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कर्मयोगी लोकमान्य तिलक पुण्यतिथि

‘‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है''- स्वातंत्र्य के इस महान घोषवाक्य का नाद करनेवाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म एक प्राथमिक शिक्षक श्री गंगाधर राव के घर २३ जुलाई १८५६ को रत्नागिरी (महा.) में हुआ था । उनका जन्म-नाम केशव था और बचपन में उन्हें बलवंत या बाल के नाम से भी पुकारते थे । बाल को पिता से विद्या व प्रतिभा तथा माता से धार्मिक संस्कार मिले । उनकी ‘श्रीमदभगवद्गीता' पर अत्यंत निष्ठा थी । आगे के जीवन में जब उन्हें मांडले जेल में रहना पडा, तब उन्होंने गीता पर ‘गीता-रहस्य' नामक जो टीका लिखी, वह निष्काम कर्मयोग की प्रेरणा देनेवाली एक अनुपम कृति के रूप में विश्वप्रसिद्ध है ।

तिलकजी के कुछ प्रेरक जीवन-प्रसंग :

दैव का उपकार मुझे नहीं चाहिए :
एक बार लोकमान्य तिलक महाराष्ट्र के तलेगाँव में आयोजित एक समारोह में भाग लेने गये थे । भाषण समाप्त होने के बाद विविध विषयों पर परस्पर चर्चा होने लगी । बात-बात में काफी समय बीत गया । अचानक तिलकजी की नजर घडी पर गयी । रेलगाडी छूटने का समय होने को था । तभी एक विद्वान ने कहा :
‘‘महोदय ! आप निश्चिंत रहें । इस गाडी का समय जैसा कुछ है ही नहीं ।''

दूसरे विद्वान ने समर्थन दिया : ‘‘हाँ तिलकजी ! गाडी हमेशा ही देर से आती है । मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि आज भी यह देर से ही आयेगी । कृपया आप अपनी चर्चा चालू रखें ।''

उनकी बात सुनकर तिलकजी गंभीर हो गये । बोले : ‘‘मैं तो पुरुषार्थ में विश्वास करता हूँ । रोज गाडी देर से आती है, आज भी आयेगी - ऐसी निरर्थक बातों में मैं नहीं मानता । दैव पर विश्वास रखके हाथ जोडकर मैं कभी बैठा नहीं रह सकता ।''
तिलकजी ने अपना थैला कंधे पर टाँगा और बोले : ‘‘गाडी देर से आये या उचित समय पर, मैं तो प्रयत्नपूर्वक सही समय पर जाकर स्टेशन पर बैठूँगा । दैव का उपकार मुझे नहीं चाहिए ।''

सभीको उस दिन एक नयी सीख मिल गयी कि जो भाग अपने कर्तव्य या पुरुषार्थ का है, उसमें हमें लापरवाही नहीं करनी चाहिए । उसमें निष्क्रियता दिखाना भाग्य के भरोसे रहना है । कर्तव्य-पालन में तत्पर रहनेवाले ही ऊँचे काम कर सकते हैं ।
*

कर्तव्य-यज्ञ की बलिवेदी पर...:
भारत में प्लेग फैला था । जनता इस भयंकर महामारी से त्रस्त थी। इसकी चपेट में आकर तिलकजी के दो युवा पुत्र असमय ही काल का ग्रास हो चुके थे, पर धैर्यशाली तिलकजी ने अपने जन-जागृति के कार्य में तनिक भी व्यवधान न आने दिया ।

तिलकजी ‘केसरी' नामक समाचार पत्र निकालते थे। उसके माध्यम से वे जनता में स्वाधीनता के प्रति नया उत्साह पैदा करते थे । प्लेग की महामारी के कारण कम्पोजीटरों की संख्या एकदम नहींवत् हो गयी। कम्पोजीटरों के बिना केसरी का निकलना असंभव-सा था । प्रेस मालिक तिलकजी के पास आया और बोला : ‘‘तिलकजी ! कम्पोजीटर ही नहीं हैं फिर केसरी किस प्रकार समय पर निकाला जा सकेगा ?''

प्रेस मालिक की यह बात सुनकर तिलकजी एकदम उछल पडे, मानो अनजाने में अंगारों पर पैर पड गया हो । वे अपने युवा पुत्रों की मृत्यु का समाचार सुनकर भी स्वस्थ रह सकते थे,पर ‘केसरी' के लिए ऐसा सुनना उनके लिए असहनीय था । तिलकजी ने गर्जना करते हुए कहा : ‘‘केसरी किसी भी परिस्थिति में सही समय पर ही निकलना चाहिए, फिर तुम चाहे जो करो ।''

प्रेस मालिक थके स्वर में बोला : ‘‘तिलकजी ! मैं इसमें कुछ कर सकूँ ऐसी मेरी स्थिति नहीं है । कम्पोजीटरों के बिना यह काम आगे कैसे चल सकेगा ?''
तिलकजी उठ खडे हुए व बोले : ‘‘देखो, तुम ‘आर्यभूषण प्रेस के मालिक' और मैं ‘केसरी का संपादक' - हम दोनों मर जायें तो भी ‘केसरी' का मंगलवार का अंक तो मंगलवार को ही निकलना चाहिए।''

इतना कहकर तिलकजी निकल पडे। शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद वे शहर की दूसरी प्रेसों में घूमते रहे और अंत में येन-केन प्रकारेण समझा-बुझाकर कम्पोजीटरों को ले आये । मंगलवार की प्रभात को ‘केसरी' लोगों के हाथ में था। कैसी कर्तव्यपरायणता ! जनता-जनार्दन के प्रति कैसा दिव्य सेवाभाव ! तभी तो देश उन्हें ‘लोकमान्य तिलक' के  नाम से आज भी याद करता है ।

- Rishi Prasad
वर्ष : १७
अंक : १६३
जुलाई २००६


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