प्रेमावतार का प्रागट्य – दिवस : जन्माष्टमी

चित् की विश्रांति से सामर्थ्य का प्राकट्य होता है. सामर्थ्य क्या है . बिना व्यक्ति , बिना वस्तु के भी सुखी रहना – ये बड़ा सामर्थ्य है. अपना ह्रदय वस्तुओं के बिना , व्यक्तियों के बिना परम सुख का अनुभव करें – यह स्वतंत्र सुख सामर्थ्य बढ़ाने वाला है .
श्रीकृष्ण के जीवन में सामर्थ्य है, माधुर्य है, प्रेम है. जितना सामर्थ्य उतना ही अधिक माधुर्य, उतना ही अधिक शुद्ध प्रेम है श्रीकृष्ण के पास |
पैसे से प्रेम करोगे तो लोभी बनायेगा, पद से प्रेम करोगे तो अहंकारी बनायेगा, परिवार से प्रेम करोगे तो मोही बनायेगा लेकिन प्राणिमात्र के प्रति समभाववाला प्रेम रहेगा, शुद्ध प्रेम रहेगा तो वह परमात्मा का दीदार करवा देगा.
प्रेम सब कर सकते है ,शांत सब रह सकते हैं और माधुर्य सब पा सकते है . जितना शांत रहने का अभ्यास होगा उतना ही माधुर्य विकसित होता है . जितना माधुर्य विकसित है उतना ही शुद्ध प्रेम विकसित होता है और ऐसे प्रेमी भक्त किसी चीज की कमी नहीं रहती | प्रेमी सबका हो जाता है , सब प्रेमी के हो जाते हैं .पशु भी प्रेम से वश में हो जाते हैं , मनुष्य भी प्रेम से वश हो जाते हैं और भगवान भी प्रेम से वश हो जाते हैं |
श्रीकृष्ण जेल में जन्मे हैं , वे आनंदकंद सचिदानंद जेल में प्रगटे है . आनंद जेल में प्रगट तो हो सकता है लेकिन आनंद का विस्तार जेल में नहीं हो सकता , जब तक यशोदा के घर नहीं जाता , आनंद प्रेममय नहीं हो पता | योगी समाधि करते हैं एकांत में , जेल जैसी जगह में आनंद प्रगट तो होता है लेकिन समाधि टूटी तो आनंद गया ,आनंद प्रेम से बढता है , माधुर्य से विकसित होता है |
प्रेम किसीका अहित नहीं करता. जो स्तनों में जहर लगाकर आयी उस पूतना को भी श्री कृष्ण ने स्वधाम पहुँच दिया. पूतना कौन थी ? पूतना कोई साधरण नहीं थी. पूर्वकाल में राजा बलि की बेटी थी , राजकन्या थी | भगवान वामन आये तो उनका रूप सोंदर्य देखकर उस राजकन्या को हुआ कि : ‘ मेरी सगाई हो गयी है , मुझे ऐसा बेटा हो तो में गले लगाऊं और उसको दूध पिलाऊ.’ लेकिन जब नन्हा – मुन्ना वामन विराट हो गया और बलि राजा का सर्वस्व छीन लिया तो उसने सोचा कि : ‘ मैं इसको दूध पिलाऊ ? इसको तो जहर पिलाऊ, जहर.’
वही राजकन्या पूतना हुई , दूध भी पिलाया और जहर भी. उसे भी भगवान ने अपना स्वधाम दे दिया. प्रेमास्पद जो ठहरे ......!
प्रेम कभी फरियाद नहीं करता , उलाहना देता है. गोपियाँ उलाहना देती है यशोदा को :
“ यशोदा ! हम तुम्हारा गाँव छोडकर जा रही हैं .”
“ क्यों “
“ तुम्हारा कन्हैया मटकी फोड़ देता है ”
“ एक के बदले दस-दस मटकियाँ ले लो ”
“ऊं हूँ ...तुम्हरा ही लाला है क्या ! हमारा नहीं है क्या ?“ मटकी फोडी तो क्या हुआ ?”
" अभी तो फरयाद कर रही थी , गाँव छोड़ने की बात कर रही थी"
" वह तो ऐसे ही कर दी . तुम्हारा लाला कहाँ है ? दिखा दो तो जरा |”
उलाहना देने के बहाने भी दीदार करने आयी हैं , गोपियाँ ! प्रेम में परेशानी नहीं , झंझट नहीं केवल त्याग होता है , सेवा होती है . प्रेम की दुनिया ही निराली है |
प्रेम न खेतों ऊपजे , प्रेम न हाट बिकाए .
राजा चहों प्रजा चहों शीश दिये ले जाय ..
प्रेम खेत में पैदा नहीं होता , बाजार में भी नहीं मिलता . जो प्रेम चाहे वह अपना शीश , अपना अभिमान दे दे ईश्वर के चरणों में , गुरु चरणों में ....
एक बार यशोदा मैया मटकी फोड़नेवाले लाला के पीछे पड़ी कि : “ कभी प्रभावती, कभी कोई, कभी कोई... रोज – रोज तेरी फरियाद सुनकर में तो थक गयी . तू खडा रह ”, यशोदा ने उठाई लकड़ी. यशोदा के हाथ में लकड़ी देख कर श्रीकृष्ण भागे. श्रीकृष्ण आगे, यशोदा पीछे... श्रीकृष्ण ऐसी चाल से चलते कि माँ को तकलीफ भी न हो और माँ वापस भी न जाये ! थोड़ा दोड़ते, थोडा रुकते. ऐसा करते – करते देखा कि : ‘ अब माँ थक गयी है और माँ हार जाये तो उसको आनंद नहीं आयेगा.’ प्रेमदाता श्रीकृष्ण ने अपने को पकडवा दिया. पकडवा लिया तो माँ रस्सी लायी बांधने के लिए | रस्सी है माया, मायातीत श्रीकृष्ण को कैसे बाँधे ? हर बार रस्सी छोटी पड़ जाये. थोड़ी देर बाद देखा कि : ‘माँ कहीं निराश न हो जाये तो प्रेम के वशीभूत मायातीत भी बंध गये.’ माँ बांधकर चली गयी और इधर ओखली को घसीटते – घसीटते ये तो पहुँचे यमलार्जुन ( नल – कूबर ) का उदार करने ... नल – कूबर को शाप से मुक्ति दिलाने ... धडाकधूम वृक्ष गिरे , नल – कूबर प्रणाम करके चले गये... अपने को बंधवाया भी तो किसी पर करुणा करने हेतु बाकी, उस मायातीत को कौन बाँधे ?
एक बार किसी गोपी ने कहा : “ देख, तू ऐसा मत कर. माँ ने ओखली से बांधा तो रस्सी छोटी पड़ गयी लेकिन मेरी रस्सी देख. चार – चार गायें बंध सके इतनी बड़ी रस्सी है. तुझे तो ऐसा बांधूगी कि तू भी क्या याद रखेगा, हाँ.”
कृष्ण : “ अच्छा बांध.”
वह गोपी ‘कोमल – कोमल हाथों में रस्सी बांधना है, यह सोचकर धीरे – धीरे बांधने लगी.
कृष्ण : “तुझे रस्सी बांधना आता ही नहीं है.”
गोपी : “मेरे बाप ! केसे रस्सी बांधी जाती है.”
कृष्ण : “ ला ,मैं तुझे बताता हूँ .” ऐसा करके गोपी के दोनों हाथ पीछे करके रस्सी से बांधकर फिर खंबे से बांध दिया और दूर जाकर बोले :
“ ले ले , बांधने वाली खुद बंध गयी... तू मुझे बांधने आयी थी लेकिन तू ही बंध गयी.
ऐसे ही माया जीव को बांधने आये उसकी जगह जीव ही माया को बांध दे में यही सिखाने आया हूँ .
केसा रहा होगा वह नटखटइया ! केसा रहा होगा उसका दिव्य प्रेम ! अपनी एक – एक लीला से जीव की उन्नति का संदेश देता है वह प्रेमस्वरूप परमात्मा !
आनंद प्रगट तो हो जाता है जेल में लेकिन बढ़ता है यशोदा के यँहा, प्रेम से.
यशोदा विश्रांति करती है तो शक्ति आती है ऐसे ही चित् की विश्रांति सामर्थ्य को जन्म देती है लेकिन शक्ति जब कंस के यँहा जाती है तो हाथ में से छटक जाती हे, ऐसे ही सामर्थ्य अहंकारी के पास आता है तो छटक जाता है. जेसे , शक्ति अहंकार रहित के पास टिकती है ऐसे ही प्रेम भी निरभिमानी के पास ही टिकता है.
प्रेम में कोई चाह नहीं होती. एक बार देवतों के राजा इन्द्र प्रसन्न हो गये एवं श्रीकृष्ण से बोले : “ कुछ मांग लो. “
श्रीकृष्ण : “ अगर आप कुछ देना ही चाहते है तो यही दीजिये कि अर्जुन के प्रति मेरा प्रेम बढ़ता रहे.”
अर्जुन अहोभाव से भर गया कि : ‘मेरे लिए मेरे स्वामी ने क्या माँगा ?’
प्रेम में अपनत्व होता है , निःस्वार्थता होती है, विश्वास होता है, विनम्रता होती है और त्याग होता है. सच पूछो तो प्रेम ही परमात्मा है और ऐसे परम प्रेमास्पद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव ही है – जन्माष्टमी.
आप सबके जीवन में भी उस परम प्रेमास्पद के लिए दिव्य प्रेम निरंतर बढ़ता रहे. आप उसी में खोये रहें उसी के होते रहें ऊं माधुर्य.... ऊं शांति... मधुमय मधुर्यदाता , प्रेमावतार , नित्य नवीन रस , नवीन सूझबूझ देनेवाले. गीता जो प्रेमावतार का ह्रदय है – गीता मं ह्रदय पार्थ. “ गीता मेरा ह्रदय है.”
प्रेमाव्तार श्रीकृष्ण के ह्रदय को समझने के लिए गीता ही तो है आप – हम प्रतिदिन गीता ज्ञान में परमेश्वरीय प्रेम में खोते जायं , उसमय होते जायं... खोते जायं...होते जायं.