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Sant Arvind Jayanti

श्री अरविन्द की निश्चंतता

श्री अरविन्द घोष ने अपने जीवनकाल में व्रत लिये थे : भारत माँ को आजाद कराना, आजादी के लिये प्राणों की बलि तक दे देना तथा यदि ईश्वर है, सत्य है तो उसका दर्शन करना ।

उनकी यह मान्यता थी कि भगवान केवल अहिंसा के अथवा केवल qहसा के दायरे में नहीं हैं । भगवान सर्वत्र हैं तो qहसा-अहिंसा सब उसीमें है । अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिये यदि अहिंसा व्रत की आवश्यकता पडी तो उसका उपयोग करेंगे और qहसा की आवश्यकता पडी तो उसका भी उपयोग करेंगे लेकिन भारतमाता को आजाद कराके रहेंगे ऐसी उन्होंने शपथ ली थी । श्रीकृष्ण उनके इष्टदेव थे और गीता के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा थी । विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिये तो अरविन्द ने अहिंसा का मार्ग स्वीकार किया था लेकिन जो युवक थे, जिनमें प्राणबल था और गरम खून था, जो भारतमाता के लिये प्राण देने को तत्पर थे, ऐसे लोगों को साथ लेकर अंग्रेजों को भगाने के लिये qहसात्मक प्रवृत्तियाँ आरंभ की ।उनका कार्य था बम बनाना, उपद्रव करना तथा ऐसी मुसीबतें पैदा करना कि भारतवासियों को भून डालनेवाले शोषक, हत्यारे, जुल्मी, अंग्रेजों की नाक में दम आ जाये । केवल ‘सर-सर' कहकर गिडगिडाने से ये मानेंगे नहीं, ऐसा समझकर युवाओं को अरविन्द ने यह मार्ग बतलाया था । उनके भाई ने जब प्रार्थना की कि मुझे भी भारतमाता की आजादी की लडाई में कुछ काम सौंपा जावे तब अरविन्द घोष ने उन्हें एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में भगवद्गीता देकर शपथ दिलाई कि‘जान भी जाये तो दे देंगे लेकिन रहस्य किसीको नहीं बतायेंगे । भारतमाता को आजाद कराकर रहेंगे ।'

युवकों ने अपना कार्य आरंभ किया । कुछ बम बनाते, कुछ विद्रोह फैलाते, कुछ अंग्रेज की सम्पत्ति नष्ट करते । इससे अंग्रेजों की नाक में दम आ गया ।
देहाध्यासी आदमी अहिंसा से नहीं मानता, वह भय से काबू में रहता है । सज्जन पुरुष के आगे आप नम्र हो जाओ तो आपकी नम्रता पर वे प्रसन्न हो जायेंगे लेकिन दुर्जन के आगे आप नम्र बनोगे तो आपकी नम्रता का वह दुरुपयोग करेगा ? जो शोषक है उसके आगे आप विनम्र हो जाओगे तो वह आपका शोषण करेगा, आपको बुद्धू मानेगा लेकिन जो उदार आत्मा हैं, सज्जन हैं, संत हैं उनके आगे आपकी विनम्रता की कद्र होगी ।

श्री अरविन्द घोष की हिंसात्मक  प्रवृत्तियों के अपराध में अनेक युवा पकडे गये, अनेकों को फाँसी लगी, सैकडों को आजीवन कारावास की तथा कइयों को काले पानी की सजा दी गयी । उन सबका मूल अरविन्द घोष को माना और उन्हें पकडकर जेल में बंद कर दिया । ब्रिटिश शासन यह चाहता था कि कैसे भी करके उन्हें अपराधी साबित करके शीघ्र ही फाँसी लगवा दी जाय । उस समय देश में चारों ओर भारत की स्वाधीनता का संग्राम जोर-शोर से चल रहा था । हर शख्स में गुलामी की बेिडयाँ काटने का अतुलित जोश भरा था । वतन पर मर मिटनेवाले कदम आगे बढाते ही जा रहे थे । एक बम काण्ड में ब्रिटिश अधिकारियों ने श्री अरविन्द को मुख्य आरोपी मानकर गिरफ्तार कर कैद में डाल दिया । उक्त अपराध की सुनवाई के लिये कुछ गोरे अधिकारी व सिपाही हथकिडयाँ सहित श्री अरविन्द को न्यायालय में लाये । अपने लाडले  नेता को देखने के लिये न्यायालय के प्रांगण में दर्शकों, क्रांतिकारियों व समर्थकों की इतनी भीड जमा थी कि पैर रखने को जगह न थी ।

कैद में श्री अरविन्द को अपना समय भगवद् ध्यान में गुजारने का मौका मिलता था । एकांतवासो लघुभोजनादौ
मौनं निराशा करणावरोधः ।
मुनेरसो संयमनं षडेते
चित्तप्रसादं जनयन्ति शीघ्रम् ।।

एकांतवास, अल्पाहार, मौन, आशारहित जीवन तथा इन्द्रियों के संयम से चित्त के प्रसाद की प्राप्ति होती है । अंतःकरण विशुद्ध होता है तथा आत्मतत्त्व प्रकट होनेकी संभावना बढती है ।

ब्रिटिश शासन येन-केन-प्रकारेण श्री अरविन्द को आरोपी सिद्ध कर फाँसी लगवाने के लिये कृतनिश्चयी था । पेशी के दिन जब उन्हें न्यायालय लाया गया तब वे श्रीकृष्ण के qचतन में तन्मय थे । वे जब न्यायालय में पहुँचे तब उन्होंने देखा कि न्यायालय के चँवर में तथा चँवर डुलाने के लिये नियुक्त कैदी में, दोनों में श्रीकृष्ण मुस्कुरा रहे हैं । न्यायालय के न्यायाधीश में भी श्रीकृष्ण बैठे हैं । फिर नजरें घुमाकर देखा कि सरकारी वकील में भी वही कन्हैया बैठा है तथा अपने वकील में एवं देखनेवाले सभी दर्शकों में भी वही बैठा है । अरविन्द को आभास हुआ कि वे श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए कह रहे हैं कि ‘जब सबमें मैं हूँ और तू मेरा है तो फिर चिंता तेरी कैसी ? फाँसी तेरी कैसी ?'

जो भगवान की शरण जाता है और फिर भी बच्ची के विवाह की चिंता करता है तो वह सचमुच में भगवान की शरण नहीं है । जो भगवान की शरण जाता है और बुढापे की चिंता करता है वह भी भगवान की शरण नहीं है । तुम भगवान के हो गये तो बुढापा तुम्हारा कैसे मिटे ? पुण्य और पाप तुम्हारा कैसे ? यश और अपयश तुम्हारा कैसे ? तुम भगवान के शरण गये तो फिर सुख और दुःख तुम्हारा कैसे ? तुम्हारा तो केवल भगवान ही भगवान है । इस बात को तुम ठीक समझ लो तो हर हालत में मुस्कुराकर जी सकते हो । अनेक रूपों में बसे हुए श्रीकृष्ण की शरण लेने से श्री अरविन्द निर्भय हो गये । ब्रिटिश शासन ने उन पर आरोप सिद्ध कर फाँसी की सजा देने के अनेक प्रयत्न किये लेकिन उन्हें दोषी न ठहरा सका । श्री अरविन्द बाइज्जत निर्दोष रिहा किये गये । केवल श्री अरविन्द घोष के जीवन में ऐसा घटित हुआ है, इसलिये आपको यह बात मान लेनी चाहिये, ऐसा नहीं है । आप भी अपने जीवन में इसका प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं । जब भी आप भयभीत होवें या संसार का आकर्षण सतावे तो इसे माया मात्र समझकर अंतर्यामी राम की शरण चले जाना, तब तुम उस रसस्वरूप अंतर्यामी के रस में सराबोर हो जाओगे । फिर बाहर के रस या बाहर की परिस्थिति का कोई प्रभाव तुम्हारे चित्त पर नहीं पडेगा । ‘हरि ॐ तत्सत्... और सब गपशप...' यह बात दिल में जम जायेगी । भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ।।

‘हे अर्जुन ! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ ।' (गीता : १०.२०)

 

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