साधना हेतु अमृतोपम काल : चतुर्मास
चतुर्मास के चार महीने भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते है . इसलिए ये काल साधको , भक्तो , उपासको के लिए स्वर्ण काल माना गया है | इस काल में जो कोई व्रत , नियम पाला जाता है वह अक्षय फ़ल देता है , इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को यत्न पूर्वक चतुर्मास में कोई नियम ले लेना चाहिए | जिस प्रकार चीटियाँ आदि प्राणी वर्षा काल हेतु अन्य दिनों में ही अपने लिए उपयोगी साधन संचय कर लेते हैं, उसी प्रकार साधक भक्त को भी इस अमृतोपम समय में भगवान के संतोष के लिए शास्त्रोक्त नियम, जप, होम , स्वाध्याय एवं व्रतो का अनुष्ठान कर सत्व की अभिवृद्धि एवं परमात्म सुख को प्राप्त करना चाहिए |
जो व्यक्ति भगवान के उद्देश्य से केवल शाकाहार करके चातुर्मास के चार महीने बिताता हे, वो धनी होता है. जो भगवान विष्णु के योगनिद्रा काल में प्रतिदिन नक्षत्रो के दर्शन करके ही एक बार भोजन करता हे, वो धनवान, रूपवान और माननीय होता है |
जो श्रीहरि के योगनिद्रा काल में व्रत परायण होकर चतुर्मास व्यतीत करता है वो अग्निओष्टम यज्ञ का फल पाता है |जो ईमानदारी के अन्न का भोजन करता हे उसका अपने भाई - बन्धुओ से कभी वियोग नहीं होता , जो ब्रह्मचर्यपूर्वक चतुर्मास व्यतीत करता है वह श्रेष्ठ विमान में बैठ कर स्वेछा से स्वर्गलोक में जाता है , जो सम्पूर्ण चतुर्मास में नमक का त्याग करता हे उसके सभी पूर्त कर्म ( परोपकार एवं धर्म सम्बन्धी ) सफल होते है. चतुर्मास में प्रतिदिन स्नान करके जो भगवान विष्णु के आगे खड़ा हो "पुरुष सूक्त" का पाठ करता है उसकी बुद्धि बढती है |
जो मनुष्य चतुर्मास में श्रद्धा - भक्ति पूर्वक विष्णु चरणामृत पान करता है उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है | कटोरी में जल को देखते हुए १०० बार भगवन्नाम जप करे वही बन गया भगवत चरणामृत | जो नित्य भगवान सूर्य या गणपति जी को नमस्कार करता हे उसे आयु ,आरोग्य , ऐश्वर्य और कान्ति की प्राप्ति होती है | चतुर्मास में पलाश के पत्तों पर भोजन करना पापनाशक है |
क्षीर सागर में योगनिद्रा करने वाले भगवान जिस दिन शयन करते (शयनी एकादशी ) और उठते ( देवउठी एकादशी ) हैं , उन दिनों में अनन्य भक्ति - भाव पूर्वक उपवास करने वाले को भगवान शुभ गति प्रदान करते है |
किसी कारण से यदि चतुर्मास के चारों महीनो में नियम पालना संभव न हो , तो केवल कार्तिक मास में ही इन नियमो का पालन करें |
जिसने कुछ उपयागी वस्तुओ को पुरे चातुर्मास में त्याग करने का नियम लिया हो उसे उन वस्तुओ को सात्विक ब्राह्मण को दान करना चाहिए |
जो मनुष्य जप, नियम, व्रत आदि के बिना ही चतुर्मास व्यतीत करता है वह मूर्ख है , और जो इन साधनों द्वरा इस अमूल्य काल का लाभ उठता हे वह मानो अमृत कुम्भ ही पा लेता है |