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भगवत्प्राप्त महापुरुषों की मनोहर

भगवत्प्राप्त महापुरुषों की मनोहर
पुष्पमालिका के दिव्य पुष्प : प्रातःस्मरणीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

मानवमात्र आत्मिक शांति हेतु प्रयत्नशील है। जो मनुष्य-जीवन के परम लक्ष्य परमात्मप्राप्ति तक पहुँच जाते हैं, वे परमात्मा में रमण करते हैं। जिनका अब कोई कर्तव्य शेष नहीं रह गया है, जिनका अस्तित्वमात्र लोक-कल्याणकारी बना हुआ है, वे संत-महापुरुष कहलाते हैं। महान इसलिए क्योंकि वे सदैव महान तत्त्व ‘आत्मा’ में अर्थात् अपने आत्मस्वरूप में स्थित होते हैं।

यही महान तत्त्व, आत्मतत्त्व जिस मानव-शरीर में खिल उठता है वह फिर सामान्य शरीर नहीं कहलाता। फिर उन्हें कोई भगवान व्यास, आद्य शंकराचार्य, स्वामी रामतीर्थ, संत कबीर तो कोई भगवत्पाद पूज्य लीलाशाहजी महाराज कहता है। फिर उनका शरीर तो क्या, उनके सम्पर्क में रहनेवाली जड़ वस्तुएँ वस्त्र, पादुकाएँ आदि भी पूज्य बन जाती हैं!

इस भारतभूमि का तो सौभाग्य ही रहा है कि यहाँ ऐसी दिव्य विभूतियों का अवतरण होता ही रहा है। आधुनिक काल में भी संत-अवतरण की यह दिव्य परम्परा अवरुद्ध नहीं हुई है।
पूज्य संत श्री आशारामजी बापू भी संतों की ऐसी मनोहर पुष्पमालिका के एक पूर्ण विकसित, सुरभित, प्रफुल्लित पुष्प हैं। पूज्यश्री के चहुँओर एक ऐसा प्रेममय आत्मीयतापूर्ण वातावरण हर समय रहता है कि आनेवाले भक्त-श्रद्धालुजन निःसंकोच अपने अंतर में वर्षों से दबे हुए दुःख, शोक तथा चिंताओं की गठरी खोल देते हैं और हलके हो जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं : ‘‘बापूजी! आपके पास न मालूम ऐसा कौन-सा जादू है कि हम फिर-फिर से आये बिना नहीं रह पाते।’’

पूज्यश्री कहते हैं : ‘‘भाई! मेरे पास ऐसा कुछ भी जादू या गुप्त मंत्र नहीं है। जो संत तुलसीदासजी, संत कबीरजी के पास था वही मेरे पास भी है। वशीकरण मंत्र प्रेम को...
बस इतना ही मंत्र है। सबको प्रेम चाहिए। वह निर्दोष-परमात्म प्रेम मैं लुटाता हूँ। इसलिए मुझे ऐसा अखूट प्रेम का धन ‘आत्मधन’ मिला है कि उसे कितना भी लुटाओ, खुटता नहीं, समाप्त नहीं होता। लोग अपने-अपने स्वार्थ को नाप-तौलकर प्रेम करते हैं किंतु इधर तो कोई स्वार्थ है नहीं। हमने सारे स्वार्थ उस परम प्यारे प्रभु के स्वार्थ के साथ एक कर दिये हैं। जिसके हाथ में सबके प्रेम और आनंद की चाबी है उस प्रभु को हमने अपना बना लिया है, इसलिए मुक्तहस्त प्रेम बाँटता हूँ। आप भी सबको निःस्वार्थ भाव से, आत्मभाव से देखने और प्रेम करने की यह कला सीख लो।’’

ऐसे संतों के कारण ही इस पृथ्वी में रस है और दुनिया में जो थोड़ी-बहुत खुशी और रौनक देखने को मिलती है वह भी ऐसे महापुरुषों के प्रकट या गुप्त अस्तित्व के कारण ही है। ‘जिस क्षण विश्व से ऐसे महापुरुषों का लोप होगा, उसी क्षण दुनिया घिनौना नरक बन जायेगी और शीघ्र ही नष्ट हो जायेगी।’ - ऐसा स्वामी विवेकानंद ने कहा था।
पूज्य बापूजी का सान्निध्य संसार के लोगों के हृदयों में ज्ञान की वर्षा करता है, उन्हें शांतिरस से सींचता है और उनमें विवेक का प्रकाश भरता है। उनके सत्संग-सान्निध्य और आत्मिक दृष्टिपातमात्र से लोगों के हृदय में स्फूर्ति तथा नवजीवन का संचार होता है।

रंक से लेकर राजा तक और बाल से लेकर वृद्ध तक सभी पूज्यश्री की कृपा के पात्र बनकर अपने जीवन को ईश्वरीय सुख की ओर ले जा रहे हैं। अमीर-गरीब, सभी जाति, सभी सम्प्रदाय, सभी धर्मों के लोग उनके ज्ञान का, आत्मानंद का और आत्मानुभव का प्रसाद लेते हैं। उनके मस्तिष्क से विश्व-कल्याण के विचार प्रसूत होते हैं। जो उनके सम्पर्क में आ जाता है, वह पाप-ताप से मुक्त होकर पवित्रात्मा होने लगता है। उपनिषद् कहती है :
यद् यद् स्पृश्यति पाणिभ्यां यद् यद् पश्यति चक्षुषा।
स्थावराणापिमुच्यंते किं पुनः प्राकृता जनाः॥

‘ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ब्रह्मभाव से स्वयं के हाथों द्वारा जिनको स्पर्श करते हैं, आँखों द्वारा जिनको देखते हैं वे जड़ पदार्थ भी कालांतर में जीवत्व पाकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं तो फिर उनकी दृष्टि में आये हुए व्यक्तियों के देर-सवेर होनेवाले मोक्ष के बारे में शंका ही कैसी!’
कोटि-कोटि प्रणाम हैं ऐसे महापुरुषों को जो अपने एकांत को न्योछावर करके, अपनी ब्रह्मानंद की मस्ती को छोड़कर भी दूसरों की भटकती नाव को किनारे ले जा रहे हैं। हम स्वयं आत्मशांति में तृप्त हों, आत्मा की गहराई में उतरें, सुख-दुःख के थपेड़ों को सपना समझकर उनके साक्षी सोऽहं स्वभाव का अनुभव करके अपने मुक्तात्मा, जितात्मा, तृप्तात्मा स्वभाव का अनुभव कर पायें, उसे जान पायें - ऐसी उन महापुरुष के श्रीचरणों में प्रार्थना है।

 
 
 
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