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ईश्वरप्राप्ति की योजना बनाने का अवसर है वर्षगाँठ

ईश्वरप्राप्ति की योजना बनाने का अवसर है वर्षगाँठ 
(पूज्य बापूजी का ७९वाँ अवतरण दिवस : २८ अप्रैल)


वर्षगाँठ का उद्देश्य


पिछला वर्ष बीत गया, नया आने को है, उसके बीच खड़े रहने का नाम है वर्षगाँठ । इस दिन हिसाब कर लेना चाहिए कि ‘गत वर्ष में हमने कितना जप किया ? उससे ज्यादा कर सकते थे कि नहीं ? हमसे क्या-क्या गलतियाँ हो गयीं ? हमने कर्ताभाव में आकर क्या-क्या किया और अकर्ताभाव में आकर क्या होने दिया ?' वर्षभर में जिन गलतियों से हम अपने ईश्वरीय स्वभाव से, आत्मस्वभाव से अथवा साधक-स्वभाव से नीचे आये, जिन गलतियों के कारण हम ईश्वर की या अपनी नजर में गिर गये वे गलतियाँ जिन कारणों से हुर्इं उनका विचार करके अब न करने का संकल्प करना - यह वर्षगाँठ है ।

दूसरी बात, आनेवाले वर्ष के लिए योजना बना लेना । योजना बनानी है कि ‘हम सम रहेंगे । सम रहने के लिए आत्मनिष्ठा, ज्ञाननिष्ठा, भक्तिनिष्ठा, प्रेमनिष्ठा, सेवानिष्ठा को जीवन में महत्त्व देंगे ।ङ्क जिस वस्तु में महत्त्वबुद्धि होती है, उसमें पहुँचने का मन होता है । ईश्वर में, आत्मज्ञान में, गुरु में महत्त्वबुद्धि होने से हम उधर पहुँचते हैं । धन में महत्त्वबुद्धि होने से लोग छल-कपट करके भी धन कमाने लग जाते हैं । पद में महत्त्वबुद्धि होने से न जाने कितने-कितने दाँव-पेच करके भी पद पर पहुँच जाते हैं । अगर आत्मज्ञान में महत्त्वबुद्धि आ जाय तो बेड़ा पार हो जाय । तो वर्षगाँठ के दिन नये वर्ष की योजना बनानी चाहिए कि ‘हमें जितना प्रयत्न करना चाहिए उतना करेंगे, जितना होगा उतना नहीं । रेलगाड़ी या गाड़ी में बैठते हैं तो जितना किराया हम दे सकते हैं उतना देने से टिकट नहीं मिलता बल्कि जितना किराया देना चाहिए उतना ही देना पड़ता है, ऐसे ही जितना यत्न करना चाहिए उतना यत्न करके आनेवाले वर्ष में हम परमात्म-निष्ठा, परमात्मज्ञान, परमात्म-मस्ती, परमात्मप्रेम, परमात्मरस में, परमात्म-स्थिति में रहेंगे ।'


अंदर का रस प्रकट करो शरीर के जन्मदिन को भी वर्षगाँठ बोलते हैं और गुरुदीक्षा जिस दिन मिली उस दिन से भी उम्र गिनी जाती है अथवा भगवान के जन्मदिन या गुरु के जन्मदिन से भी सेवाकार्य करने का संकल्प लेकर साधक लोग वर्षगाँठ मनाते हैं । गुरु व भगवान को मेवा-मिठाई, फूल-फलादि भेंट करते हैं लेकिन गुरु और भगवान तो इन चीजों की अपेक्षा जिन कार्यों से तुम्हारी उन्नति होती है उनसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं ।


तो वर्षगाँठ के दिन हम लोग यह संकल्प कर लें कि ‘बापूजी की वर्षगाँठ से लेकर गुरुपूनम तक हम इतने दिन मौन रखेंगे, १५ दिन में एक दिन उपवास रखेंगे ।' १५ दिन में एकाध उपवास से शरीर की शुद्धि होती है और ध्यान-भजन में उन्नति होती है । ध्यान के द्वारा अद्भुत शक्ति प्राप्त होती है । एकाग्रता से जो सत्संग सुनते हैं, उनमें मननशक्ति का प्राकट्य होता है, उनको निदिध्यासन शक्ति का लाभ मिलता है । उनकी भावनाएँ एवं ज्ञान विकसित होते हैं । उनके संकल्प में दृढ़ता, सत्यता व चित्त में प्रसन्नता आती है और उनकी बुद्धि में सत्संग के वचनों का अर्थ प्रकट होने लगता है । अपनी शक्तियाँ विकसित करने के लिए एकाग्रचित्त होकर सत्संग सुनना, मनन करना भी साधना है । हरिनाम लेकर नृत्य करना भी साधना है । हो सके तो रोज ५-१५ मिनट कमरा बंद करके नाचो । जैसा भी नाचना आये नाचो । ‘हरि हरि बोल' करके नाचो, ‘राम-राम' करके नाचो, तबीयत ठीक होगी, अंदर का रस प्रकट होगा । 


सुबह उठो तो मन-ही-मन भगवान या गुरु से या तो दोनों से हाथ मिलाओ । भावना करो कि ‘हम ठाकुरजी से हाथ मिला रहे हैं' और हाथ ऐसा जोरों का दबाया है कि ‘आहाहा !...' थोड़ी देर ‘हा हा...' करके उछलो-कूदो । तुम्हारे छुपे हुए ज्ञान को, प्रेम को, रस को प्रकटाओ । 

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