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Around 9:30 A.M And 3:30 P.M IST
जीवन में जगाती प्रल्हाद-सा आल्हाद : होली
- पूज्य बापूजी
संस्कृत में संधिकाल को पर्व बोलते है | जैसे सर्दी पूरी हुई और गर्मी शुरू होने की अवस्था संधिकाल है | होली का पर्व इस संधिकाल में आता है | वसंत की जवानी ( मध्यावस्था ) में होली आती है, उल्लास लाती है, आनंद लाती है | नीरसता दूर करती है और उच्चतर दायित्व निर्वाह करने की प्रेरणा देती है | होली भुत प्राचीन उत्सव है, त्यौहार है | इसमें आल्हाद भी है, वसंत ऋतू की मादकता भी है, आलस्य की प्रधानता भी है और कूद-फाँद भी है | यह होलिकात्सव का प्रल्हाद जैसा आल्हाद, आनंद, पलाश के फूलों का रंग और उसमें ॐ ... ॐ ... का जप तुम्हारे जीवन में भी प्रल्हाद का आल्हाद लायेगा |
प्रल्हाद हो जीवन का आदर्श
जिसने पुरे जगत को आनंदित-आल्हादित करनेवाला ज्ञान और प्रेम अपने ह्रदय में सँजोया है, उसे ‘प्रल्हाद’ कहते है | जिसकी आँखों से परमात्म-प्रेम छलके, जिसके जीवन से परमात्म-रस छलके उसीका नाम है ‘प्रल्हाद’ | मैं चाहता हूँ कि आपके जीवन में भी प्रल्हाद आये | देवताओं की सभा में प्रश्न उठा : “सदा नित्य नविन रस में कौन रहता है ? कौन ऐसा है जो सुख-दुःख को सपना और भगवान को अपना समझता है ? ‘सब वासुदेव की लीला है’ – ऐसा समझकर तृप्त रहता है, ऐसा कौन पुण्यात्मा है धरती पर ?” बोले : “प्रल्हाद !” :प्रल्हाद को ऐसा ऊँचा दर्जा किसने दिया ?” “सत्संग ने ! सत्संग द्वारा बुद्धि विवेक पाती है एयर गुरुज्ञानरूपी रंग से रंगकर सत्य में प्रतिष्ठित हो जाती है |” आप भी प्रल्हाद की तरह पहुँच जाइये किन्ही ऐसे संत-महापुरुष की शरण में जिन्होंने अपनी चुनरी को परमात्म-ज्ञानरुपी रंग से रंगा है और रंग जाइये उनके रंग में |
धुलेंडी का उद्देश्य
होली में नृत्य भी होता है, हास्य भी होता है, उल्लास भी होता है और आल्हाद भी होता है लेकिन उल्लास, आनंद, नृत्य को प्रेमिका-प्रेमी सत्यानाश की तरफ ले जायें अथवा धुलेंडी के दिन एक-दुसरे पर धुल डाले, कीचड़ उछालें, भाँग पियें – यह होली की विकृति है | यह उत्सव तो धुल में गिरा, विकारों में गिरा हुआ जीवन सत्संगरूपी रंग की चमक से चमकाने के लिए है | जो विकारों में, वासनाओं में, रोगों में, शोकों में, धुल में मिल रहा था, उस जजीवन को सत्संग में, ध्यान में और पलाश के फूलों के रंग से रँगकर सप्तधातु, सप्तरंग संतुलित करके ओज०ब्ल, वीर्य और आत्मवैभव जगाने के लिए धुलेंडी का उत्सव है | पलाश के फूलों से खेले होली
होली में जहरीले रासायनिक रंगो से अपनी आँखों को, त्वचा और मुँह को बचाकर पलाश के पुष्पों के रंग से अपनी त्वचा को थोडा रँगे, जिससे शरीर की सप्तधातुओं व सप्तरंगों का संतुलन सुंदर बना रहे | पलाश के फूलों का रंग होली के बड पडनेवाली सूर्य की तीखी किरणों को झेलने की शक्ति देता है | शरीर में छुपी पित्तजन्य, वायुजन्य तकलीफों को दूर कर रोगप्रतिकारक शक्ति बढाता है | होलिका की ३ या ५ प्रदक्षिणाएँ करने से शरीर को गर्मी मिलती है, जिससे ट्यूमर के अंश जो रक्तसंचार में अवरोध पैदा करेंगे या कैंसर बनायेंगे अथवा कफ का जो गाढापन है, वः पिघलेगा और खाँसी द्वारा बाहर निकलेगा |
होली के बाद स्वास्थ्य – व्रत
रघु राजा, प्रल्हाद, हिरण्यकशिपु के साथ-साथ ऋतू-परिवर्तन से भी होली का सीधा सबंध है | तुम्हारे अंदर जो आलस्य अथवा जो कफ जमा है, उसको कूद-फाँद करके रास्ता देने के लिए होली है | इस उत्सव में कूद-फाँद नहीं करें तो आलसी और नीरस बन जाते है | ‘ होली के बाद २० दिन तक नमक कम खाऊँगा | २०-२५ निम् के पत्ते २-३ काली मिर्च के साथ खाऊँगा |’ – यह आरोग्य क लिए व्रत है | ‘संसार व्यवहार में थोडा संयम करूँगा, पति-पत्नी के संबंध में ब्रम्हचर्य पालूँगा |’ – यह दीर्घ जीवन के लिए व्रत है | इन दिनों में भुने हुए चने ‘होला’ का सेवन शरीर से वात, कफ आदि दोषों का शमन करता है | होली के बाद खजूर न खायें | शरीर स्वस्थ रहे इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है मन स्वस्थ रखना, ‘स्व’ में स्थित रखना | मन को अपने मूल स्वभाव में ले जाओ | जैसे तरंग का मूल स्वभाव पानी है, ऐसे मन का मूल स्वभाव परमात्म-शांति, परमात्म-प्रेम व परमात्मा की आवश्यकता है |
आध्यात्मिक होली के रंग रँगे
होली हुई तब जानिये, पिचकारी गुरुज्ञान की लगे | सब रंग कच्चे जाय उड़, एक रंग पक्के में रँगे | पक्का रंग क्या है ? पक्का रंग है ‘हम आत्मा है’ और ‘हम दु:खी है, हम सुखी है, हम अमुक जाति के है ....’ - यह सब कच्चा रंग है | यह मन पर लगता है लेकिन इसको जाननेवाला साक्षी चैतन्य का पक्का रंग है | एक बार उस रंग में रँग गये तो फिर विषयों का रंग जीव पर कतई नहीं चढ़ सकता |
Chemical colours available in market are mostly prepared using engine oil mixed with metal oxides or dyesi.e. BLACK colour is prepared using “Lead oxide” that causes liver diseases. It also inhibits hearing ability in human beings.GREEN colour contains ‘copper sulphate’ that cause eye disorders and can also lead to complete blindness. Purple colour contains ‘chromium iodide’ that can cause bronchial asthma and allergy like disease. Silver colour contains ‘aluminum bromide‘ that can cause cancer. Blue Colour contains ‘prussian blue’ that can cause skin diseases. Red colour contains ‘mercuric sulfate’ that can cause skin cancer and lead to mental retardation. So, avoid playing Holi with chemical colours at all costs.