Sant Shri
  Asharamji Ashram

     Official Website
 
 

Register

 

Login

Follow Us At      
40+ Years, Over 425 Ashrams, more than 1400 Samitis and 17000+ Balsanskars, 50+ Gurukuls. Millions of Sadhaks and Followers.
Desh Bhakti Yatra
Minimize

 

 

Independence Articles
१५ अगस्त, सच्ची आजादी

दो राजकुमार थे । बडा भाई राज्य के मोह में पड गया लेकिन छोटा भाई सच्ची आजादी पाने के लिए सच्चे सद्गुरु की खोज में निकल गया और उसने खोजते-खोजते ऐसे सत्...
Read More..


सच्ची आजादी

स्वतंत्रता की बलिवेदी पर चढनेवाले भारत के वीरों के हाथों में होती थी श्रीमद्भगवद्गीता एवं मुख में होता था यही श्लोक : नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि... ऐसे...
Read More..


१५ अगस्त, सच्ची आजादी
१५ अगस्त, सच्ची आजादी

१५ अगस्त, सच्ची आजादी
-परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू

दो राजकुमार थे । बडा भाई राज्य  के मोह में पड गया लेकिन छोटा भाई सच्ची आजादी पाने के लिए सच्चे सदगुरु की खोज में निकल गया और उसने खोजते-खोजते ऐसे सत्यस्वरूप का साक्षात्कार किये हुये सच्चे सदगुरु को पा भी लिया । नानक और कबीर ऐसे महापुरुष को पाकर, उनके बताये मार्ग अनुसार साधना करके उसने अपने शुद्ध बुद्ध स्वरूप को जान लिया । फिर वह घूमते-घामते  अपने भाई के नगर में पहुँचा और नगर के बाहर नदी के किनारे अपनी झोंपडी बाँधकर रहने लगा । उसका जगमगाता आनंद, हारे-थके को सांत्वना देने का स्वभाव, भगवद्-प्रेम में पावन करनेवाली उसकी शैली, दिल में मनुष्यमात्र के उद्धार का पवित्र भाव, परिस्थितियों में सम रहने की उसकी समर्थ मति, उस बहादुर को, संत बने भाई को अब छुपा कैसे रहने देती ? सच्चा बहादुर वह नहीं जो किसी को पछाड देता । सच्चा बहादुर तो वही है जिसने भीतर के विकारों पर विजय पाकर अपने निर्विकारी नारायणस्वरूप का साक्षात्कार किया है । उस ब्रह्म-परमात्मा को अपना स्वरूप जाननेवाला सचमुच में बहादुर है, महावीर है । जैसे नानकजी महावीर हैं, महान् वीर हैं । बडे-बडे वीर भी जिनके चरणों में शीष झुकाकर अपना भाग्य बना लें, ब्रह्मज्ञानी ऐसे महान् वीर होते हैं । वह महावीर भी प्रजा का प्रेमपात्र बन गया ।
आत्मा में रमण करनेवाले संत किसी मत, पंथ, मजहब का पोषण या विरोध नहीं करते वरन् वे तो मानव के अंदर छुपे हुये रब को, आनंद को और माधुर्य को जगाने की कला जानते हैं ।
मुझे वेद, पुराण, कुरान से क्या ? मुझे प्रेम का पाठ पढा दे कोई ।।
मंदिर-मस्जिद जाना नहीं ।
मुझे दिल के मंदिर में पहुँचा दे कोई ।। जहाँ ऊँच और नीच का भेद नहीं । जहाँ जात और पाँत की बात नहीं ।।
 न हो मंदिर, मस्जिद, चर्च जहां ।
बस प्रेम ही प्रेम की सृष्टि मिले । अब नाव को ले चलो खेके वहाँ ।।

ऐसे कुछ पवित्र जिज्ञासु उस फकीर के पास पहुँच जाते थे, जो भूतपूर्व युवराज था । धीरे-धीरे राज-दरबार तक उस फकीर की प्रशंसा पहुँची । जासूसों ने जाँच करके राजा को खबद दी : ‘‘ये महाराज कोई और नहीं किंतु आपके ही सगे भाई हैं ।'' राजा के अहंकार को ठेस लगी :
मेरा भाई ! और झोंपडे में रहे ? भिक्षा माँगकर खाये ?''

एक दिन राजा सुबह-सुबह छिपे वेश में आकर अपने भाई को समझाने लगा : ‘‘मैं इतनी आजाद जिंदगी जी रहा हूँ और तू है कि रोटी का टुकडा माँगने निकलता है ? मैं महलों में रहता हूँ और तू झोंपडे में गुजारा कर रहा है ? तू क्यों बर्बादी की आग में जल रहा ? चल मेरे साथ । मैं तुझे मंत्रीपद दे दूँगा । मेरी आज्ञा में रहेगा तो मैं तुझे खुश रखूँगा । देख ! मैं कितना आजाद हूँ । सब लोग मेरी बात मानते हैं ।''

बुद्धिमान छोटे भाई ने कहा :
‘‘भैया ! अहंकार को पोसना आजादी नहीं है । कुर्सी को पाकर, गद्दी को पाकर अपने को बडा माना तो तुमने अपने असली बडप्पन को दबा दिया । यह बडप्पन तुम्हारा नहीं, कुर्सी का हुआ । यदि धन को पाकर अपने को बडा माना तो तुमने अपने बडप्पन को दबाकर धन को बडप्पन दिया । सत्ता, धन, रूप-लावण्य अथवा शरीर को बडप्पन मानना यह तो असली बडप्पन का घात करना है । तुमने इन चीजों को बडा कर दिया और अपने को दबा दिया, फिर अपने को आजाद मानते हो ?''

लेकिन राजगद्दी के नशे में चूर भाई ने कहा : ‘‘छोड ये बातें । आखिर तू मेरा छोटा भाई है ।''
ऐसे ही मेरा भाई भी मुझे कहता था कि : ‘‘सुधर जा । मैं तुझे हिस्सा देता हूँ । तू आराम से, मौज से रह । दो भाई तो हैं-एक ही पिता के दो बेटे हैं और तू एक कमरे में रात को बारह-बारह बजे तक बैठा रहता है ! दुकान पर पैर नहीं रखता ! अब तो सुधर जा ।'' गुरु-प्रसाद पाकर सात साल तपस्या के बाद जब हम अहमदाबाद पहुँचे, तब भी भाई ने पहला वचन यही कहा : ‘‘सात साल तू चला गया, फिर भी जो कमाई हुई है उसका आधा हिस्सा मैं तेरे को देता हूँ । अभी भी तू सुधर जा । मेरे साथ चल दुकान पर ।''
मैंने कहा : ‘‘हम तो बिगड गये ।''

सुनो मेरे भाईयो ! सुनो मेरे मितवा !
कबीरो बिगड गयो रे...
दही संग दूध बिगडयो, मक्खन रूप भयो रे...
पारस संग भाई ! लोहा बिगडयो, कंचन रूप भयो रे...
संतन संग दास कबीरो बिगडयो
संत कबीर भयो रे, कबीरो बिगड गयो रे...

दुनियादार जिस भक्त को बिगडा समझते हैं वास्तव में वह ऐहिक सृष्टि तो बिगडा दिखता है परंतु उसका दिव्य सृष्टि में प्रवेश हुआ है और वह दिव्य सृष्टि में भी रुके तो उस ब्रह्म-परमात्मा की शांति पा लेता है । बुद्धिमत्ता यह है कि सच्ची आजादी पाये हुये ऐसे महापुरुषों की चरणरज सिर पर लगाकर अपना भाग्य बना लें । यही आजादी का सच्चा स्वरूप है । लेकिन वह राजा अपने राजसी नशे में था ।

बडे भाई ने छोटे भाई  से कहा : ‘‘मैं इतना आजाद हूँ मेरी बात सब लोग मानते हैं और तू झोंपडी में जिंदगी बसर कर रहा है ! तू मेरी बात क्यों नहीं मानता है ?''
‘‘सब तुम्हारी बात मानते हैं ?''
‘‘हाँ, मानते हैं । मैं चाहे जो मँगा सकता हूँ । मेरी हुकूमत सब पर चलती है ।''
उस वक्त छोटा भाई गुदडी सी रहा था । उसने सिलाई करते-करते सूई-धागा उठाकर नदीं में फेंक दिया और बोला : ‘‘सब लोग तुम्हारी बात मानते हैं तो  जरा सुई-धागा नदीं से निकलवा दो ।''
राजा : ‘‘यह तो नहीं हो सकता ।''
‘‘जब तुम्हारे हुक्म से एक छोटी-सी सुई भी नदी में से नहीं निकल सकती तो तुम किस बात के सम्राट हो ? किस बात के राजा हो ?''

बडी भाई ने कहा : ‘‘तो क्या तुम्हारी बात सब मानते हैं ?''
तब छोटे भाई ने योगशक्ति का उपयोग किया । थोडी ही देर में एक मछली मुँह में सुई-धागा लटकाते हुये वहाँ तैरने लगी । छोटे भाई ने धागा पकडकर सूई दिखाई और बोलाः ‘‘देख, अब तू आजाद है कि मैं आजाद हूँ ? तू ही सोच । फिर भी तू अपने को आजाद समझता है और मुझे बर्बाद समझता है तो...

तेरी आजादियाँ सदके सदके ।
मेरी बर्बादियाँ सदके सदके ।।
मैं बर्बादे तमन्ना हूँ ।
मुझे बर्बाद रहने दो ।।

मेरी वासनाएँ बर्बाद हो गयीं, मेरा अहंकार बर्बाद हो गया, मेरी qचता बर्बाद हो गयी, मेरा बँधन बर्बाद हो गया । सचमुच में मेरी जो बर्बादी है उसे मैं प्यार करता हूँ और तेरी जो आजादी है, उसे मैं दुआ करता हूँ । तू वहाँ भला है और मुझे यहीं रहने दे, अपनी मौज में ।''

जिसने तीन मिनट के लिए भी, एक बार अपने आत्मा-परमात्मा का सुख पा लिया, उसके आगे इन्द्रदेव तक हाथ जोडकर अपना भाग्य बनाने को उत्सुक होते हैं तो एक सामान्य मछली की तो बात ही क्या है ? अगर पाना हो उस आत्मा-परमात्मा के सुख को तो पहुँच जाओ किसी ब्रह्मवेत्ता के द्वार पर... और उनके दैवी कार्य व सेवा-सत्संग से बना लो अपना भाग्य । किसी ने ठीक ही कहा है :
अगर है शौक मिलने का तो कर खिजमत फकीरों की । यह जौहर नहीं मिलता अमीरों के खजाने में ।

 




 


View Details: 3607
print
rating
  Comments

स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनायें।
Created by राजकुमार अग्रवाल in 8/14/2013 10:42:41 AM
परम श्रद्वेय, परम पूजनीय, परम आदरणीय, परम सत्य, परम आश्रमदाता, साक्षात परमेश्वर बापू जी को मेरा चरण वन्दन। स्वतन्त्रता दिवस के पावन अवसर पर बापू जी दीर्घायु हो। जब तक जहां में सितारे रहें हे बापू तेरी जिन्दगानी रहे। जिन्दगानी रहे मेरे बापू मेरे बापू

Copyright © Shri Yoga Vedanta Ashram. All rights reserved. The Official website of Param Pujya Bapuji