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गुरु अर्जुनदेवजी की वाणी

गुरु अर्जुनदेवजी की वाणी (कविता) : -

 

बीज मंत्रु हरि कीरतनु गाउ | आगै मिली निथावे थाउ |

गुर पुरे की चरणी लागु | जनम जनम का सोइआ जागु ||

हरि हरि जापु जपला | गुर किरपा ते हिरदै वासै भउजलु पारि परला ||

नामु निधानु धिआइ मन अटल | ता छूटहि माइआ के पटल |

गुर का सबदु अंम्रित रसु पीउ | ता तेरा होइ निरमल जीउ ||

सोधत सोधत सोधि बीचारा | बिनु हरि भगति नहीं छुटकारा |

सो हरि भजनु साध कै संगि | मनु तनु रापै हरि कै रंगि ||

छोडि सिआणप बहु चतुराई | मन बिनु हरि नावै जाइ न काई |

दइआधारी गोविद गुसाई | हरि हरि नानक टेक टिकाई ||

‘हरि का गुणगान ही बीजमंत्र है, मैं उसीका कीर्तन करता हूँ | इससे मुझ बेसहारे को भी सहारा मिलता है | पुरे गुरु की चरणसेवा से मेरी जन्म-जन्म की अज्ञानता दूर हुई है | मैंने हरिनाम का जप किया है; गुरुकृपा से मेरे हृदय में संसार-सागर से पार करवानेवाला परमात्मा निवास करने लगा है | जब मैं सुखों के भंडार हरिनाम का अटल ध्यान करता हूँ, तभी माया के बंधन छूटते है | गुरु का अमृत-रस रूपी शब्द पान करने से आत्मा निर्मल होता है | मैंने खोज-खोजकर यही निर्णय किया है कि हरिभक्ति के बिना छुटकारा नहीं | यह हरिभक्ति संतों के संपर्क में मिलती है और तभी तन-मन हरि के रंग में रंग पाता है | ऐ जीव ! तू अपनी चतुराई और बुद्धिमत्ता को छोड़, तेरे मन को हरिनाम के बिना और कोई सहारा नहीं | गुरु नानक कहते हैं कि जब गोविंद गोसाईं की कृपा होती है, तभी जीव को परमात्मा का संबल प्राप्त होता है |

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