो क्या, इंद्र का वैभव भी तुच्छ भासता है।

 

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संत महापुरुषों की युक्तियों को अपनाकर ऐसे बन जाओ कि तुम जहाँ कदम रखो वहाँ प्रकाश हो जाये। तुम जहाँ जाओ वहाँ का वातावरण रसमय, ज्ञानमय हो जाय। फिर वर्ष में केवल एक ही दिन दिवाली होगी ऐसी बात नहीं, तुम्हारा हर दिन दिवाली हो जायेगा.. हर सुबह नूतनता की खबरें देगी...

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