पूज्य बापूजी के दिशा निर्देशन में मौन मंदिर

परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू के दिशा-निर्देशन में उनके कई आश्रमों में साधना के लिए पिरामिड बनाये गये हैं। मंत्रजप, प्राणायाम एवं ध्यान के द्वारा साधक के शरीर में एक प्रकार की विशेष सात्त्विक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा उसके शरीर के विभिन्न भागों से वायुमण्डल में चली जाती है परंतु पिरामिड ऊर्जा का संचय करता है। अपने भीतर की ऊर्जा को बाहर नहीं जाने देता तथा ब्रह्माण्ड की सात्त्विक ऊर्जा को आकर्षित करता है। फलतः साधक पूरे समय सात्त्विक ऊर्जा के बीच रहता है।

आश्रम में बने पिरामिडों में साधक एक सप्ताह के लिए अंदर ही रहता है। उसका खाना पीना अंदर ही पहुँचाने की व्यवस्था है। इस एक सप्ताह में पिरामिड के अंदर बैठे साधक को अनेक दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। यदि उस साधक की पिरामिड में बैठने से पहले तथा पिरामिड से बाहर निकलने के बाद की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो पिरामिड के प्रभाव को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

पूज्य बापूजी से किसी ने प्रश्न किया - 

 "गुरु महाराज ! एकांत से शक्ति, सामर्थ्य एवं मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। एकांत में हम कैसे रहें ? एकांत में रहने को जाते हैं लेकिन भाग आते हैं।"

पूज्य बापूजी ने उत्तर दिया -  "भजन में आसक्ति होने पर, गुरु के वचनों में दृढ़ता होने पर, अपना दृढ़ संकल्प और दृढ़ सूझबूझ होने पर एकांत में आप रह सकोगे। मौन-मंदिर में बाहर से ताला लग जाता है तो शुरु-शुरु में लगता है कि कहाँ फँस गये ! आरम्भ में आप भले न रह सको लेकिन एक-एक दिन करके मौन मंदिर में सात दिन कैसे बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता। 

वक्त मिले तो पन्द्रह दिन क्या, पन्द्रह महीने पड़े रहें इतना सुख प्रकट होता है एकांत में ! एकांत का जो आनंद है, एकांत में जो भजन का माधुर्य है, एकांत में जो आपकी सोयी हुई शक्तियाँ और ब्रह्मसुख, ब्रह्मानंद प्रकट होता है.... मैंने चालीस दिन मौन, एकांत का फायदा उठाया और जो खजाने खुले, वे बाँटते-बाँटते 48 साल हो गये, रत्तीभर खूटता नहीं-ऐसा मिला मेरे को। एकांतवास की बड़ी भारी महिमा है ! भजन में रस आने लगे, विकारों से उपरामता होने लगे, देखना, सुनना, खाना, सोना जब कम होने लगे तब एकांत फलेगा। नहीं तो एकांत में नींद बढ़ जायेगी, तमोगुण बढ़ जायेगा।"

 

maun mandir schedule



 

 


मौन मंदिर के साधकों के लिए साधना निर्देश

उठने से पूर्व अपने शरीर को खूब अच्छी तरह से खींचें। कुछ समय तक शैय्या पर ही
प्रभु स्मरण करें। स्नान के पश्चात् रात को पहने हुए कपड़े नहीं पहनें। दोपहर में भोजन के
पश्चात दस मिनट से अधिक सोना अपने बल, बुद्धि और आयुष्य बरबाद करने के बराबर है।
केवल दस-पन्द्रह मिनट बाईं करवट लेट सकते हैं। साधना में शीघ्रता से उन्नति करने हेतु
प्रतिदिन प्रातः पानी प्रयोग, तुलसी पत्तों का सेवन, आसन, प्राणायाम व सूर्यनमस्कार करने की
आदत डालें। दूध व तुलसी सेवन के बीच 2 घंटे का अन्तर हो। यदि ध्यान-भजन में मन नहीं
लगता हो, उबान आती हो या कुसंस्कार जोर पकड़ते हों तो पंजों के बल कूदें तथा हरि ॐ का
गुंजन करें।

प्राणायाम करें, सोऽहं का जप करें अथवा श्वासोश्वास की पचास तक की गिनती
गुरुमंत्रसहित करें, भूलने पर गिनती पुनः शुरु करें। आचमन कर लें। थोड़ी देर खुली हवा में
घूमने जायें। सत्साहित्य का पठन-चिंतन करें। मौन साधना में केवल संध्या-भजन के समय ;हरि
ॐ; अथवा ;ॐका गुंजन कर सकते हैं। साधना के दौरान श्री गुरुगीता, गुरुभक्तियोग, श्री
आसारामायण, मन को सीख, श्री योगवाशिष्ठ महारामायण आदि ग्रंथों का स्वाध्याय मौन रहकर
ही करें।

एकादशी, पूर्णिमा, गुरुवार इत्यादि में किसी साधक भाई को केवल दुग्धाहार करना हो तो
उसकी व्यवस्था रसोई घर में है। इस विषय में रसोई घर के किसी भाई को लिखकर दे दें।
ध्यान में आगे बढ़ने हेतु एकाग्रता के नियमों का पालन करें। एकाग्रता बढ़ाने का सहज व सरल
साधन त्राटक है। त्राटक गुरुदेव की फोटो पर, रात्रि में चन्द्रमा पर या दीपक की ज्योति पर कर
सकते हैं। त्राटक की सम्पूर्ण जानकारी के लिए &;परम तप; तथा ;अलख की ओर नामक पुस्तक
अवश्य पढ़ें। रात्रि में सोने से पूर्व पाँच-दस मिनट शास्त्र का पठन-चिंतन करके ही शयन करें।
ध्यान-भजन में अरुचि दूर करने के लिए अल्पाहार भी बहुत मददगार है। अनेक पुष्पपुंजों के
फलस्वरूप आपको इस पवित्र भूमि पर साधना करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। अतः समय
व्यर्थ न गँवायें, ध्यान-भजन में तत्परता से लगे रहें।

सूचना

साधना-अवधि में अति आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति हेतु ही स्टॉल पर जायें। व्यर्थ समय

का बिगाड़ नहीं करें। हर समय अपने पास पॉकेट डायरी व पेन रखें। ताकि आप अपनी बात

लिखकर समझा सकें। आपके पास अधिक रुपये हों तो उसे साधक निवास कार्यालय में जमा

करवा दें। अन्यथा आश्रम की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। जहाँ तक सँभव हो सफेद वस्त्र ही

धारण करें। त्रिकाल संध्या मौन-मंदिर, सत्संग-मंडप या मोक्षकुटीर में कर सकते हैं। शाम की

संध्या में प्रतिदिन सत्संग सुनना अनिवार्य है। लघुशंका करने हेतु बाथरूम में ही जायें, शौचालय

में नहीं जायें अन्यथा आपको स्नान करना होगा व पहने हुए कपड़े धोने होंगे। ऐसा कोई कार्य

कर करें जिससे किसी के ध्यान-भजन में विक्षेप हो। कोई परेशानी हो तो साधक निवास

कार्यालय में बतायें। साधना के दौरान हुए आध्यात्मिक अनुभव को मौन-मंदिर में रखी हुई

(साधकों के अनुभव) नामक नोटबुक में लिखें तथा साधक निवास कार्यालय में लिखकर दें।

साधना-अवधि पूरी होने पर बड़दादाजी की परिक्रमा व शुभसंकल्प करके अपना मौनव्रत खोलें।

शौच-स्नान आदि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके ही मौन-मंदिर में प्रवेश करें। बाहर

जाते समय पंखा, बल्ब बंद कर दें। रात्रि को सोते समय भी बल्ब बंद कर दें।

मौन-मंदिर में आये हुए साधक भाई से प्रार्थना है कि साधना-अवधि पूरी होने पर अपने

कमरे की चाबी रविवार सुबह दस बजे तक साधक निवास कार्यालय; में जमा करा दें। उपरोक्त

नियमों का पालन न करने वाले साधक को मौन-मंदिर साधना से वंचित कर दिया जायेगा।