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ब्रह्मरामायण का पाठ करने से शरीर की नश्वरता और ब्रह्म की सत्यता पक्की होती है |

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जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

Admin

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

साधक :जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?
    
    पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । तो जगत नहीँ हैं,ऐसे बोलने से तो कोई     गरम चिमटा लगा दे  ,उस समय तो दुःख होगा,लेकिन दुःख होता है तो जो,जिसको दुःख होता है वो भी वास्तव में नहीँ हैं, सदा नहीँ हैं । तो जो सदा हैं उसमें स्थिति करके समझाने के लिए बोला जाता है जगत नहीँ हैं ।
    
   तो वह  एक होती है व्यावहारिक सत्ता ,दुशरी होती  है प्रातिभासिक सत्ता और तीसरी होती है वास्तविक सत्ता । जैसे आप-हम अभी बैठे हैं ये व्यावहारिक सत्ता है  । अब जगत नहीँ हैं तो बापूजी क्यों बोलते हो ! सत्संग में क्या सार है ,नहीँ कैसे हैं ? तो वास्तविक सत्ता में जगत है । दुशरा प्रातिभासिक ; जैसे सपने में दिखा तो उस समय सच्चा लगा लेकिन आँख खुली तो, और तीसरा है वास्तविक सत्ता । इस समय भी वास्तविक सत्ता चैतन्य आत्मा की है । सपने में भी वास्तविक सत्ता चैतन्य आत्मा की है और ये दोनों नहीँ हैं ,फिर भी जो वास्तविक सत्ता है,उसमे टिक्के बोलो तो जगत है नहीँ  । न सपना है,न जागृत है ,न गहरी नींद है ; तीनों आ आ के चले जाते हैं ,फिर भी जो रहता है वह  सचिदानंद है, जगत है ही नहीँ । तो अपनी अपनी नजरियां से वह  नही हैं और अपनी अपनी नजरिया  से वह  है । ठीक है !!
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आत्मसाक्षात्कार सहायक

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परिप्रश्नेन

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पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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नारायण साईं जी की वाणी में ब्रह्मरामायण का पाठ

भारती श्रीजी के सान्निध्य में ब्रह्मरामायण का पाठ व व्याख्या

आत्मगुंजन


 

भगवद्गीता, राम गीता, अष्टावक्र गीता आदि कई गीताएँ हैं, इनमें सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है भगवद्गीता लेकिन तत्त्व ज्ञान में शक्तिशाली है अष्टावक्र गीता। यह छोटी सी है पर एकदम ऊँची बात कहती है। उसका अनुवाद किया भोला बाबा ने और उसे ‘वेदांत छंदावली’ ग्रंथ में छपवाया। उसमें से जितना अष्टावक्र जी का उपदेश है उतना हिस्सा लेकर अपने आश्रम ने छोटा सा ग्रंथ प्रकाशित किया और ‘श्री ब्रह्म रामायण’ नाम दिया। इसे पढ़ने से आदमी का मन तुरंत ऊँचे विचारों में रमण करने लगता है, खिलने लगता है। ऐसे दोहे, छंद, श्लोक, भजन याद होने चाहिए, ऐसे विचार स्मरण में आते रहने चाहिए। इधर-उधर जब चुप बैठें तो उन्हीं पवित्र व ऊँचे विचारों में मन चला जाये। ऐसा नहीं कि ‘मेरे दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा।’