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Satsang Prachaar

कुप्रचार बन गया सुप्रचार, महक रहा है संत-दरबार

 

अनादिकाल से यह चला आ रहा है कि जब-जब महापुरुष जगत के जीवों का उद्धार करने धरा पर अवतरित होते हैं, तब-तब गुमराह करने वालों और विधर्मियों ने झूठे आरोप लगाकर उन्हें बदनाम करने तथा उनके दैवी कार्यों में विघ्नरूप बनने की कोशिश की हैं। इससे वे प्रकृति के कोप के शिकार बनते रहे हैं।


निंदकों के लाख कुप्रयासों के बावजूद ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की जयजयकार होती ही रही है और आज भी हो रही है। चाहे संत ज्ञानेश्वरजी हो, आद्य शंकराचार्यजी, नरसिंह मेहता, संत तुकारामजी या फिर अन्य कोई संत महापुरुष हों, ऐसे नामी-अनामी महापुरुषों द्वारा लोगों का कितना कल्याण हुआ है इसका अनुमान लगाना मानवी मति से परे है।


इन महापुरुषों के बताये मार्ग पर चलने वाले कितने हैं, इसका भी अनुमान लगाना मुश्किल है। गुरुनानक जी को दो-दो बार जेल में भी भिजवाया निंदक अभागों ने, फिर भी नानक जी करोड़ों-करोड़ों लोगों के दिल में अपने संतत्व की सुगंध से महक रहे हैं। ऐसे ही स्वामी रामसुखदासजी व अन्य कई संतों को सताया गया किंतु वे अब भी लोगों के दिलों में मौजूद है।


गुरुवाणी में आयाः
संत का निंदक महाहतिआरा।
संत का निंदकु परमेसुरि मारा।।
संत को दोखी की पुजै न आस।
संत का दोखी उठि चलै निरासा।।

संत कबीर जी ने कहाः

कबीर निंदक न मिलो, पापी मिलो हजार।
एक निंदक के माथे पर, लाख पापिन को भार।।


संत तुलसीदास जी ने कहाः


हरि हर निंदा सुनइ जो काना।
होइ पाप गोघात समाना।।
हर गुर निंदक दादुर होई।
जन्म सहस्र पाव तन सोई।।

 

महापुरुषों की इस श्रृंखला की वर्तमान कड़ी हैं ब्रह्मज्ञानी पूज्य संत श्री आशारामजी बापू, जो, प्राणिमात्र का मंगल करने में सतत लगे हुए हैं। ऐसे संत महापुरुष को भी विधर्मियों, विदेशी लोगों और मिशनरियों ने बदनाम करने के लिए क्या-क्या नहीं किया, कितने करोड़ रूपये खर्च किये, परंतु इस कुचाल में वे लेशमात्र भी सफल नहीं हो पाये। प्रसिद्ध कहावत हैः इनकार भी आमंत्रण देता है। ज्यों-ज्यों विधर्मियों ने झूठी, कपोलकल्पित बातें फैलायीं, त्यों-त्यों जो कभी सत्संग में नहीं आते थे, जो बापू जी को नहीं जानते थे वे लोग भी सच्चाई जानने की उत्सुकता से सत्संग में आने लगे  बापू जी को जानने-मानने लगे।


जब उन्होंने सच्चाई जानी तब उनके हृदय में पूज्य बापू जी के प्रति ऐसी अटल श्रद्धा, ऐसा अटल विश्वास जगा कि सत्संग-कार्यक्रमों में उमड़ती भीड़ ने सारे कीर्तिमान (रिकार्ड) तोड़ दिये। इतना कुप्रचार होने पर भी जो अचल हैं, जिनकी मधुर मुस्कान में किंचित भी कमी नहीं आयी अपितु जिनका ओज-तेज, आभा ऐसी अग्निपरीक्षा में भी तप्त कुंदन की तरह अधिकाधिक उज्जवल होती गयी, ऐसे बापू जी से शिक्षा-दीक्षा लेने की लोगों में प्रबल माँग उत्पन्न हुई। इससे बापू जी के साधकों की संख्या में बेहिसाब वृद्धि हुई है।


केवल जनता ही नहीं, अपितु विभिन्न राज्य सरकारें भी विश्ववंदनीय बापू जी के लोक-मांगल्यकारी ज्ञान व सेवा यज्ञों से अभिभूत हुई हैं। अब तक अनेक राज्य सरकारों ने बापू जी को राज्य-अतिथि का दर्जा देकर जनता में सुप्रतिष्ठा एवं सुयश पाने का सौभाग्य पाया है, जैसे –

  • 26 से 29 अप्रैल 2001 जम्मू-काश्मीर सरकार,
  • 1 से 4 जून 2006 एवं 16-17 जून 2007 हिमाचल प्रदेश सरकार,
  • 12 से 14 जुलाई 2010 ओड़िशा सरकार,
  • 14 से 16 जुलाई 2010 छत्तीसगढ़ सरकार,
  • 16 से 18 जुलाई 2010 मध्य प्रदेश सरकार,
  • 25 से 30 सितम्बर 2010 एवं
  • 6-7 जुलाई 2011 कर्नाटक सरकार।

पूज्य बापू जी की सत्संग गंगा तो ऐसी है कि यहाँ जो भी, जैसे भी आता है उसके दुःखड़े तो दूर होते ही हैं, आत्मनिष्ठ महापुरुष पूज्य बापू जी के श्रीमुख से निकलने वाली अमृतधारा से लोगों के जन्म-जन्मांतर के पाप-ताप भी मिटते हैं। उन्हें शाश्वत सुख-शांति की कुछ झलकें मिलती हैं। भक्तियोग, राजयोग, कर्मयोग, कुंडलिनी योग एवं ज्ञानयोग के उच्चतम रहस्यों को सरल भाषों में समझने का तथा उनके द्वारा व्यावहारिक एवं पारमार्थिक उन्नति करने का मार्ग प्रशस्त होता है। श्रद्धालुओं की भीड़ तो बढ़ी कि बापू जी को किसी-किसी दिन 3-3, 5-5 जगहों पर हेलिकॉप्टर के द्वारा जा-जा के देशवासियों की माँग पूरी करनी पड़ी। वर्ष 2008 से वर्ष 2011 तक बापू जी के सत्संग-कार्यक्रमों की संख्या में लगातार वृद्धि होती गई। आइये, नजर डालते हैं आँकड़ों परः


वैसे तो शुरु से ही पूज्य श्री के जनजागृति के कार्य में विधर्मियों व दुष्ट मति के लोगों द्वारा विघ्न उपस्थित किये जाते रहे हैं, परंतु एक सोची-समझी कुनीति के तहत सन् 2008 से कुप्रचार-अभियान ही प्रारम्भ हुआ था। उस वर्ष 16 राज्यों के विभिन्न स्थानों में बापू जी के कार्यक्रम हुए थे। इसके बाद देश को तोड़ने वाली विदेशी ताकतों द्वारा करोड़ों रूपये खर्च किये गये तथा कुप्रचार ने और जोर पकड़ा परंतु इसका असर उल्टा ही हुआ। सन् 2009 में सत्संग की माँग बढ़ गयी, जिससे देश के 13 राज्यों व नेपाल सहित कुल 152 स्थानों पर कार्यक्रम हुए।


सन् 2010 में श्रद्धालुओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए पूज्य श्री को 17 राज्यों में 193 स्थानों में कार्यक्रम देने पड़े। इस वर्ष तो बापू जी को अनेक बार एक दिन में 5-5 जगह कार्यक्रम देने पड़े।


सन् 2011 में अब तक 17 राज्यों में 181 स्थानों में कार्यक्रम सम्पन्न हुए हैं और वर्ष के अन्त तक 200 का आँकड़ा पार होने का अनुमान है।

अब तो ऐसी स्थिति है कि इतने सत्संग-कार्यक्रम देने के बावजूद भी कई स्थानों का नम्बर लगने में वर्षों लग रहे हैं। सत्संग-दर्शन के लिए लालायित जनता बड़े-से-बड़े सत्संग-स्थल को बौना साबित कर रही है।

बापू के दीवाने बहकाये नहीं जाते।
कदम रखते हैं आगे तो फिर
लौटाये नहीं जाते।।

 

कुछ निंदक चैनलों की टी.आर.पी. और गुजरात के एक भ्रष्ट अखबार का सर्क्युलेशन बुरी तरह घटा लेकिन सत्संगियों की संख्या और सत्संग-कार्यक्रम बढ़ते ही गये। वे अब भी सुधर जायें, उदार आत्मा संत और उनके भक्त प्रसन्न होंगे।


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