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Swami Akhandanad Saraswati Satsang

अदभुत है गीता का ईश्वर
- स्वामी श्री अखंडानंदजी सरस्वती
हम पूजा किसकी करें, किसके द्वारा करें, कौन-सी करें व पूजा करने से क्या प्राप्त होता है ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही श्लोक में देख लो -

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धि  विन्दति मानवः ।।

‘जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है ।'             
(गीता : १८.४६)
अद्भुत है गीता का ईश्वर ! यह वेदांतियों का निर्गुण ब्रह्म नहीं है । आर्य समाज, ब्रह्म समाज का निराकार नहीं है । जो कुरान-बाइबिल में जीवन से बहुत दूर रहता है, वह नहीं है । जिसने एक बार सृष्टि बनाकर फेंक दी, वह भी नहीं है । यह ईश्वर तो वह है जो सृष्टि का कण-कण बनाकर सृष्टि में ही रहता है । अतः उसी ईश्वर की पूजा करनी चाहिए जो विश्व से अलग-थलग नहीं है ।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
भगवान सबके हृदय में अंतर्यामीरूप से प्रवर्तक है, प्रेरक है और जैसे कपडे में सूत होता है वैसे ही सम्पूर्ण विश्व में उपादान कारण (कच्चा माल; घडे का उपादान कारण मिट्टी है) और समवाय कारण (वह कारण या हेतु जो पृथक् न हो सके) के रूप में विद्यमान है और सर्वात्मक है । वह सर्वप्रेरक है अर्थात् चेतन है, अंतर्यामी है और सर्वात्मक है यानी सदात्मक है । जिस चीज को हम है-है-है (पहले थी, अभी है और बाद में भी रहेगी) बोल सकते हैं, वही भगवान है ।

तात्पर्य यह है कि ईश्वर केवल व्यापक ही नहीं व्याप्य भी है, केवल जगत का कारण ही नहीं कार्य भी है । वही मनुष्य है, वही पशु है, वही पक्षी है, वही जल है, वही अग्नि है, वही वायु है, वही आकाश है । येन सर्वमिदं ततम् का अर्थ है कि ईश्वर हमारे जीवन से दूर नहीं, हमारे जीवन में अनुस्यूत है । हमारे चलने में है, हमारे करने में है, हमारे बैठने में है, हमारे सोने में है । यदि कहो कि ईश्वर कहाँ है ? तो कहाँ नहीं है ! ईश्वर कब है ? तो कब नहीं है ! ईश्वर क्या है ? तो क्या नहीं है ! ईश्वर अभी है, यहीं है और यही है ।

देश-काल का व्यवधान ईश्वर और हमारे बीच में कभी होता ही नहीं । हमारे और ईश्वर के बीच में मन का, भावना का, भ्रम का पर्दा है । हमारे और ईश्वर के बीच में कोई दूसरी चीज नहीं है । ईश्वर का स्वरूप चेतन है, प्रेरक भी है । धियो यो नः प्रचोदयात् । (ऋग्वेद : ३.६२.१०) वही प्रेरक है, वही प्रकाशक है । यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम् - सम्पूर्ण प्राणियों की प्रवृत्ति उसीसे हो रही है । बिच्छू में विष वहीं से आता है, सबकी अपनी-अपनी प्रवृत्ति वहीं से होती है । जिससे प्रवृत्ति होती है वह कौन है ? येन सर्वमिदं ततम् - वह तो सब है - कपडा है, सूत है, घडा है, मिट्टी है, औजार है, लोहा है, आभूषण है, सोना है ।
ऐसा परमेश्वर जिसमें काल का, देश का, वस्तु का व्यवधान नहीं है, जो सर्वत्र, सर्वदेश में, सर्वरूप में है, वही आपका उपास्य है । ‘गीता' में जिस उपास्य भगवान का वर्णन है वह यही है । अब उसकी पूजा कैसे करें ? कौन-सा चंदन लगावें ? कौन-सा अक्षत चढावें ? कौन-सा फूल अर्पित करें ? क्या भेंट दें ?

भगवान कहते हैं, ऐसे ईश्वर की पूजा करने के लिए पुष्प, अक्षत, चंदन, नैवेद्य की जरूरत नहीं है । वही फूल के रूप में खिला है, वही गंध के रूप में फैल रहा है, वही अपना सौंदर्य बिखेर रहा है । वही चंदन की लकडी बना, वही घिस गया, वही सुगंध है । वही जल में रस है - रसोऽहमप्सु कौन्तेय । वही प्रकाश है - प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । मनुष्य में कर्म करने का जो पौरुष है, वह वही है - पौरुषं नृषु । उसकी पूजा के लिए किसी पदार्थ की, द्रव्य की, दक्षिणा की आवश्यकता नहीं । उसकी अभ्यर्चा (पूजा) तो अपने कर्म से करो - स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य ।

अब प्रश्न यह है कि वह कौन-सा कर्म है, जिससे भगवान की पूजा होती है ? क्या स्तुति-पाठ है, घंटी बजावें ? नहीं बाबा ! जो काम तुम कर रहे हो उसीमें पूजा करो । भागवत धर्म का यही स्वरूप है कि हम जो काम कर रहे हैं उसीसे भगवान की पूजा करें । यह कैसे होगा ? यदि कोई आदमी सडक पर झाडू लगा रहा है तो झाडू लगाने से भगवान की पूजा कैसे होगी ? कोई आदमी खेतों में फावडा चला रहा है तो फावडा चलाने से भगवान की पूजा कैसे होगी ? कोई दुकानदार दुकान में बैठकर चावल-गेहूँ-कपडा बेच रहा है तो उसके द्वारा भगवान की पूजा कैसे होगी ? एक सैनिक हाथ में बंदूक लेकर पहरा दे रहा है तो उसके द्वारा भगवान की पूजा कैसे होगी ? एक विद्वान शास्त्रज्ञान के द्वारा, विज्ञान के द्वारा, चिंतन  के द्वारा जगत में जो हित निहित है उसका चिंतन कर रहा है तो उसके द्वारा भगवान की पूजा कैसे होगी ? कोई ब्रह्मचर्य का, कोई गृहस्थ-धर्म का, कोई वानप्रस्थ का और कोई संन्यास-धर्म का पालन कर रहा है तो भगवान की पूजा कैसे होगी ?

इसका उत्तर है कि आप जो भी कर्म कीजिये - वस्त्र बनाइये, कोयला निकालिये, किसी भी कर्तव्य-कर्म का, किसी भी धर्म का पालन कीजिये, अपने सुख-स्वार्थ के लिए मत कीजिये । उसमें से व्यक्तिगत सुख-स्वार्थ की भावना छोड दीजिये । ऐसा समझिये कि आपके प्रत्येक कर्म अथवा धर्म से सर्वरूप में परमेश्वर की सेवा हो रही है । यदि आपने थोडी-सी धरती साफ कर दी तो अनुभव कीजिये कि आपने ईश्वर का पाँव पखारा, ईश्वर का पाँव धोया क्योंकि यह भूमि भगवान का चरणारविंद  है । भगवान के चरणारविंद के प्रक्षालन की सेवा हो गयी । आप अपने कर्तव्य का पालन सर्वरूप भगवान को सुख पहुँचाने के लिए, उनके अर्थ की सिद्धि के लिए कीजिये ।

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