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ब्रह्मरामायण का पाठ करने से शरीर की नश्वरता और ब्रह्म की सत्यता पक्की होती है |

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संस्कार सिंचन एवं तुलसी पूजन कार्यक्रमः पुरुषार्थ पब्लिक स्कूल, राजकोट

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Purusharth-Tulsi


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नारायण साईं जी की वाणी में ब्रह्मरामायण का पाठ

भारती श्रीजी के सान्निध्य में ब्रह्मरामायण का पाठ व व्याख्या

आत्मगुंजन


 

भगवद्गीता, राम गीता, अष्टावक्र गीता आदि कई गीताएँ हैं, इनमें सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है भगवद्गीता लेकिन तत्त्व ज्ञान में शक्तिशाली है अष्टावक्र गीता। यह छोटी सी है पर एकदम ऊँची बात कहती है। उसका अनुवाद किया भोला बाबा ने और उसे ‘वेदांत छंदावली’ ग्रंथ में छपवाया। उसमें से जितना अष्टावक्र जी का उपदेश है उतना हिस्सा लेकर अपने आश्रम ने छोटा सा ग्रंथ प्रकाशित किया और ‘श्री ब्रह्म रामायण’ नाम दिया। इसे पढ़ने से आदमी का मन तुरंत ऊँचे विचारों में रमण करने लगता है, खिलने लगता है। ऐसे दोहे, छंद, श्लोक, भजन याद होने चाहिए, ऐसे विचार स्मरण में आते रहने चाहिए। इधर-उधर जब चुप बैठें तो उन्हीं पवित्र व ऊँचे विचारों में मन चला जाये। ऐसा नहीं कि ‘मेरे दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा।’