Brahmaleen Matushri Maa Mehangiba
Pujneeya Sri Sri Maa Mehangiba has repeated history made millions of years back, during the glorious age of Satyuga in the past, when Devahuti accepted her son Lord Kapil as a Guru. How then was the life of this Santmata who presented to this world the rarest of gems in the form of Pujyashree?
साँई ने कहा था ...
पूज्य बापूजी अपनी मातुश्री पूजनीय अम्मा को ईश्वरप्राप्ति के मार्ग पर आगे बदने में कैसे मदद करते थे – इस विषय को उजागर करते हुए स्वंय अम्माजी बताया करती थी :
“ एक बार समाचार मिला कि साँई ( बापूजी ) उत्कण्ठेश्वर में है तो में बहू को साथ साँई के दर्शन करने गयी | उस दिन गाँव में लाइट नही थी | साँई तो एकदम फक्कड अवस्था में ध्यान – समाधि में निमग्न थे | हमने देखा कि आगे – पीछे साँप घूम रहे हैं | हम भी वहीं कुछ अंतर पर साधना करने बैठ गयी | वहाँ लोग पूछने लगे कि ‘ आप साँई की क्या लगती हैं ?’ जब लोग मुझसे पूछते तो मुझे साँई की बात याद आती | साँई ने मुझे मना कर रखा था कि ‘लोगों को नही बताना कि मेरा बेटा है, अन्यथा लोग आपको आदर - भाव देने लग जायेंगे , पूजा करने लग जायेंगे, इससे अहं जगने का खतरा रहता है | इसलिए जब तक पूर्णता को प्राप्त न होओ तब तक इन सब बातों से बचते रहना चाहिए |’ मैं कभी भी, कहीं भी नहीं बताती थी | मैं कहती कि साँई मेरे कुछ नहीं लगते |” गुरुआज्ञा – पालन में कैसी निष्ठा ! कैसी सरलता !! न कोई आडम्बर , न कोई दम्भ ! बापूजी ने कह दिया तो अक्षरशः पालन किया | अम्मा गुरुआज्ञा – पालन में इतनी तत्पर थीं, तभी तो लाखों वर्ष पुराना इतिहास फिर से नया बना दिया | जैसे माता देवहूति ने कपिल भगवान , जो कि उनके पुत्र थे , उनको गुरुरूप में निहारकर गुरुतत्व में स्थिति प्राप्त कर ली इस प्रकार अम्मा गुरुआज्ञा – पालन में तत्पर रहीं और बाह्वा बड़प्पन से बचीं तो इतनी ऊँचाई पा ली जो बड़े – बड़े योगियों को भी दुर्लभ है ! उनका पुण्यमय , पावन स्मरण करके हम भी धनभागी हो रहे हैं |
श्री माँ महँगीबा के जीवन प्रसंग
दर्शन की तीव्र तड़प
(पूज्य बापू जी की मातुश्री ब्र. माँ महँगीबा का महानिर्वाण-दिवसः 10 नवम्बर)
एक बार अम्माजी वाटिका में टहल रही थीं। तभी एक साधक उनके दर्शन करने आया। उसे देख अम्मा ने प्रसन्नता से कहाः "आज तो साँईं(पूज्य बापूजी) कितनी मौज में हैं ! तूने दर्शन किये ?"
साधकः "नहीं अम्मा ! मुझे तो कई दिनों से दर्शन नहीं हुए।"अम्मा को दया आ गयी। एक सेवक को बुलाकर कहाः "बेचारे ने बहुत दिनों से दर्शन नहीं किये। इसे साथ ले जा, साँईं जी कुटिया में बैठे हैं, तू इसे दर्शन करवा दे।" वह बेचारा साधक क्या बोलता ! वह तो जानता था कि पूज्य बापूजी अभी दिल्ली में हैं पर अम्मा जी को दर्शन की तीव्र तड़प के कारण नित्य प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।
साधकः "अम्मा ! मैं अभी बाहर जा रहा हूँ, फिर आकर दर्शन कर लूँगा।" अम्मा दिन भर राह देखती रहीं कि वह आये तो उसे साँईं के दर्शन करवा दूँ। वे सेविका से कहने लगीं, "बेचारे को बिना दर्शन के ही जाने पड़ा। अब न जाने कितने बजे उसका आना होगा !"
सेविका ने अम्मा की चिंता दूर करने के लिए अम्मा की फोन द्वारा उस भाई से बात करवा अम्मा ने पूछाः "दर्शन किये ?" अम्मा की ऐसी ऊँची भावदशा एवं साधकों के प्रति अत्यधिक करूणा देख उसकी आँखों में आँसू उभर आये। स्नेहकम्पित वाणी में वह बोलाः "हाँ अम्मा ! दर्शन हो गये। आपकी करूणा के, गुरुभक्ति के और दिव्य भावदशा के भी !" उसका हृदय गदगद और रोम-रोम पुलकित हो रहा था। ऐसी वात्सल्यमूर्ति और महान गुरुभक्त माँ की कोख से ही कारूण्यमूर्ति, ज्ञानावतार पूज्य बापू जी का प्राकट्य हुआ।
एक बार की बात है। आश्रम की गौशाला में सेवा करने वाला जयराम नामक आश्रमवासी अम्माजी के दर्शन करने आया। अम्माजी उसको सिंधी भाषा में कुछ समझाने लगीं। वह सिंधी नहीं जानता था। अम्माजी की वाणी को बीच में रोककर यह बात बताने में उसे संकोच हो रहा था परंतु अम्माजी की सेविका भाँप गयी। उसने कहाः "अम्मा जी ! इस सिंधी नहीं आती है।" अम्मा ने पूछाः "क्या तू सचमुच समझ नहीं पाया ?" उसने कहाः "हाँ अम्मा ! मुझे कुछ समझ में नहीं आया।" बच्चे की निर्दोषता, सहजता पर अम्माजी मुस्कराने लगीं। फिर अम्माजी ने 'ॐ.....ॐ..... ॐ.... ॐ.... ' का उच्चारण करते हुए दोनों हाथ ऊपर करके हास्य प्रयोग किया और उससे भी करवाया। फिर बोलीं, "यह तो समझ में आया न ?"बस यही एक सार है.....' आश्रमवासीः "जी अम्मा !" उस भाई का मुखमण्डल प्रसन्नता से खिल उठा। अम्माजी ने वात्स्लयभरी दृष्टि डालतेहुए कहाः "बस ! यही एक सार है। इसे ही समझना है।"
अम्माजी का संकल्प कहो या उनका आशीर्वाद, उनकी भगवन्नाम-निष्ठा का प्रभाव कहो या तत्त्वनिष्ठा की ऊँचाई, उस दिन से उस साधक को ॐकार की साधना में विलक्षण आनंद आने लगा।
समर्थ संत की समर्थ माता के श्रीचरणों में हमारे बारंबार प्रणाम !